Wednesday, June 26, 2019

Sri Rama Raksha Stotram in Hindi अर्थ सहित

shri Ram

Sri Rama Raksha Stotra in Hindi -
राम रक्षा स्तोत्र ऋषि कौशिक के द्वारा रचित है। इस स्तोत्र का पाठ सभी प्रकार की बाधाओं और शत्रुओं से रक्षा के लिए किया जाता है। इस स्तोत्र का पाठ नवग्रहों के कुप्रभाव से रक्षा के लिए भी किया जाता है। यहाँ राम रक्षा स्तोत्र हिंदी अर्थ ( meaning ) के साथ दिया गया है।

।। अथ श्रीरामरक्षास्तोत्रम।।
 श्री गणेशाय नमः।

विनियोगः - ॐ अस्य श्री रामरक्षास्तोत्रमन्त्रस्य बुधकौशिक ऋषिः, श्री सीतारामचन्द्रोदेवता, अनुष्टुप् छन्दः, सीताशक्तिः, श्रीमद्हनुमान कीलकम् श्रीसीतरामचन्द्रप्रीत्यर्थे जपे विनियोगः।।

ध्यानम् -
ध्यायेदाजानुबाहं धृतशरधनुषं बद्दद्पद्मासनस्थं,
पीतं वासोवसानं नवकमलदलस्पर्धिनेत्रं प्रसन्नम् ।
वामाङ्कारूसीता मुखकमल्मिल्लोचनं नीरदाभं,
नानालङ्कारदीप्तं दधतमरुजटामण्डनं रामचन्द्रम्।।

जो धनुष बाण धारण किये हुए हैं, बद्ध पद्मासन की मुद्रा में विराजित हैं और पीताम्बर पहने हुए हैं, जिनके नेत्र कमल दलों से स्पर्धा करते हैं (अर्थात जो कमल दलों से भी सुन्दर हैं), जो प्रसन्नचित्त हैं, जिनके नेत्र बाएं अङ्क ( गोद ) में बैठी सीता के मुख कमल से मिले हुए हैं तथा जिनका रंग बादलों की तरह श्याम है, उन अजानबाहु, विभिन्न आभूषणों से विभूषित जटाधारी श्री राम का [मैं] ध्यान करता हूँ।

राम रक्षा स्तोत्रम -

चरितं रघुनाथस्य शतकोटिप्रविस्तरम् ।
एकैकमक्षरं पुंसां महापातकनाशनम् ।।1।।
ध्यात्वा नीलोत्पल श्यामं रामं राजीवलोचनम् ।
जानकीलक्ष्मणोपेतं जाता मुकुटमण्डितम् ।।2।।

 श्री रघुनाथ का चरित्र १०० कोटि के विस्तार वाला है। इस चरित्र का एक- महापातकों का नाश करने वाला [करता] है। १।
नीलकमल के समान श्याम वर्ण वाले, कमल जैसे नेत्र वाले, जटाओं के मुकुट से सुशोभित, जानकी और लक्ष्मण के सहित ऐसे भगवान् राम का ध्यान करके। २।

सासितूणधनुर्बाणपाणिं  नक्तं चरान्तकम् ।
स्वलीलया जगन्नातुमाविर्भूतमजं विभुम् ।।3।।
रामरक्षां पठेत्प्राज्ञः पापघ्नीं सर्वकामदाम् ।
शिरो मे राघवः पातु भालं दशरथात्मजः।।4।।

अजन्मा [जिनका जन्म न हुआ हो, अर्थात जो प्रकट हुए हों], सर्वव्यापक, हाथों में खड्ग, तुणीर, धनुष-बाण धारण किये राक्षसों के संहार तथा अपनी लीलाओं से जगत की रक्षा हेतु अवतरित श्री राम का ध्यान करके।३।
मैं सभी कामनाओं की पूर्ति करने वाले और समस्त पापों का नाश करने वाले राम रक्षा स्तोत्र का पाठ करता हूँ। राघव मेरे सिर की, दशरथ के पुत्र मेरे ललाट की रक्षा करें।४।

कौसल्येयो दृशो (drisho) पातु विश्वामित्रप्रियःश्रुती।
घ्राणं पातु मखत्राता मुखं सौमित्रिवत्सलः ।।5।।
जिह्वां विद्यानिधिः पातु कण्ठं भरतवंदितः।
स्कन्धौ दिव्यायुधः पातु भुजौ भग्नेशकार्मुकः ।।6।।

 कौशल्या के पुत्र मेरे नेत्रों की, विश्वामित्र के प्रिय मेरे कानों की, यज्ञरक्षक मेरे घ्राण (नाक) की और सुमित्रा के वत्सल मेरे मुख की रक्षा करें।5।
विधानिधि मेरी जिह्वा की रक्षा करें, भरत-वन्दित मेरे कंठ की रक्षा करें, कन्धों की दिव्यायुध और भुजाओं की महादेव का धनुष तोड़ने वाले श्री राम रक्षा करें।6।

