Wednesday, May 30, 2018

Keelak Stotram | कीलक स्तोत्र अर्थ सहित Lyrics

Chandi Keelak Stotram


कीलक स्तोत्र का पाठ दुर्गा सप्तशती (देवी माहात्म्य) के अंतर्गत किया जाता है। इस स्तोत्र का पाठ अनिवार्य रूप से दुर्गा कवच और अर्गला स्तोत्र के बाद किया जाता है।

इस स्तोत्र के पहले मंत्र का ३१ बार प्रतिदिन जप करने से मन में शान्ति प्राप्त होती है। यहाँ कीलक स्तोत्र का पूरा विवरण अर्थ सहित दिया गया है। 
~~अथ कीलक स्तोत्रम्~~
विनियोगः- ॐ अस्य कीलकमंत्रस्य शिव ऋषिः अनुष्टुप् छन्दः श्रीमहासरस्वती देवता श्रीजगदम्बाप्रीत्यर्थं सप्तशतीपाठाङ्गत्वेन जपे विनियोगः।।
ॐ नमश्चण्डिकायै
मार्कण्डेय उवाच
ॐ विशुद्धज्ञानदेहाय त्रिवेदीदिव्यचक्षुषे ।
श्रेयःप्राप्तिनिमित्ताय नमः सोमार्धधारिणे ।।१।।
सर्वमेतद्विजानियान्मंत्राणामभिकीलकम् ।
सो-अपि क्षेममवाप्नोति सततं जाप्यतत्परः ।।२।।

मार्कण्डेय जी कहते हैं- विशुद्ध ज्ञान ही जिनका शरीर है, तीनों वेद ही जिनके तीन नेत्र हैं, जो कल्याण प्राप्ति के हेतु हैं तथा अपने मस्तक पर अर्धचंद्र धारण करते हैं, उन भगवान् शिव को नमस्कार है। मन्त्रों का जो अभिकीलक है अर्थात मन्त्रों की सिद्धि में विघ्न उपस्थित करने वाले शापरूपी कीलक का निवारण करने वाला है, उस सप्तशती स्तोत्र को सम्पूर्ण रूप से जानना चाहिए (और जानकर उसकी उपासना करनी चाहिए)।।१-२।।

सिध्यन्त्युच्याटनादीनि वस्तुनि सकलान्यपि।
एतेन स्तुवतां देवी स्तोत्रमात्रेण सिद्ध्यति ।। ३।।
न मन्त्रो नौषधं तत्र न किञ्चिदपि विद्यते।
विना जाप्येन सिद्ध्यते सर्वमुच्चाटनादिकम् ।।४।।

उसके भी उच्चाटन आदि कर्म सिद्ध होते हैं उसे भी समस्त दुर्लभ वस्तुओं की प्राप्ति होती है; तथापि जो अन्य मन्त्रों का जप न करके केवल इस सप्तशती नामक स्तोत्र से ही देवी की स्तुति करते हैं, उन्हें स्तुति मात्र से ही सच्चिदानन्दस्वरूपिणी देवी सिद्ध हो जाती हैं। उन्हें अपने कार्य की सिद्धि के लिये मंत्र, औषधि तथा अन्य किसी साधन के उपयोग की आवश्यकता नहीं रहती | बिना जप के उनके उच्चाटन आदि समस्त अभिचारिक कर्म सिद्ध हो जाते हैं ।।३-४।।

समग्राण्यपि सिद्धयन्ति लोकशङ्कामिमां हरः।
कृत्वा निमन्त्रयामास  सर्वमेवमिदं शुभम् ।।५।।
स्तोत्रं वै चण्डिकायास्तु तच्च गुप्तं चकार सः।

समाप्तिर्न च पुण्यस्य तां यथावान्नियन्त्रणाम् ।।६।।

इतना ही नहीं ,उनकी संपूर्ण अभीष्ट वस्तुएँ भी सिद्ध होती है | लोगों के मन में यह शंका थी कि 'जब केवल सप्तशती की उपासना से भी सामान रूप से अथवा सप्तशती को छोड़कर अन्य मंत्रो की उपासना से भी सामान रूप से सब कार्य सिद्ध होते है, अब इनमे श्रेष्ठ कौन सा साधन है?' लोगों की इस शंका को सामने रखकर भगवान् शंकर ने अपने पास आए हुए जिज्ञासुओं को समझाया की यह सप्तशती नामक संपूर्ण स्रोत ही सर्वश्रेष्ठ एवं कल्याणमय है तदनन्तर भगवती चण्डिकाके सप्तशती नामक स्त्रोत को महादेव जी ने गुप्त कर दिया; सप्तशती के पाठसे जो पुण्य प्राप्त होता है, उसकी कभी समाप्ति नहीं होती; किंतु अन्य मंत्रो के जपजन्य पुण्य की समाप्ति हो जाती है, अतः भगवान् शिव ने अन्य मंत्रो की अपेक्षा जो सप्तशती की ही श्रेष्ठता का निर्णय किया उसे जानना चाहिए ।।५-६।।

