Thursday, July 30, 2020

Durga Dwatrinsha NaamaMala Lyrics in hindi दुर्गा द्वात्रिंश नामावली

Maa durga
Devi Durga

यह स्तोत्र मार्कण्डेय पुराण के देवी माहात्म्य से लिया गया है तथा इस लेख के कुछ भाग गीताप्रेस (गोरखपुर) की पुस्तक देवी दुर्गा सप्तशती (Learn More) से प्रेरित हैं, इस पुस्तक को अमेजोन से खरीदने के लिए यहाँ क्लिक करें - दुर्गा सप्तशती (मात्र 59 रूपए)

। अथ दुर्गाद्वात्रिंशन्नाममाला ।

दुर्गा दुर्गतिशमनी दुर्गापद्विनिवारिणी।
दुर्गमच्छेदिनी दुर्गसाधिनी दुर्गनाशिनी।

दुर्गतोद्धारिणी दुर्गनिहन्त्री दुर्गमापहा।
दुर्गमज्ञानदा, दुर्गदैत्यलोकदवानला ।।

दुर्गमा दुर्गमालोका दुर्गमात्मस्वरूपिणी।
दुर्गमार्गप्रदा दुर्गमविद्या दुर्गमाश्रिता ।।

दुर्गमज्ञानसंस्थाना दुर्गमध्यानभासिनी।
दुर्गमोहा दुर्गमगा दुर्गामार्थस्वरूपिणी।।

दुर्गमासुरसन्हंत्री दुर्गमायुधधारिणी।
दुर्गमाङ्गी दुर्गमता दुर्गम्या दुर्गमेश्वरी।।
दुर्गभीमा दुर्गभामा दुर्गभा दुर्गदारिणी।।

नामावलिमिमां यस्तु दुर्गाया मम मानवः।
पठेत् सर्वभयान्मुक्तो भविष्यति न संशयः।। 
 
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हिंदी अर्थ-
एक समय कि बात है, ब्रम्हा आदि देवताओं ने पुष्प आदि विविध उपचारों से महेश्वरी दुर्गा का पूजन किया। इससे प्रसन्न होकर दुर्गतिनाशिनी कहा- 'देवताओं ! मैं पूजन से संतुष्ट हूँ, तुम्हारी जो इच्छा हो, माँगो, मैं तुम्हें दुर्लभ से दुर्लभ वस्तु भी प्रदान करुँगी।' 

दुर्गा का यह वचन सुनकर देवता बोले - 'देवी ! हमारे शत्रु महिषासुर को,जो तीनों लोकों के लिए कंटक था, आपने मार डाला, इससे सम्पूर्ण जगत स्वस्थ एवं निर्भय हो गया। आपकी ही कृपा से हमें पुनः अपने अपने पद की प्राप्ति हुई। 

आप भक्तों के लिए कल्पवृक्ष हैं,  हम आपकी शरण में आये हैं। अतः अब हमारे मन में कुछ भी  अभिलाषा शेष नहीं है। हमे सब कुछ मिल गया; तथापि आपकी आज्ञा है, इसलिए हम जगत की रक्षा के लिए आपसे कुछ पूछना चाहते हैं। 

महेश्वरि!कौन सा ऐसा उपाय है, जिससे शीघ्र प्रसन्न होकर आप संकट में पड़े हुए जीव की रक्षा करती है।  देवेश्वरि! यह बात सर्वथा गोपनीय हो गोपनीय हो तो भी हमें अवश्य बतावें।'

देवताओं के इस प्रकार प्रार्थना करने पर दयामयी दुर्गादेवी ने कहा- 'देवगण! सुनो- यह रहस्य अत्यंत गोपनीय और दुर्लभ है । मेरे बत्तीस नामों कि माला सब प्रकार की आपत्ति का विनाश करने वाली है । तीनों लोकों में इसके सामान दूसरी कोई स्तुति नहीं है।

 यह रहस्यरूप है। इसे बतलाती हूँ, सुनो- 
१- दुर्गा, २- दुर्गातिशमिनी, ३- दुर्गापद्विनिवारिणी, ४- दुर्गमच्छेदिनी, ५- दुर्गसाधिनी, ६- दुर्गनाशिनी, ७- दुर्गतोद्धारिणी, ८- दुर्गनिहंत्री, ९- दुर्गमापहा, १०- दुर्गमज्ञानदा, ११- दुर्गदैत्यलोकद्वानला, १२- दुर्गमा, १३- दुर्गमालोका, १४- दुर्गमात्मस्वरूपिणी, १५- दुर्गमार्गप्रदा, १६- दुर्गमविद्या, १७- दुर्गमाश्रिता, १८- दुर्गमज्ञानसंस्थाना, १९- दुर्गमध्यानभासिनी, २०- दुर्गमोहा, २१- दुर्गमगा, २२-दुर्गामार्थस्वरूपिणी, २३- दुर्गमासुरसन्हंत्री, २४- दुर्गमायुधधारिणी, २५- दुर्गमाङ्गी, २६- दुर्गमता, २७- दुर्गम्या, २८- दुर्गमेश्वरी, २९- दुर्गभीमा, ३०- दुर्गभामा, ३१- दुर्गभा, ३२- दुर्गदारिणी। 