करौ सीतपतिः पातु हृदयं जामदग्न्यजित् ।
मध्यं पातु खरध्वंसी नाभिं जाम्बवदाश्रयः।।7।।
सुग्रीवेशः कटी पातु सक्थिनी हनुमत्प्रभुः।
ऊरु रघुत्तमः पातु रक्षःकुलविनाशकृत् ।।8।।

हाथों की रक्षा सीतापति, ह्रदय की जमदग्नि के पुत्र (परशुराम) को जीतने वाले, मध्य भाग की खर (राक्षस) का वध करने वाले और नाभि की जांबवान के आश्रयकारी रक्षा करें।7।
सुग्रीव के स्वामी कमर की, हनुमान के प्रभु कूल्हों की, सभी रघुओं में उत्तम और राक्षसकुल का विनाश करने वाले श्री राम जाँघों की रक्षा करें।८।

जानुनी सेतुकृत्पातु जङ्-घे दशमुखान्तकः।
पादौ विभीषणश्रीदः पातु रामोऽखिलं वपुः ।।9।।
एतां रामबलोपेतां रक्षां यः सुकृती पठेत्।
स चिरायुः सुखी पुत्री विजयी विनयी भवेत्।।10।।

सेतु का निर्माण करने वाले मेरे घुटनों की, दशानन का वध करने वाले मेरी अग्रजंघा की, विभीषण को ऐश्वर्य देने वाले मेरे चरणों की और सम्पूर्ण शरीर की श्री राम रक्षा करें।9।
रामबल से संयुक्त इस स्तोत्र का जो  सदव्यक्ति पाठ करता है, वह दीर्घायु, सुखी, पुत्रवान, विजयी और विनयशील हो जाता है।10।

पातालभूतलव्योम चरिणश्छद्मचारिणः।
न द्रष्टुमपि शक्तास्ते रक्षितं रामनामभिः।।11।।
रामेति रामभद्रेति रामचन्द्रेति वा स्मरन्।
नरो न लिप्यते पापै भक्तिं मुक्तिं च विन्दति।।12।।

जो जीव आकाश पृथ्वी और पाताल में विचरते रहते हैं अथवा छद्म वेश में घुमते रहते हैं वे राम नाम से सुरक्षित मनुष्य को देख भी नहीं पाते।11।
राम, रामभद्र, रामचंद्र आदि नामों का स्मरण करने वाला व्यक्ति पापों में लिप्त नहीं रहता और भक्ति और मोक्ष को प्राप्त करता है।12।

जगज्जेत्रैकमन्त्रेण रामनाम्नाभिरक्षितम् ।
यः कण्ठे धारयेत्तस्तस्य करस्थाः सर्वसिद्धयः।।13।।
वज्रपंजरनामेदं यो रामकवचं स्मरेत् ।
अव्याहताज्ञः सर्वत्र लभते जयमङ्गलम्।।14।।

जो राम नाम से सुरक्षित जगत पर विजय करने वाले इस मन्त्र को अपने कंठ में धारण करता है उसे समस्त सिद्धियां प्राप्त होती हैं।13।
 वज्रपंजर नामक इस रामकवच का जो स्मरण करता है, उसकी आज्ञा का उल्लंघन नहीं होता और उसे सब जगह विजय और मंगल की प्राप्ति होती है।14।

आदिष्टवान्यथा स्वप्ने रामरक्षामिमां हरः।
तथा लिखितवान् प्रातः प्रबुद्धो बुधकौशिकः।।15।।
आरामः कल्पवृक्षाणां विरामः सकलापदाम्।
अभिरामस्त्रिलोकानां रामः श्रीमान् स नः प्रभुः।।16।।

स्वप्न में बुधकौशिक ऋषि को भगवान् शिव का आदेश होने पर बुधकौशिक ऋषि ने प्रातः जागने पर इस स्तोत्र को लिखा। 15।
जो कल्पवृक्षों के समान आराम देने वाले, सभी आपदाओं को विराम देने वाले, तीनों लोकों में मोहक और सुन्दर  हैं, वही राम हमारे प्रभु हैं।16।

तरुणौ रूपसंपन्नौ सुकुमारौ महाबलौ।
पुंडरीकविशालाक्षौ चीरकृष्णाजिनाम्बरौ।।17।।
फलमूलशिनौ दान्तौ तापसौ ब्रह्मचारिणौ ।
पुत्रौ दशरथस्यैतौ भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ ।।18।।

जो युवा, सुन्दर, सुकुमार, महाबलशाली और कमल के जैसे नेत्रों वाले हैं, मुनियों की तरह कपड़े एवं काले हिरन का चर्म धारण करने वाले हैं। 17।
जो फल और कंद का आहार ग्रहण करते हैं, जो संयमी, तपस्वी और ब्रह्मचारी हैं वे दशरथ के पुत्र राम और लक्ष्मण दोनों भाई हमारी रक्षा करें। 18।