सोअपि  क्षेममवाप्नोति  सर्वमेवं न संशयः।
कृष्णायां वा चतुर्दश्यामष्टम्यां वा समाहितः ।।७।।
ददाति प्रतिगृह्णाति नान्यथैषा प्रसीदति।
इत्थंरूपेण कीलेन महादेवेन कीलितम ।।८।।

अन्य मंत्रो का जप करनेवाला पुरुष भी यदि सप्तशती के स्त्रोत और जप का अनुष्ठान कर ले तो वह भी पूर्ण रूप से ही कल्याण का भागी होता है, इसमें तनिक भी संदेह नहीं है, जो साधक कृष्णपक्ष की चतुर्दशी अथवा अष्टमी को एकाग्रचित होकर भगवती कीसेवा में अपना सर्वस्वा समर्पित कर देता है और फिर उसे प्रसाद रूप से ग्रहण करता है, उसी पर भगावती प्रसन्न होती है; अन्यथा उनकी प्रसन्नता नहीं प्राप्त होती; इस प्रकार सिद्धि के प्रतिबंधक रूप कीलके द्वारा महादेव जी ने इस स्त्रोत को कीलित कर रखा है ।।७-८।।

यो निष्कीलां विधायैनां नित्यं जपति संस्फुटम्।
स सिद्धः स गणः सोअपि गन्धर्वो जायते नरः।।9।।
न चैवाप्यटतस्तस्य भयं क्वापीह जायते।
नापमृत्युवशं याति मृतो मोक्षमवाप्नुयात् ।।१०।।

जो पूर्वोक्त रीति से निष्कीलन करके इस सप्तसती स्त्रोत का प्रतिदिन स्पष्ट उच्चारणपूर्वक पाठ करता है, वह मनुस्य सिद्ध हो जाता है, वही देवी का पार्षद होता है और वही गांधर्व भी होता है । सर्वत्र विचरते रहने पर भी इस संसार में उसे कहीं भी भय नहीं होता | वह अपमृत्यु के वश में नहीं पड़ता तथा देह त्यागने के अनन्तर मोक्ष प्राप्त कर लेता है।।9-10।।

ज्ञात्वा प्रारभ्य कुर्वीत न कुर्वाणो विनश्यति।
ततो ज्ञात्वैव सम्पन्नमिदं प्रारभ्यते बुधैः ।।११।।
सौभाग्यादि च यत्किञ्चित्त दृश्यते ललनाजने।
तत्सर्वं  तत्प्रसादेन तेन  जाप्यमिदं शुभम् ।।१२।।

अतः कीलन को जानकार उसका परिहार करके ही सप्तसती का पाठ आरंभ करे, जो ऐसा ही करता उसका नाश हो जाता है, इसलिए कीलकऔर निष्कीलन का ज्ञान प्राप्त करने पर ही यह स्त्रोत निर्दोष होता है और विद्वान् पुरुष इस निर्दोष स्तोत्र का ही पाठ आरंभ करते है। स्त्रियों में जो कुछ भी सौभाग्य आदि दृश्टिगोचर होता है, वह सब देवी के प्रसाद का ही फल है | अतः इस कल्याणमय स्त्रोत का सदा जप करना चाहिए ।।११-१२।।

शनैस्तु जप्यमाने-अस्मिन स्तोत्रे सम्पत्तिरुच्चकैः।
भवत्येव  समग्रापि  ततः  प्रारभ्यमेव  तत् ।।१३।।
ऐश्वर्यं    यत्प्रसादेन   सौभाग्यारोग्यसम्पदः।
शत्रुहानिः परो मोक्षः स्तूयते सा न किं जनैः।।ॐ।।१४।।

इस स्त्रोत का मंद स्वर से पाठ करने पर स्वल्प फल की सिद्धि है, अतः उच्च स्वर से ही इसका पाठ आरंभ करना चाहिए जिनके प्रसाद से ऐश्वर्य, सौभाग्य, आरोग्य, सम्पत्ति, शत्रुनाश तथा परम मोक्ष की भी सिद्धि होती है, उन कल्याणमयी जगदम्बा की स्तुति मनसा क्यों नहीं करते ?
इति श्री देव्याः कीलकस्तोत्रम सम्पूर्णम् ।

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Thursday, May 24, 2018

अर्गला स्तोत्रम् | Argala Stotram lyrics in Hindi

argala stotram prayer hindi sanskrit
jayanti mangla

अर्गला स्तोत्र का पाठ दुर्गा कवच के बाद और कीलक स्तोत्र के पहले किया जाता है। यह देवी माहात्म्य के अंतर्गत किया जाने वाला स्तोत्र अत्यंत शुभकारक और लाभप्रद है।

इस स्तोत्र का पाठ नवरातत्रि के अलावा देवी पूजन में भी किया जाता है।

।। अथार्गलास्तोत्रम् ।।

विनियोग- ॐ अस्य श्री अर्गलास्तोत्रमन्त्रस्य विष्णुर्ऋषिः अनुष्टुप छन्दः श्रीमहालक्ष्मीर्देवता श्रीजगदम्बाप्रीतये सप्तशती पाठाङ्गत्वेन जपे विनियोगः ।