जो मनुष्य मुझ दुर्गा कि इस नाममाला का पाठ करता है, वह निसंदेह सब प्रकार के भय से मुक्त हो जायेगा। '

कोई शत्रुओं से पीड़ित हो अथवा दुर्भेद्य बंधन में पड़ा हो, इन बतीस नामों के पाठ मात्र से संकट से छुटकारा पा जाता है। इसमें तनिक भी संदेह के लिए स्थान नहीं हैं।

यदि राजा क्रोध में भरकर वध के लिए अथवा और किसी कठोर दंड के लिए आज्ञा  युद्ध में शत्रुओं द्वारा मनुष्य घिर जाये अथवा वन में व्याघ्र आदि हिंसक जंतुओं के चंगुल में फँस जाये, तो इन बतीस नामों का एक सौ आठ बार पाठ मात्र करने से वह संपूर्ण भयों से मुक्त हो जाता है। 

विपत्ति के समय इसके सामान भय नाशक उपाय दूसरा नहीं है। देवगण! इस नाममाला का पाठ करने वाले मनुष्यों को कभी कोई हनी नही होती। अभक्त, नास्तिक और शठ मनुष्य को इसका उपदेश नहीं देना चाहिए। जो भारी विपत्ति में पड़ने पर भी इस नामावली का हज़ार, दस हज़ार अथवा लाख बार पाठ स्वयं करता या ब्राम्हणों से करता है, वह सब प्रकार कि आपतियों से मुक्त हो जाता है। 

सिद्ध अग्नि में मधुमिश्रित सफ़ेद तिलों से इन नामों द्वारा लाख बार हवन तो मनुष्य सब विपत्तियों से छूट जाता है। इस नाममाला का पुरश्चरण तीस हज़ार का है।

पुरश्चरणपूर्वक पाठ करने से मनुष्य इसके द्वारा संपूर्ण कार्य सिद्ध कर सकता है। मेरी सुन्दर मिटटी कि अष्टभुजा मूर्ति बनावे, आतों भुजाओं में क्रमशः गदा, खडग, त्रिशूल, बाण, धनुष,कमल, खेट(ढाल) और मुद्गर धारण करावे। 

मूर्ति के मस्तक में चन्द्रमा का चिन्ह हो, उसके तीन नेत्र हो, उसे लाल वस्त्र पहनाया गया हो, वह सिंह के कंधे पर सवार हो और शूल से महिषाशुर का वध कर रही हो, इस प्रकार कि प्रतिमा बनाकर नाना प्रकार कि सामग्रियों से भक्तिपूर्वक मेरा पूजन करे।

मेरे उक्त नामों से लाल कनेर के फूल चढाते हुए सौ बार पूजा करे और मंत्र जप करते हुए पुए से हवन करे। भांति-भांति के उत्तम पदार्थ भोग लगावे। इस प्रकार करने से मनुष्य असाध्य कार्य को भी सिद्ध कर लेता है। जो मानव प्रतिदिन मेरा भजन करता है, वह कभी विपत्ति में नहीं पड़ता। '

देवताओं से ऐसा कहकर जगदम्बा वहीं अंतर्ध्यान हो गयीं। दुर्गा जी के इस उपाख्यान को जो सुनते है, उन पर कोई विपत्ति नहीं आती। समाप्त...  

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Tuesday, July 21, 2020

Dasavatara Stotram lyrics in Sanskrit दशावतार स्तोत्रं अर्थ सहित

Shri Vishnu

दशावतार स्तोत्रं हिंदी अर्थ सहित-

। अथ श्री दशावतार स्तोत्रम् ।
मीन अवतार-
प्रलयपयोधिजले धृतवानसि वेदम । विहितवहित्रचरित्रमखेदम् |
केशव धृतमीनशरीर जय जगदीश हरे ।1।

हे केशव! प्रलय के समय तुमने विशाल मछली का रूप धारण करके वेदों को एक नाव (जो बिना खेद के किसी भी वस्तु को पार ले जाती है) के समान सुरक्षा प्रदान की, हे जगदीश तुम्हारी जय हो।