शरण्यौ सर्वसत्वानां श्रेष्ठौ सर्वधनुश्मताम्।
रक्षःकुलनिहन्तारौ त्रायेतां नो रघुत्तमौ ।।19।।
आत्तसज्जधनुषा विषुस्पृशा वक्षया शुगनिषङ्ग संगिनौ ।
रक्षणाय मम रामलक्ष्मणा वग्रतः पथि सदैव गच्छताम् ।।20।।

ऐसे महाबली, रघुश्रेष्ठ समस्त प्राणियों के शरणदाता, सभी धनुर्धारियों में श्रेष्ठ, राक्षस कुल का विनाश करने वाले हमारी रक्षा करें। 19।
धनुष संधान किये हुए, बाण का स्पर्श करते हुए अक्षय बाणों से उक्त तुणीर धारण किये श्री राम और लक्ष्मण मेरी रक्षा के लिए मेरे मार्ग में आगे चलें। 20।

संनद्धः कवची खड्गी चापबाणधरो युवा ।
गच्छन् मनोरथोऽस्माकं रामः पातु सलक्ष्मणः।।21।।
रामो दशरथिः शूरो लक्ष्मणानुचरो बली।
काकुस्थः पुरुषः पूर्णः कौसल्येयो रघुत्तमः।।22।।

हमेशा तत्पर, कवच धारण किये हुए, हाथों में खड्ग और धनुष-बाण धारण किये युवा श्री राम लक्ष्मण सहित मेरी रक्षा के लिए चलें।21।
[भगवान् शिव कहते हैं-] श्री राम, दाशरथी, शूर, लक्ष्मणानुचर, बली, काकुस्थ, पुरुष, पूर्ण, कौसल्येय, रघुत्तम ।22।

वेदान्तवेद्यो यज्ञेशः पुराणपुरुषोत्तमः ।
जानकीवल्लभःश्रीमानप्रमेय पराक्रमः।।23।।
इत्येतानि जपेन्नित्यं मद्भक्तः श्रद्धयान्वितः ।
अश्वमेधाधिकं पुण्यं संप्राप्नोति न संशयः।।24।।

वेदांतवेद्य, यज्ञेश, पुराण पुरुषोत्तम, जानकीवल्लभ और श्रीअप्रमेय पराक्रम ।23।
इन नामों से नित्य भक्तिपूर्वक जप करने वाले को अश्वमेध यग्य से भी अधिक पुण्य मिलता है इसमें कोई संशय नहीं है।24।

रामं दुर्वादलश्यामं पद्माक्षं पीतवाससम् ।
स्तुवन्ति नामिभिर्दिव्यैर्न ते संसारिणौ नरः।।25।।

दूर्वादल के समान श्याम वर्ण, कमल-नयन और पीले वस्त्र धारण किये श्री राम की इन दिव्य नामों से स्तुति करने वाला संसारचक्र में नहीं पड़ता।25।

रामं लक्ष्मण पूर्वजं रघुवरं सीतापतिं सुन्दरं ।
काकुत्स्थं करुणार्णवं गुणनिधिं विप्रप्रियं धार्मिकम् ।।
राजेन्द्रं सत्यसंधं दशरथनयं श्यामलं शान्तमूर्तिम् ।
वन्दे लोकाभिरामं रघुकुलतिलकं राघवं रावणारिम् ।।26।।

लक्ष्मण के बड़े भाई रघुवर, सीतापत, काकुत्स्थ राजा के वंशज, दयानिधि, गुणनिधि, विप्रों (ब्राह्मणों) के प्रिय, धर्म के रक्षक, राजाओं के राजा, सत्यसानिद्ध्य, दशरथ के पुत्र, श्यामवर्ण, शान्ति स्वरुप, सभी लोकों में सुन्दर, रघुकुल के वंशज और रावण के शत्रु राघव की मैं वंदना करता हूँ।26।

रामाय रामभद्राय रामचंद्राय वेधसे ।
रघुनाथाय नाथाय सीताया: पतये नम: ॥२७॥

 राम को, रामभद्र को, रामचंद्र को, रघुनाथ नाथ को, सीता के पति को नमस्कार है।27।

श्रीराम राम रघुनन्दन राम राम।
श्रीराम राम भरताग्रज राम राम।
श्रीराम राम रणकर्कश राम राम।
श्रीराम राम शरणं भव राम राम॥२८॥

 हे रघुनन्दन श्रीराम, भरत के बड़े भाई श्री राम, हे शत्रु को जीतने वाले श्री राम मुझे शरण दो।28।

श्रीरामचन्द्रचरणौ मनसा स्मरामि,
श्रीरामचन्द्रचरणौ वचसा गृणामि।
श्रीरामचन्द्रचरणौ शिरसा नमामि।
श्रीरामचन्द्रचरणौ शरणं प्रपद्ये॥२९॥

मैं श्रीराम के चरणों का मन से सुमिरन करता हूँ, श्रीराम के चरणों का वाणी से गुणगान करता हूँ, श्रीराम के चरणों को श्रद्धा के साथ प्रणाम करता हूँ, श्रीराम के चरों की शरण लेता हूँ।29।