ॐ नमश्चण्डिकायै
[ मार्कण्डेय उवाच ]
ॐ जयंती मंगला काली भद्रकाली कपालिनी।
दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोऽस्तुते ।। १।।
जय त्वं देवि चामुण्डे जय भूतार्तिहारिणि।
जय सर्वगते देवि कालरात्रि नमोऽस्तुते ।।२।।

ॐ चंडिका देवी को नमस्कार है। 
मार्कण्डेय जी कहते हैं - जयन्ती, मंगला, काली, भद्रकाली, कपालिनी, दुर्गा, क्षमा, शिवा, धात्री, स्वाहा और स्वधा - इन नामों से प्रसिद्ध जगदम्बिके! तुम्हें मेरा नमस्कार हो। देवि चामुण्डे! तुम्हारी जय हो। सम्पूर्ण प्राणियों की पीड़ा हरने वाली देवि! तुम्हारी जय हो। सब में व्याप्त रहने वाली देवि! तुम्हारी जय हो। कालरात्रि! तुम्हें नमस्कार हो।।

मधुकैटभविद्राविविधातृ वरदे नमः।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि।।३।।
महिषासुरनिर्णाशि भक्तनाम सुखदे नमः।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि।। ४।।

मधु और कैटभ को मारने वाली तथा ब्रह्माजी को वरदान देने वाली देवि! तुम्हे नमस्कार है। तुम मुझे रूप (आत्मस्वरूप का ज्ञान) दो, जय (मोह पर विजय) दो, यश (मोह-विजय और ज्ञान-प्राप्तिरूप यश) दो और काम-क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो।। महिषासुर का नाश करने वाली तथा भक्तों को सुख देने वाली देवि! तुम्हें नमस्कार है। तुम रूप दो, जय दो, यश दो और काम-क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो ।।३-४।।

रक्तबीजवधे देवि चण्डमुण्डविनाशिनी।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ।। ५ ।।
शुम्भस्यैव निशुम्भस्य धूम्राक्षस्य च मर्दिनी।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि।। ६।।

रक्तबीज का वध और चण्ड-मुण्ड का विनाश करने वाली देवि! तुम रूप दो, जय दो, यश दो और काम-क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो ।। शुम्भ और निशुम्भ तथा धूम्रलोचन का मर्दन करने वाली देवि! तुम रूप दो, जय दो, यश दो और काम-क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो ।।५-६।।

वन्दिताङ्घ्रियुगे देवि सर्वसौभाग्यदायिनी।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि।। ७।।
अचिन्त्यरूपचरिते सर्वशत्रुविनाशिनि।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि।। ८।।

सबके द्वारा वन्दित युगल चरणों वाली तथा सम्पूर्ण सौभग्य प्रदान करने वाली देवि! तुम रूप दो, जय दो, यश दो और काम-क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो ।। देवि! तुम्हारे रूप और चरित्र अचिन्त्य हैं। तुम समस्त शत्रुओं का नाश करने वाली हो। तुम रूप दो, जय दो, यश दो और काम-क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो ।।७-८।।

नतेभ्यः सर्वदा भक्त्या चण्डिके दुरितापहे।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि।। ९।।
स्तुवद्भ्यो भक्तिपूर्वं त्वाम चण्डिके व्याधिनाशिनि।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ।। १०।।

पापों को दूर करने वाली चण्डिके! जो भक्तिपूर्वक तुम्हारे चरणों में सर्वदा (हमेशा) मस्तक झुकाते हैं, उन्हें रूप दो, जय दो, यश दो और काम-क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो ।। रोगों का नाश करने वाली चण्डिके! जो भक्तिपूर्वक तुम्हारी स्तुति करते हैं, उन्हें तुम रूप दो, जय दो, यश दो और काम-क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो ।।९-१०।।

चण्डिके सततं ये त्वामर्चयन्तीह भक्तितः।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि।। ११।।
देहि सौभाग्यमारोग्यं देहि मे परमं सुखम्।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि।। १२।।

चण्डिके! इस संसार में जो भक्तिपूर्वक तुम्हारी पूजा करते हैं उन्हें रूप दो, जय दो, यश दो और काम-क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो ।। मुझे सौभाग्य और आरोग्य (स्वास्थ्य) दो। परम सुख दो, रूप दो, जय दो, यश दो और काम-क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो ।।११-१२।।

विधेहि द्विषतां नाशं विधेहि बलमुच्चकैः।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि।। १३।।
विधेहि देवि कल्याणम् विधेहि परमां श्रियम।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि।। १४।।

जो मुहसे द्वेष करते हों, उनका नाश और मेरे बल की वृद्धि करो। रूप दो, जय दो, यश दो और काम-क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो ।। देवि! मेरा कल्याण करो। मुझे उत्तम संपत्ति प्रदान करो। रूप दो, जय दो, यश दो और काम-क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो ।। १३-१४।।