कूर्म अवतार-
छितिरतिविपुलतरे तव तिष्ठति प्रष्ठे । धरणिधरणकिणचक्रगरिष्ठे।
केशव धृतकच्छपरूप जय जगदीश हरे ।2।

हे केशव! आपकी पीठ पर मन्दराचल पर्वत स्थित है, जिसके कारण आपकी पीठ पर गोल निशान बने हुए हैं, इस कूर्म अवतार के रूप में हे जगदीश तुम्हारी जय हो।

वराह अवतार-
वसति दशनशिखरे धरणी अव लग्ना । शशिनि कलन्कलेव निमग्ना।
केशव धृतसूकररूप जय जगदीश हरे ।3।

हे केशव! पृथ्वी, जो समुद्र में डूब गयी थी, वह आपके दाँतों के ऊपर चंद्रमा पर लगे दाग की भांति स्थित है, शूकर अवतार के रूप में हे जगदीश तुम्हारी जय हो।

नृसिंह अवतार-
तव करकमलवरे नखमद्भुतशृंगम्। दलितहिरण्यकशिपुतनुभृङ्गम् ।
केशव धृतनरहरिरूप जय जगदीश हरे ।4।

हे केशव! आपके कर कमलों के तीखे नाखून अनोखे हथियार हैं, जिनसे आपने हिरण्यकश्यप के शरीर को फाड़ दिया, हे जगदीश नरसिंह अवतार के रूप में आपकी जय हो।

वामन अवतार-
छल्यसि विक्रमणे बलिमद्भुतवामन । पदनखनीरजनितजनपावन।
केशव धृतवामनरूप जय जगदीश हरे ।5।

हे केशव! एक वामन का रूप धारण करके  वीर राजा बलि को पराजित किया, आपके पद नखों से सभी को पावन करने वाली गंगा निकलती है, वामन अवतार में हे जगदीश, तुम्हारी जय हो।

परशुराम अवतार-
क्षत्रिययरूधिरमये  जगदपगतपापम । सनपयसि पयसि शमितभवतापम ।
केशव धृतभृगुपतिरूप जय जगदीश हरे ।6।

हे केशव! तुमने अत्याचारी क्षत्रियों के रक्त से पृथ्वी को नहलाकर पाप मुक्त किया है और तुमने जगत की वेदना दूर की है, भृगुपति (परशुराम) अवतार के रूप में हे जगदीश, तुम्हारी जय हो।

राम अवतार-
वितरसि दिक्षु रणे दिक्पतिकमनीयम । दशमुखमौलिबलिं रमणीयम् ।
केशव धृतरघुपतिवेष जय जगदीश हरे ।7।

हे केशव! धर्म की स्थापना हेतु तुमने दस दिग्पालों को रावण के 10 मुख वितरित (अर्पित) किये, श्री राम अवतार के रूप में हे जगदीश तुम्हारी जय हो।

बलराम अवतार-
वहसि वपुषे विशदे वसनं जलदाभम। हलहतिभीतिमिलितमुनाभम् ।
केशव धृतहलधररूप जय जगदीश हरे ।8।

हे केशव! आपने मेघों के रंग के समान नीले वस्त्र धारण किये हैं, ऐसा लगता है मानो यमुना आपके हल से भयभीत हो आपके वस्त्रों में छुपी हैं, हे जगदीश, हलधर (बलराम) अवतार में आपकी जय हो।

बुद्ध अवतार-
निन्दसि यज्ञविधेरहह श्रुतिजातम । सदयह्रदयदर्शितपशुघातम्।
केशव धृतबुद्धशरीर जय जगदीश हरे ।9।

हे केशव! यज्ञों में पशु बलि का निंदा करने वाले, सभी जीवों पर करुणा करने वाले दयालुह्रदय प्रभु, बुद्ध अवतार धारण करने वाले हे जगदीश तुम्हारी जय हो।

कल्कि अवतार-
मलेक्छनिवहनिधने कलयसि करवालम । धूमकेतुमिव किमपि करालम ।
केशव धृतकल्किशरीर जय जगदीश हरे ।10।

म्लेच्छों का विनाश करने के लिए भयंकर तलवार लिए हुए धूमकेतु के समान प्रतीत होने वाले हे केशव, कल्कि शरीर (अवतार) में हे जगदीश आपकी जय हो।

श्रिजय्देवकवेरिदमुदितमुदारम् । शृणु सुखदं शुभदं भवसारम ।
केशव धृतदशविधरूप जय जगदीश हरे ।11।

दस रूपों में अवतार लेने वाले हे जगदीश! आप जयदेव द्वारा रचित यह सुखप्रद, शुभकारी, कल्याणप्रद स्तुति सुनें।
। इति श्री दशावतारस्तोत्रम् संपूर्णम् ।

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