माता रामो मत्पिता रामचंन्द्र:।
स्वामी रामो मत्सखा रामचंद्र:।
सर्वस्वं मे रामचन्द्रो दयालु,
नान्यं जाने नैव जाने न जाने ॥३०॥

श्रीराम मेरे माता, श्रीराम मेरे पिता, श्रीराम मेरे स्वामी और श्रीराम मेरे सखा हैं। दयालु श्रीराम मेरे सर्वस्व हैं और उनके सिवा मैं किसी को नहीं जानता।31।

दक्षिणे लक्ष्मणो यस्य वामे तु जनकात्मजा।
पुरतो मारुतिर्यस्य तं वन्दे रघुनंदनम्‌ ॥३१॥
लोकाभिरामं रनरङ्‌गधीरं राजीवनेत्रं रघुवंशनाथम्‌।
कारुण्यरूपं करुणाकरंतं श्रीरामचंद्रं शरणं प्रपद्ये॥३२॥

जिनके दक्षिण में (दाई ओर) लक्ष्मण, बाईं ओर जानकी और सामने हनुमान जी विराजित हैं, मैं उन रघुनन्दन का वंदन करता हूँ।31।
मैं सभी लोकों में सुन्दर, युद्धकला में धीर, कमल के समान नेत्र वाले रघुवंश के नाथ, करुणारूप, करुणाकर, श्रीराम की शरण में हूँ।32।

मनोजवं मारुततुल्यवेगं जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठम्‌।
वातात्मजं वानरयूथमुख्यं श्रीरामदूतं शरणं प्रपद्ये॥३३॥
कूजन्तं रामरामेति मधुरं मधुराक्षरम्‌।
आरुह्य कविताशाखां वन्दे वाल्मीकिकोकिलम्‌॥३४॥

मन के समान गति और वायु के सामान वेग वाले, जितेन्द्रिय, बुद्धिमानों में भी वरिष्ठ (श्रेष्ठ), वायु के पुत्र, वानर दल के अधिनायक (leader) श्रीराम दूत (हनुमान) की [मैं] शरण लेता हूँ।33।
मैं कवितामयी डाल पर बैठे मधुर अक्षरों वाले 'राम-राम' के मधुर नाम को कूजते हुए वाल्मीकि रूपी कोयल  की वंदना करता हूँ।34।

आपदामपहर्तारं दातारं सर्वसंपदाम्‌।
लोकाभिरामं श्रीरामं भूयो भूयो नमाम्यहम्‌॥३५॥
भर्जनं भवबीजानामर्जनं सुखसंपदाम्‌ ।
तर्जनं यमदूतानां रामरामेति गर्जनम्‌ ॥३६॥

मैं सभी लोकों में सुन्दर श्री राम को बार-बार प्रणाम करता हूँ, जो सब आपदाओं को दूर कर सुख सम्पदा देने वाले हैं।35।
राम-राम का जप करने से मनुष्य के कष्ट समाप्त हो जाते हैं। वह समस्त सुख-संपत्ति और ऐश्वर्य प्राप्त करता है। राम राम की गर्जना से यमदूत सदैव भयभीत रहते है।36।

रामो राजमणिः सदा विजयते रामं रमेशं भजे ।
रामेणाभिहता निशाचर चमू रामाय तस्मै नमः ।
रामान्नास्ति परायणं परतरं रामस्य दासोऽस्म्यहम् ।
रामे चित्तलयः सदा भवतु मे भो राम मामुद्धर ।।37।।

राजाओं में श्रेष्ठ श्रीराम सदैव विजय प्राप्त करते हैं, मैं लक्ष्मीपति श्री राम को भजता हूँ। सम्पूर्ण राक्षस सेना का नाश करने वाले राम को मैं नमस्कार करता हूँ। श्रीराम के समान कोई और और आश्रयदाता नहीं है, मैं उन शरणागत वत्सल का दास हूँ।  हे राम, मेरा उद्धार करो।37।

राम रामेति रामेति रमे रामे मनोरमे ।
सहस्रनाम तत्तुल्यं रामनाम वरानने ।।38।।

 [शिवजी पार्वती से कहते हैं-] हे सुमुखी, राम नाम 'विष्णु सहस्रनाम' के समान है। मैं सदा राम में ही रमण करता हूँ।38।

।। इति श्री बुधकौशिक मुनि विरचितं रामरक्षास्तोत्रं संपूर्णम् ।।
~श्री सीतारामचन्द्रार्पणमस्तु~

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Tags: shri Ram raksha stotra in hindi arth sahi
Ram raksha stotra meaning

Thursday, June 13, 2019

Devi Atharvashirsha Stotram in Sanskrit,

maa durga devi atharvashirsham

Devi Atharvashirsha Stotra ( देवी अथर्वशीर्षम ) अथर्ववेद से लिया गया है, लेकिन मूल रूप से यह ऋग्वेद से जुड़ा है। इस स्तोत्र का पाठ दुर्गा सप्तशती पाठ के पहले किया जाता है, यहाँ देवी अथर्वशीर्षम हिंदी अर्थ सहित दिया गया है।