सुरसुरशिरोरत्ननिघृष्टचरणेम्बिके।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि।। १५।।
विद्यावन्तं यशवंतं लक्ष्मीवन्तं जनं कुरु।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि।। १६।।

अम्बिके! देवता और असुर दोनों ही अपने माथे के मुकुट की मणियों को तुम्हारे चरणों पर घिसते हैं तुम रूप दो, जय दो, यश दो और काम-क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो ।। तुम अपने भक्तजन को विद्वान, यशस्वी, और लक्ष्मीवान बनाओ तथा रूप दो, जय दो, यश दो और काम-क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो ।।१५-१६।।

प्रचण्डदैत्यदर्पघ्ने चण्डिके प्रणताय मे।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि।। १७।।
चतुर्भुजे चतुर्वक्त्र संस्तुते परमेश्वरि।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि।। १८।।

प्रचंड दैत्यों के दर्प का दलन करने वाली चण्डिके! मुझ शरणागत को रूप दो, जय दो, यश दो और काम-क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो ।। चतुर्भुज ब्रह्मा जी के द्वारा प्रशंसित चार भुजाधारिणी परमेश्वरि! तुम रूप दो, जय दो, यश दो और काम-क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो ।।१७-१८।।

कृष्णेन संस्तुते देवि शश्वत भक्त्या सदाम्बिके।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि।। १९।।
हिमाचलसुतानाथसंस्तुते परमेश्वरि।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि।। २०।।

देवि अम्बिके! भगवान् विष्णु नित्य-निरंतर भक्तिपूर्वक तुम्हारी स्तुति करते रहते हैं। तुम रूप दो, जय दो, यश दो और काम-क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो ।। हिमालय-कन्या पार्वती के पति महादेवजी के द्वारा होने वाली परमेश्वरि! तुम रूप दो, जय दो, यश दो और काम-क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो ।।१९-२०।।

इन्द्राणीपतिसद्भावपूजिते परमेश्वरि।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि।। २१।।
देवि प्रचण्डदोर्दण्डदैत्यदर्पविनाशिनि।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि।। २२।।

शचीपति इंद्र के द्वारा सद्भाव से पूजित होने वाल परमेश्वरि! तुम रूप दो, जय दो, यश दो और काम-क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो ।। प्रचंड भुजदण्डों वाले दैत्यों का घमंड चूर करने वाली देवि! तुम रूप दो, जय दो, यश दो और काम-क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो ।।२१-२२।।

देवि भक्तजनोद्दामदत्तानन्दोदये अम्बिके।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि।। २३।।
पत्नीं मनोरमां देहिमनोवृत्तानुसारिणीम्।
तारिणीं दुर्ग संसारसागरस्य कुलोद्भवाम् ।। २४।।

देवि! अम्बिके तुम अपने भक्तजनों को सदा असीम आनंद प्रदान करती हो। मुझे रूप दो, जय दो, यश दो और काम-क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो ।। मन की इच्छा के अनुसार चलने वाली मनोहर पत्नी प्रदान करो, जो दुर्गम संसार से तारने वाली तथा उत्तम कुल में जन्मी हो।।२३-२४।।

इदं स्तोत्रं पठित्वा तु महास्तोत्रं पठेन्नरः।
स तु सप्तशती संख्या वरमाप्नोति सम्पदाम्। ॐ ।। २५।।

जो मनुष्य इस स्तोत्र का पाठ करके सप्तशती रूपी महास्तोत्र का पाठ करता है, वह सप्तशती की जप-संख्या से मिलने वाले श्रेष्ठ फल को प्राप्त होता है। साथ ही वह प्रचुर संपत्ति भी प्राप्त कर लेता है।।२६।।

।। इति देव्या अर्गला स्तोत्रं सम्पर्णम ।।
 
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Monday, May 14, 2018

Unknown differences between Hinduism and Islam


Hinduism
ऐसे अनेक तथ्य हैं  जिनसे  समाज में भ्रम फैलाया जा रहा है, जैसे कि हिन्दुओं में यह भ्रम है कि हिन्दुओं के ३३ करोड़ भगवान हैं लेकिन असलियत में हिन्दू धर्म में ३३ प्रकार के देवी - देवताओं के होने गयी है |

हिन्दू धर्म और इस्लाम में जमीन आसमान का अंतर है | कुछ अंतर यहाँ दिए गए हैं |

  • हिन्दू धर्म में देश और मातृभूमि को सर्वोच्च स्थान दिया जाता है, इस्लाम में धर्म से बड़ा कुछ नहीं |
  • हिन्दू अपने  भगवान् को किसी भी तरह से मान सकते हैं, अक्सर हिन्दू अपने धर्म का मजाक भी उड़ा देते हैं, इस्लाम में ऐसा करना खतरनाक है |
  • हिन्दू धर्म अन्य धर्मों का विरोध नहीं करता और दूसरे धर्मों को अपनाने की पूरी स्वतंत्रता देता है लेकिन दूसरे धर्मों का सम्मान गलत है और यह एक पाप है |
  • हिन्दू धर्म नास्तिक (ईश्वर को ना मानने वाला) बनने की स्वतंत्रता देता है, इस्लाम में नास्तिक होना पाप है |
  • हिन्दू धर्म एक परम "ईश्वर के अनेक रूप" को मानता है, इस्लाम "केवल और केवल एक ईश्वर" को मानता है |
कुरान (3:56)
जो मुझमें आस्था नहीं रखते, मैं उन्हें घोर यातना के साथ सजा दूंगा,
और उनकी मदद करने वाला कोई नहीं होगा ||