देवी अथर्वशीर्ष स्तोत्रम-

।अथ श्री देव्यथर्वशीर्षम।
ॐ सर्वे वै देवा देवीमुपतस्थुः कासि त्वं महादेवीति ।।1।।
साब्रवीत्- अहं ब्रह्म्स्वरुपिणी । मत्तः प्रकृति पुरुशात्मकं जगत् । शून्यं चाशून्यं च ।।2।।
अहमानन्दानानन्दौ । अहं विज्ञानाविज्ञाने । अहं ब्रह्माब्रह्मणी वेदितव्ये । अहं पञ्च्भूतान्यपञ्चभूतानि । अहमखिलं जगत् ।।3।।

वेदोऽहमवेदोऽहम् । विद्याहमविद्याहम् । अजाहमनजाहम् । अधश्चोर्ध्वं च तिर्यक्चाहम् ।।4।।
अहं रुद्रेभिर्वसुभिश्चरामि । अहमादित्यैरुत विश्वदेवैः । अहं मित्रावरुणावुभौ बिभर्मि । अहमिन्द्राग्नी अहमश्विनावुभौ ।। 5।।
अहं सोमं तवष्टारं पूषणं भगं दधामि । अहं विष्णुमुरुक्रमं ब्रह्माणमुत प्रजापतिं दधामि ।।6।।

अहं दधामि द्रविणं हविष्मते सुप्राव्ये यजमानाय सुन्वते । अहं राष्ट्री सङ्ग्मनी वसूनां चिकितुषी प्रथमा यज्ञियानाम् । अहं सुवे पितरमस्य मूर्धन्मम योनिरप्स्वन्तः समुद्रे । य एवं वेद । स दैवीं संपदमाप्नोति (sampadmaapnoti ) ।।7।।

ते देवा अब्रुवन्- नमो देव्यै महादेव्यै शिवायै सततं नमः ।
नमः प्रकृत्यै भद्रायै नियताः प्रणताः स्म ताम् ।।8।।
तामग्निवर्णां तपसा ज्वलन्तीं वैरोचनीं कर्मफ़लेषु जुष्टाम् ।
दुर्गां देवीं शरणं प्रपद्यामहेऽसुरान्नायित्र्यै ते नमः ।।9।।

देवीं वाचमजनयन्त  देवास्तां विश्वरूपाः पशवो वदन्ति ।
सा नो मन्द्रेषमूर्जं दुहाना धेनुर्वागस्मानुप सुष्टुतैतु ।।10।।
कालरात्रीं ब्रह्मस्तुतां वैष्णवीं स्कन्दमातरम्  ।
सरस्वतीमदितिं दक्षदुहितरं नमामः पावनां शिवाम् ।।11।।

महालक्ष्म्यै च विद्महे सर्वशक्त्यै च धीमहि ।
तन्नो       देवी         प्रचोदयात् ।।12।।
अदितिर्ह्यजनिष्ट दक्ष या दुहिता तव ।
तां देवा अन्वाजयन्त भद्रा अमृतबन्धवः ।।13।।

कामो योनिः कमला वज्रपाणिर्गुहा हसा मातरिश्वाभमिन्द्रः ।
पुनर्गुहा सकला मायया च पुरूच्यैषा विश्वमातादिविद्योम्  ।।14।।
एषाऽऽत्मशक्तिः । एषा विश्वमोहिनी । पाशाङ्कुशधनुर्बाणधरा ।
एषा श्रीमहाविद्या । य एवं वेद स शोकं तरति ।।15।।

नमस्ते अस्तु भगवति मातरस्मान् पाहि सर्वतः ।।16।।

सैपाष्टाै वसवः । सैषैकादश रुद्राः । सैषा द्वादशादित्याः ।
सैषा विश्वेदेवाः सोमपा असोमपाश्च ।
सैषा यातुधाना असुरा रक्षांसि पिशाचा यक्षाः सिद्धाः ।
सैषा सत्त्रजस्तमान्सि । सैषा ब्रह्मविष्णुरुद्ररुपिणी ।
सैषा प्रजापतीन्द्रमनवः । सैषा ग्रहनक्षत्रज्योतींषि ।
कलाकाष्ठादिकालरूपिणी । तामहं प्रणौमि नित्यम् ।।
पपापहारिणीं देवीं भक्तिमुक्तिप्रदायिनीम् ।
अनन्तां विजयां शुद्धां शरण्यां शिवदां शिवाम् ।।17।।

वियदीकारसंयुक्तं वीतिहोत्रसमन्वितम्।
अर्धेन्दुलसितं देव्या बीजं सर्वार्थसाधकम् ।।18।।
एवमेकाक्षरं ब्रह्म यतयः शुद्धचेतसः ।
ध्यायन्ति परमानन्दमया ज्ञानाम्बुराशयः ।।19।।

वाङ्माया ब्रह्मसूस्तस्मात् षष्ठं वक्त्रसमन्वितम् ।
सूर्योऽवामश्रोत्रबिन्दुसन्युक्तष्टात्तृतीयकः ।
नारायणेन सम्मिश्रो वायुश्चाधरयुक् ततः ।
विच्चे नवार्णकोऽर्णः स्यान्महदानन्ददायकः ।।20।।

ह्रित्पुण्डरीकमध्यस्थां प्रातःसूर्यसमप्रभाम् ।
पाशाङ्कुशधरां सौम्यां वरदाभयहस्तकाम् ।
त्रिनेत्रां रक्तवसनां भक्तकामदुघां भजे ।।21।।
नमामि त्वां महादेवीं महाभयविनाशिनीम् ।
महादुर्गप्रशमनीं महाकारुन्यरूपिणीम् ।।22।।

यस्याः स्वरूपं ब्रह्मादयो न जानन्ति तस्मादुच्यते अज्ञेया ।
यस्या अन्तो न लभ्यते तस्मादुच्यते अनन्ता ।
यस्या लक्ष्यं नोपलभ्यते तस्मादुच्यते अलक्ष्या ।
यस्या जननं नोपलभ्यते तस्मादुच्यते अजा ।
एकैव सर्वत्र वर्तते तस्मादुच्यते एका ।
एकैव विश्वरूपिणी तस्मादुच्यते नैका ।
अत एवोच्यते अज्ञेयानन्तालक्ष्याजैका नैकेति ।।23।।

मन्त्राणां मातृका देवी शब्दानां ज्ञानरूपिणी ।
ज्ञानानां चिन्मयातीता शून्यानां शून्यसाक्षिणी ।
यस्याः परतरं नास्ति सैषा दुर्गा प्रकीर्तिता ।।24।।

Also Read: दुर्गा सप्तशती (सभी स्तोत्र)

तां दुर्गा दुर्गमां देवीं दुराचारविघातिनीम् ।
नमामि भवभीतोऽहं संसारार्णवतारिणीम् ।।25।।

 इदमर्थर्वशीर्षं योऽधीते स पन्चाथर्वशीर्षजपफलमाप्नोति।
इदमथर्वशीर्षमज्ञात्वा योऽर्चां स्थापयति-शतलक्षं प्रजप्त्वापि सोऽर्चासिद्धिं न विन्दति।
शतमष्टोत्तरं चास्य पुरश्चर्याविधिः स्मृतः।
दशवारं पठेद् यस्तु सद्यः पापैः प्रमुच्यते ।
महादुर्गाणि तरति महादेव्याः प्रसादतः ।।26।।

सायमधीयानो दिवसकृतं पापं नाश्यति । प्रातरधीयानो रात्रिकृतं पापं नाश्यति ।
सायं प्रातः प्रयुञ्जानो अपापो भवति । निशीथे तुरीय संध्यायां जप्त्वा वाक्सिद्धिर्भवति।
नूतनायां प्रतिमायां जप्त्वा देवतासांनिध्यं भवति ।
प्राणप्रतिष्ठायां जप्त्वा प्राणानां प्रतिष्ठा भवति ।
भौमाश्विन्यां महादेवीसंनिधौ जप्त्वा महामृत्युं तरति ।
स महामृत्युं तरति य एवं वेद । इत्युपनिषत् ।।

। इति श्री देव्यथर्वशीर्षम् संपूर्णम् ।

Devi Atharva Sheersham Meaning-

हिंदी अर्थ:
ॐ सभी देवता देवी के समीप गए और नम्रता से पूछने लगे- हे महादेवि! तुम कौन हो? ।1।
उस(देवी) ने कहा- मैं ब्रह्मस्वरूप हूँ। मुझसे प्रकृति-पुरुषात्मक सद्रूप (सुन्दर) और असद्रूप जगत उत्पन्न हुआ है।२।

मैं आनंद और अनानन्दरूपा हूँ। मैं विज्ञान और अविज्ञानरूपा हूँ। अवश्य जानने योग्य ब्रह्म और अब्रह्म भी मैं ही हूँ। पंचीकृत और पंचीकृत जगत भी मैं ही हूँ। यह सारा दृश्य जगत मैं ही हूँ ।3।
वेद और अवेद मैं हूँ। विद्या और अविद्या भी मैं, अजा और अनजा (प्रकृति और उससे भिन्न) भी मैं, नीचे-ऊपर, अगल-बगल भी मैं ही हूँ।4।

मैं रुद्रों और वसुओं के रूप में संचार करती हूँ, मैं आदित्यों और विश्वेदेवों के रूपों में विचरण करती हूँ। मैं मित्र और वरुण दोनों का, इंद्र, अग्नि एवं दोनों अश्विनीकुमारों का भरण पोषण करती हूँ।5।
मैं सोम, त्वष्टा, पूषा और भग को धारण करती हूँ। त्रैलोक्य को आक्रान्त करने के लिए विस्तीर्ण पादक्षेप करने वाले विष्णु, ब्रह्मदेव और प्रजापति को मैं ही धारण करती हूँ।6।