भगवदगीता (18 :63)
कृष्ण (अर्जुन से)- मैंने तुम्हे संसार का संपूर्ण ज्ञान दिया है, इस पर विचार करो,
फिर जैसा चाहते हो वैसा करो ||

  • इस्लाम १५०० साल पुराना है, जबकि हिन्दुओं का सबसे प्राचीन ज्ञात (known) ग्रन्थ ऋग्वेद १०००० साल से भी ज्यादा पुराना है |
इस्लाम-  औरत को कष्ट देने और सताने से तुम जन्नत में जाओगे |

हिंदुत्व- "यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः,"
(जहाँ नारी की पूजा होती है वहां देवता प्रसन्न होते हैं)

इस्लाम- मुस्लिम अपने धर्म में गलतियां नहीं निकल सकते और ना ही  बोल सकते हैं|

हिंदुत्व- अगर हिन्दू को अपने धर्म में कुछ गलत लगता है तो उसे सुधार करने की पूरी स्वतंत्रता है |

--> हिन्दुओं मुस्लिमों में एक समानता भी है, दोनों की २०६ हड्डियां होती है |

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AshtaLakshmi Stotram lyrics in hindi अर्थ सहित

the hindu prayer stotram
Asht Lakshmi
View This in - || English ||

श्री अष्टलक्ष्मी स्तोत्रम | हिंदी |
देवी शक्ति के आठ रूपों की पूजा का सकारात्मक परिणाम मिलता है | जो व्यक्ति सच्चे मन से अष्टलक्ष्मी स्तोत्र के द्वारा पूजा करता है उसे देवी की कृपा से सुख तथा समृद्धि की प्राप्ति होती है | अष्ट लक्ष्मी स्तोत्र का प्रतिदिन पाठ करने से देवी की असीम अनुकम्पा प्राप्त होती है |

मुख्यतः इस स्तोत्र का पाठ तथा साथ में श्री यंत्र पूजा व्यवसाय और धन की प्राप्ति के लिए किया जाता है | यदि संभव हो तो पूजा के दौरान सफ़ेद वस्त्र पहनने चाहिए |

अष्टलक्ष्मी स्तोत्र का पाठ करने से पहले पूजा के स्थान को अच्छी तरह पवित्र चाहिए | संभव हो तो गंगाजल का प्रयोग करें | अपने सामने लक्ष्मी जी की मूर्ति स्थापित करके श्री यन्त्र को भी स्थापित करना चाहिए | पाठ के अंत में देवी को खीर का भोग अर्पित करके अपने बाद में भोग को प्रसाद के रूप में परिवार में बाँट देना चाहिए |

ॐ- अथ श्री अष्टलक्ष्मी स्तोत्रम -ॐ

आदि लक्ष्मी-
सुमनस वन्दित सुन्दरि माधवि चंद्र सहोदरि हेममये |
मुनिगण वन्दित मोक्षप्रदायिनी मंजुल भाषिणि वेदनुते ||
पङ्कजवासिनि देवसुपूजित सद-गुण वर्षिणि शान्तिनुते |
जय जय हे मधुसूदन कामिनि आदिलक्ष्मि परिपालय माम् || १ ||

धान्य लक्ष्मि-
अयिकलि कल्मष नाशिनि कामिनि वैदिक रूपिणि वेदमये |
क्षीर समुद्भव मङ्गल रुपिणि मन्त्रनिवासिनि मन्त्रनुते ||
मङ्गलदायिनि अम्बुजवासिनि देवगणाश्रित पादयुते |
जय जय हे मधुसूदनकामिनि धान्यलक्ष्मि परिपालय माम् || २ ||

धैर्य लक्ष्मि- 
जयवरवर्षिणि वैष्णवि भार्गवि मन्त्र स्वरुपिणि मन्त्रमये |
सुरगण पूजित शीघ्र फलप्रद ज्ञान विकासिनि शास्त्रनुते ||
भवभयहारिणि पापविमोचनि साधु जनाश्रित पादयुते |
जय जय हे मधुसूदन कामिनि धैर्यलक्ष्मि सदापालय माम् || ३ ||

गजलक्ष्मि-
जय जय दुर्गति नाशिनि कामिनि वैदिक रूपिणि वेदमये |
रधगज तुरगपदाति समावृत परिजन मंडित लोकनुते ||
हरिहर ब्रम्ह सुपूजित सेवित ताप निवारिणि पादयुते |
जय जय हे मधुसूदन कामिनि गजलक्ष्मि रूपेण पालय माम् || ४ ||