देवों को उत्तम हवि (हवन) पहुंचाने वाले और सोमरस निकालने वाले यजमान के लिए मैं हविर्द्रव्यों से युक्त धन को धारण करती हूँ। मैं सम्पूर्ण जगत की ईश्वरी, उपासकों को धन देने वाली, ब्रह्मरूप और यज्ञार्हों में मुख्य हूँ। मैं आत्मस्वरूप पर आकाश आदि का निर्माण करती हूँ। मेरा स्थान आत्मस्वरूप को धारण करने वाली बुद्धिवृत्ति में है।  जो इस प्रकार जानता है, दैवी संपत्ति लाभ करता है।7।

तब उन देवों ने कहा- देवी को नमस्कार है। बड़े बड़ों को अपने-अपने कर्तव्य में प्रवृत्त करने वाली कल्याणकत्री को सदा नमस्कार है। गुण साम्यावस्थारूपिणी मंगलमयी देवी को नमस्कार है। नियमयुक्त होकर हम उन्हें प्रणाम करते हैं।8।

उन अग्नि के जैसी वर्ण (रंग) वाली, ज्ञान से जगमगाने वाली, दीप्तिमति, कर्मफल प्राप्ति के हेतु सेवन की जाने वाली दुर्गा देवी की हम शरण में हैं। असुरों का नाश करने वाली देवि ! तुम्हे नमस्कार है।9।

प्राणरूप देवों ने जिस प्रकाशवान वैखरी वाणी को उत्पन्न किया, उसे अनेक प्रकार के प्राणी बोलते हैं। वह कामधेनु तुली आनंद दायक और अन्न तथा बल देने वाली वागरूपिणी भगवती उत्तम स्तुति से संतुष्ट होकर हमारे समीप आये।10।

काल का भी नाश करने वाली, वेदों द्वारा स्तुत हुई विष्णुशक्ति, स्कंदमाता (शिवशक्ति), सरस्वती (ब्रह्मशक्ति), देवमाता अदिति और दक्षकन्या (सती), पापनाशिनी कल्याणकारिणी भगवती को हम प्रणाम करते हैं।11।

हम महालक्ष्मी को जानते हैं और उन सर्वशक्तिरूपिणी का ही ध्यान करते हैं। वह देवी हमें उस विषय (ज्ञान-ध्यान) में प्रवृत्त करें।12।

हे दक्ष! आपकी जो कन्या अदिति हैं, वे प्रसूता हुईं और उनसे मृत्युरहित देव उत्पन्न हुए।13।

काम (क), योनि (ए), कमला (ई), वज्रपाणि- इंद्र (ल), गुहा (ह्रीं), ह, स- वर्ण, मातरिश्वा- वायु (क), अभ्र (ह), इंद्र (ल), पुनः गुहा (ह्रीं), स, क, ल- वर्ण और माया (ह्रीं)- या सर्वात्मिका जगन्माता की मूलविद्या है और वह ब्रह्मस्वरूपिणी है।14।

ये परमात्मा की शक्ति हैं। ये विश्वमोहिनी हैं। पाश, अंकुश, धनुष और बाण धारण करने वाली हैं। ये श्री महाविद्या हैं। जो ऐसा जानता है, वह शोक को पार आकर जाता है।15।

भगवती! तुम्हे नमस्कार है। माता! सब प्रकार से हमारी रक्षा करो।16।

(मन्त्रदृष्टा ऋषि कहते हैं-) वही ये अष्ट वासु हैं, वही ये एकादश रूद्र हैं, वही ये द्वादश आदित्य हैं, वही ये सोमपान करने वाले और सोमपान न करने वाले विश्वेदेव हैं, वही ये यातुधान (एक प्रकार के राक्षस), असुर, राक्षस, पिशाच, यक्ष और सिद्ध हैं, वही ये सत्त्व-रज और ताम हैं, वही ये ब्रह्म, विष्णु, रुद्ररूपिणी हैं, वही ये प्रजापति-इंद्र-मनु हैं, वही ये ग्रह, नक्षत्र और तारे हैं, वही कला-काष्ठादि कालरूपिणी हैं, उन पाप नाश करने वाली, भोग-मोक्ष देने वाली , अंतरहित, विजयाधिष्ठात्री, निर्दोष शरण लेने योग्य, कल्याणदात्री और मंगल रूपिणी देवी को हम सदा प्रणाम करते हैं।17।

वियत- आकाश (ह) तथा 'ई' कार से युक्त, वीतिहोत्र- अग्नि (र)- सहित, अर्धचंद्र से अलंकृत जो देवी का बीज है, वह सब मनोरथ पूर्ण करने वाला है। इस प्रकार एकाक्षर ब्रह्म (ह्रीं)- का ऐसे यति ध्यान करते हैं, जिनका चित्त का शुद्ध है, जो निरातिशयानन्दपूर्ण और ज्ञान के सागर हैं। (यह मन्त्र देवी का प्रणव माना जाता है। ॐकार के सामान यह मन्त्र भी व्यापक अर्थ से भरा हुआ है) ।18-19।