सन्तानलक्ष्मि-
अयि खगवाहिनी मोहिनि चक्रिणि रागविवर्धिनि ज्ञानमये |
गुणगणवारिधि लोकहितैषिणि सप्तस्वर भूषित गाननुते ||
सकल सुरासुर देव मुनीश्वर मानव वन्दित पादयुते |
जय जय हे मधुसूदन कामिनि सन्तानलक्ष्मि परिपालय माम् || ५ ||

विजयलक्ष्मि-
जय कमलासनि सद-गति दायिनि ज्ञानविकासिनि गानमये |
अनुदिन मर्चित कुङ्कुम धूसर भूषित वसित वाद्यनुते ||
कनकधरास्तुति वैभव वन्दित शङ्करदेशिक मान्यपदे |
जय जय हे मधुसूदन कामिनि विजयक्ष्मि परिपालय माम् || ६ ||

विद्यालक्ष्मि-
प्रणत सुरेश्वरि भारति भार्गवि शोकविनाशिनि रत्नमये |
मणिमय भूषित कर्णविभूषण शान्ति समावृत हास्यमुखे ||
नवनिद्धिदायिनी कलिमलहारिणि कामित फलप्रद हस्तयुते |
जय जय हे मधुसूदन कामिनि विद्यालक्ष्मि सदा पालय माम् || ७ ||

धनलक्ष्मि-
धिमिधिमि धिन्धिमि धिन्धिमि-दिन्धिमी दुन्धुभि नाद सुपूर्णमये |
घुमघुम घुङ्घुम घुङ्घुम घुङ्घुम शङ्ख निनाद सुवाद्यनुते ||
वेद पुराणेतिहास सुपूजित वैदिक मार्ग प्रदर्शयुते |
जय जय हे कामिनि धनलक्ष्मी रूपेण पालय माम् || ८ ||

फ़लशृति-

श्लोक- अष्टलक्ष्मी नमस्तुभ्यं वरदे कामरूपिणि |
विष्णुवक्षःस्थलारूढे भक्तमोक्षप्रदायिनी ||

श्लोक- शङ्ख चक्र गदाहस्ते विश्वरूपिणिते जयः |
जगन्मात्रे च मोहिन्यै मङ्गलम शुभ मङ्गलम ||

 -इति श्री अष्टलक्ष्मी स्तोत्रम सम्पूर्णम- 
 
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Shri Ashtalakshmi Stotra in English

Adilaksmi
sumanasa vandita sundari madhavi, candra sahodari hemamaye
munigana vandita moksapradayani, manjula bhasini vedanute|
pankajavasini deva supujita, sadguna varsini sanityute
jaya jayahe madhusudana kamini, adilaksmi paripalaya mam||1||

Dhanyalaksmi
ayikali kalmasa nasini kamini, vaidika rupini vedamaye
ksira samubhava mangala rupini, mantranivasini mantranute|
mangaladayini ambujavasini, devaganasrita padayute
jaya jayahe madhusudana kamini, dhanyalaksmi paripalaya mam||2||

Dhairyalaksmi
jayavarvarsini vaisnavi bhargavi, mantra svarupini mantramaye
suragana pujita sighra phalaprada, nnana vikasini sastranute|
bhavabhayaharini papavimocani, sadhu janasrita padayute
jaya jayahe madhusudhana kamini, dhairlaksmi paripalaya mam||3||
Gajalaksmi

jaya jaya durgati nasini kamini, sarvaphalaprada sastramaye
radhagaja turagapadati samavrta, parijana mandita lokanute|
harihara brahma supujita sevita, tapa nivarini padayute
jaya jayahe madhusudhana kamini, gajalaksmi rupena palaya mam||4||

Santanalaksmi
ayikhaga vahini mohini chakrini, ragavivardhini  gyaanamaye
gunaganavaradhi lokahitasini, saptasvara bhusita gananute|
sakala surasura deva munisvara, manava vandita padayute
jaya jayahe madhusudana kamini, santanlaksmi paripalaya mam||5||

Vijyalaksmi
jaya kamlasini sadgati dayini, nnanavikasini ganamaye
anudina marcita kun kuma dhusara, bhusita ganayute|
kanakadharastuti vaibhava vandita, sankaradesika manayapade
jaya jayahe madhusudana kamini, vijyalaksmi paripalaya mam||6||

Vidyalaksmi
paranata suresvari bharati bhargavi, sokvinasini ratnamye
manimaya bhusita karnavibhusana, santi samavrta hasyamukhe|
navanidhi dayini kalimalaharni, kamita phalaprada hastayute
jaya jayahe madhusudana kamini, vidyalaksmi sada palaya mam||7||

Dhanalaksmi
dhimidhimi dhindhimi dhindhimi-dindhimi, dundhubhi nada supurnamaye
ghumaghuma ghunghuma ghunghuma ghunghuma,sankha ninadasuvadyanute|
veda puranetihasa supujita, vaidika marga pradarsyute
jaya jayahe madhusudana kamini, dhanlaksmi rupena palaya mam||8||
Phalashruti-
Shlok- astalaksmi namastubhyam varade kamarupini |
visnuvaksah sthala rudhe bhakta moksa pradayini ||

Shlok-sankha cakragadahaste visvarupinite jayah |
jaganmatre ca mohinyai mangalam subha manglam || ॐ ||

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Tuesday, May 8, 2018

शिवलिंग पर दूध क्यों अर्पित करते हैं?