वाणी (ऐं), माया (ह्रीं), ब्रह्मसू- काम (क्लीं), इसके आगे छठा भोजन अर्थात च, वही वक्त्र अर्थात आकार से युक्त (चा), सूर्य (म), 'अवाम श्रोत्र'- दक्षिण कर्ण (उ) और बिंदु अर्थात अनुस्वार से युक्त (मुं), टकार से तीसरा ड, वही नारायण अर्थात 'आ' से मिश्र (डा), वायु (य), वही अधर अर्थात 'ऐ' से युक्त (यै)और 'विच्चे' यह नवार्ण मन्त्र उपासकों को आनंद और ब्रह्म सायुज्य देने वाला है।
भावार्थ -[हे चित्स्वरुपिणी महासरस्वती! हे सद रूपिणी महालक्ष्मी! हे आनंद रूपिणी महाकाली! ब्रह्मविद्या पाने के लिए हम सब समय तुम्हारा ध्यान करते हैं। हे महाकाली-महालक्ष्मी-महासरस्वती-स्वरूपिणी चण्डिके! तुम्हे नमस्कार है। अविद्या रूप रज्जू की दृढ ग्रंथि को खोलकर मुझे मुक्त करो] ।20।

हृतकमल के मध्य में रहने वाली, प्रातःकालीन सूर्य के समान प्रभा वाली, पाश और अंकुश धारण करने वाली, मनोहर रूपवाली, वरद और अभयमुद्रा धारण किये हाथों वाली, तीन नेत्रों से युक्त, रक्तवस्त्र परिधान करने वाली और कामधेनु के समान भक्तों के मनोरथ पूर्ण करने वाली देवी को मैं भजता हूँ।21।

महाभय का नाश करने वाली, महासंकट को शांत करने वाली और महान करुना की साक्षात मूर्ति तुम महादेवी को मैं नमस्कार करता हूँ।22।

जिसका स्वरुप ब्रह्मादिक नहीं जानते- इसलिए जिसे अज्ञेया कहते हैं, जिसका अंत नहीं मिलता- इसीलिए जिसे अनंता कहते हैं, जिसका लक्ष्य दिखाई नहीं पड़ता- इसीलिए जिसे अलक्ष्या कहते हैं, जिनका जन्म समझ में नहीं आता- इसीलिए जिसे अजा कहते हैं, जो अकेली ही सर्वत्र है- इसीलिए जिसे एका कहते हैं, जो अकेली ही विश्वरूप में सजी हुई है- इसीलिए जैसे नैका कहते हैं, वह इसीलिए अज्ञेया, अनंता, अलक्ष्या, अजा, एका, नैका कहाती हैं।23।

सब मन्त्रों में 'मातृका'- मूलाक्षर रूप से रहने वाली, शब्दों में ज्ञान (अर्थ)- रूप से रहने वाली, ज्ञानों में 'चिन्मयातीता', शून्यों में 'शून्यसाक्षिणी' तथा जिनसे और कुछ भी श्रेष्ठ नहीं है, वे दुर्गा के नाम से प्रसिद्ध हैं।24।

उन दुर्विज्ञेय, दुराचार नाशक और संसार सागर से तारने वाली दुर्गा देवी को संसार से डरा हुआ मैं नमस्कार करता हूँ।२५।

इस अथर्वशीर्ष का जो अध्ययन करता है, उसे पाँचों अथर्शीर्षों के जप का फल प्राप्त होता है। इस अथर्वशीर्ष को न जानकार जो प्रतिमा स्थापन करता है, वह सैकड़ों लाख जप करके भी अर्चासिद्धि नहीं प्राप्त करता। अष्टोत्तर जप (108 बार) इसकी पुरश्चरण विधि है। जो इसका दस बार पाठ करता है वह उसी क्षण पापों से मुक्त हो जाता है और महादेवी के पसाद से बड़े दुस्तर संकटों को पार कर जाता है।२६।

फलश्रुति- इसका सायंकाल में अध्ययन करने वाला दिन मेंकिये हुए पापों का नाश करता है, प्रातः काल में अध्ययन करने वाला रात्री में किये हुए पापों का नाश करता है। दोनों समय अध्ययन करने वाला निष्पाप होता है। मध्यरात्रि में तुरीय संध्या के समय जप करने से वाकसिद्धि प्राप्त होती है। नयी प्रतिमा पर जप करने से देवता सान्निध्य प्राप्त होता है। प्राणप्रतिष्ठा के समय जप करने से प्राणों की प्रतिष्ठा होती है। भौमाश्विनी (अमृतसिद्धि) योग में महादेवी की सन्निधि में जप करने से महामृत्यु से तर जाता है।  जो इस प्रकार जानता है, वह महामृत्यु से तर जाता है। इस प्रकार यह अविद्यानाशिनी ब्रह्मविद्या है।।
इस प्रकार देव्यथर्वशीर्ष स्तोत्र का अर्थ पूरा हुआ।

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