भारत में कुछ ऐसे लोग हैं जो शिवलिंग पर दूध अर्पित करना गलत मानते हैं और कहते हैं कि वह दूध गरीबो को देदो लेकिन इस बात के दुसरे भी पहलू भी हैं .
  • आईये देखते हैं इन्ही लोगो की कुछ हरकतें 
वे कहते हैं की शिवलिंग पर दूध डालना पैसों की बर्बादी है तो ये क्या है-

दूध की कीमत - 40 Rs प्रति लीटर
शैमपेन - 1000 Rs प्रति लीटर

समारोहों में पैसो की बर्बादी -

shiv ling the hindu prayer

तो क्या दीपिका पादुकोण को शराब अर्पित करना सही है -

पार्टीज में पैसो की बर्बादी-

टोमेटो फेस्टिवल में टमाटर की बर्बादी -

बर्थडे का केक गरीबो की भूख नहीं मिटा सकता क्या जो ऐसे बर्बाद कर रहे हो- 

लेकिन उन्हें केवल हिन्दुओं में ही दुनिया भर की गलत बातें नजर आती हैं | लोगो को यही बताने के लिए हमारी इस पोस्ट को आगे बढ़ाएं और शेयर करें ताकि औरों को भी ये बातें मालूम हो |
  • इन बातों की किसी को चिंता नहीं लेकिन शिवलिंग पर दूध डालना उनके लिए गलत है


  • सनातन धर्म के अनुसार भगवान् शिव को संसार का पिता माना जाता है तो आने पिता को दूध अर्पित करने में क्या गलत है ?
  • शिव जी पर अर्पित किया गया दूध प्रसाद माना जाता है और भारत के अनेक मंदिरों में इस दूध को  प्रसाद के रूप में बांटने की परंपरा है |
  • लम्बे समय तक हम अपने परम्पराओं को जाने बिना कोसते रहे जबकि उनके महत्व को हम खुद ही नहीं पहचानते और यह सब पश्चिमी ताकतों के दुष्प्रचार की वजह से है

उनके पास सवाल तो हैं लेकिन जबाब नहीं


मैं बता दूँ कि हमारे पास जवाब हैं इन सवालों के-
  • दिवाली के पटाखे 
  • होली पर पानी प्रयोग करना 
  • करवा चौथ पर व्रत करना 
  • देवों को भोग लगाना 
लेकिन इन का क्या-
  • क्रिसमस पर हजारों पेड़ काटना 
  • ईद पर हजारो बकरों की हत्या 
  • नमाज़ में लाउडस्पीकर प्रयोग करना 
  • NEW YEAR और क्रिसमस पर पटाखों से POLLUTION. 

अंतिम शब्द --
-: जय भोलेनाथ :-

Wednesday, May 2, 2018

Devi Kavacham Lyrics In Hindi देवी कवचम अर्थ सहित

Shri Durga kavach in hindi

Shri Durga devi Kavach (devya kavacham)-

दुर्गा कवच ( Devi Kavach ) का पाठ दुर्गा सप्तशती के पाठ करने से पहले किया जाता है। इस कवच का पाठ करने से देवी भगवती अपने भक्तों पर प्रसन्न होकर उन्हें रक्षा प्रदान करतीं हैं।
इस कवच के पाठ करने के बाद अर्गला स्तोत्र का पाठ और उसके बाद कीलक स्तोत्र का पाठ करना चाहिए। इन तीनों स्तोत्र का पाठ करना अत्यंत शुभ माना जाता है।
।। विनियोगः।।
।। ॐ अस्य श्रीचण्डीकवचस्य ब्रम्हा ऋषि:, अनुष्टुप् छन्द:, चामुण्डा देवता, अङ्गन्यासोक्तमातरो बीजम, दिग्बंधदेवतास्तत्वम, श्रीजगदम्बाप्रीत्यर्थे सप्तशतीपाठाङ्गत्वेन विनियोगः ।।

।। मार्कण्डेय उवाच ।।
ॐ यद्गुह्यं परमं लोके सर्वरक्षाकरं नृणांम|
यन्न कस्यचिदाख्यातं तन्मे ब्रूहि पितामह || १ ||
।। ब्रम्होवाच ।।
अस्ति गुह्यतमं विप्र सर्वभूतोपकारकम |
देव्यास्तु कवचं पुण्यं तच्छृणुष्व महामुने || २ ||

प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रम्ह्चारणी |
तृतीयं चन्द्रघण्टेति कूष्मांडेति चतुर्थकम || 3 ||

पंचमं स्कन्दमातेति षष्ठं कात्यायनीति च |
सप्तमम् कालरात्रीति महागौरीति चाष्टमम् || 4 ||

नवमम् सिद्धिदात्री च नवदुर्गाः प्रकीर्तिताः |
उक्तान्येतानि नामानि ब्रम्हणैव महात्मना || 5 ||

अग्निना दह्यमानस्तु शत्रुमध्ये गतो रणे |
विषमे दुर्गमे चैव भयार्ताः शरणं गताः || 6 ||

न तेषां जायते किँचिदशुभं रणसंकटे |
नापदं तस्य पश्यामि शोकदुःखभयं न हि || 7||

यैस्तु भक्त्या स्मृता नूनं तेषां वृद्धिः प्रजायते |
ये त्वां स्मरन्ति देवेशि रक्षसे तान्न संशयः || 8 ||

प्रेतसंस्था तु चामुण्डा वाराही महिषासना |
ऐन्द्री गजसमारुढा वैष्णवी गरुणासना || 9 ||

माहेश्वरी वृषारूढा कौमारी शिखिवाहना |
लक्ष्मीः पद्मासना देवी पद्महस्ता हरिप्रिया || 10 ||

श्वेतरूपधरा देवी ईश्वरी वृषवाहना |
ब्राम्ही हंससमारूढा सर्वाभरणभूषिता || 11 ||

इत्येता मातरः सर्वाः सर्वयोगसमन्विताः |
नानाभरण शोभाया नानारत्नोपशोभिताः || 12 ||

दृश्यन्ते रथमारुढा देव्यः क्रोधसमाकुलाः |
शङ्खं चक्रं गदां शक्तिं हलं च मुसलायुधम् || 13 ||

खेटकं तोमरं चैव परशुं पाशमेव च |
कुन्तायुधं त्रिशूलं च शार्ङ्गमायुधमुत्तमम् || 14 ||

दैत्यानां देहनाशाय भक्तानामभयाय च |
धारयन्त्यायुधानीत्यं देवानां च हिताय वै || 15 ||

नमस्तेऽस्तु महारौद्रे महाघोरपराक्रमे |
महाबले महोत्साहे महाभयविनाशिनि || 16 ||

त्राहि मां देवि दुष्प्रेक्ष्ये शत्रूणां भयवर्धिनि |
प्राच्यां रक्षतु मामैन्द्री आग्नेय्यामग्निदेवता || 17 ||

दक्षिणेऽवतु वाराही नैऋत्यां खड्गधारिणी |
प्रतीच्यां वारुणी रक्षेद् वायव्यां मृगवाहिनी || १८ ||

उदीच्यां पातु कौमारी ऐशान्यां शूलधारिणी |
उर्ध्वम ब्रम्हाणि  मे रक्षेदधस्ताद वैष्णवी तथा || 19 ||

एवं दश दिशो रक्षेच्चामुण्डा शववाहना |
जया मे चाग्रतः पातु विजया पातु पृष्ठतः || 20 ||

अजिता वामपार्श्वे  तु दक्षिणे चापराजिता |
शिखामुद्योतिनी रक्षेदुमा मूर्ध्नि व्यवस्थिता || 21 ||

मालाधरी ललाटे च भ्रुवौ रक्षेद् यशस्विनी |
त्रिनेत्रा च भ्रुवोर्मध्ये यमघण्टा च नासिके || 22 ||

शंखिनी चक्षुषोर्मध्ये श्रोत्रयोर्द्वारवासिनी |
कपोलौ कालिका रक्षेत्कर्णमूले तु शांकरी || 23 ||

नासिकायां सुगन्धा च उत्तरोष्ठे च चर्चिका |
अधरे चामृतकला जिह्वायां च सरस्वती || 24 ||

दन्तान् रक्षतु कौमारी कण्ठमध्ये तु चण्डिका |
घण्टिकां चित्रघण्टा च महामाया च तालुके|| 25 ||

कामाक्षी चिबुकं रक्षेद् वाचं मे सर्वमंगला ।
ग्रीवायां भद्रकाली च पृष्ठवंशे धनुर्धरी ।। 26 ।।

नीलग्रीवा बहिःकण्ठे नलिकां नलकूबरी ।।
स्कन्धयोः खड्गिनी रक्षेद् बाहू मे वज्रधारिणी ।। 27 ।।

हस्तयोर्दण्डिनी रक्षेदम्बिका चांगुलीषु च ।।
नखाञ्छूलेश्वरी रक्षेत्कुक्षौ रक्षेत्कुलेश्वरी ।। 28 ।।

स्तनौ रक्षेन्महादेवी मनः शोकविनाशिनी ।
हृदये ललिता देवी उदरे शूलधारिणी ।। 29 ।।

नाभौ च कामिनी रक्षेद् गुह्यं गुह्येश्र्वरी तथा ।
पूतना कामिका मेढ्रं गुदे महिषवाहिनी ।।30 ।।

कट्यां भगवती रक्षेज्जानुनी विन्ध्यवासिनी ।
जंघे महाबला रक्षेद् सर्वकामप्रदायिनी ।।31।।

गुल्फयोर्नारसिंही च पादपृष्ठे तु तैजस ।
पादांगुलीषु श्री रक्षेत्पादास्तलवासिनी ।। 32।।

नखान् दंष्ट्राकराली च केशांश्चैवोर्ध्वकेशिनी।
रोमकूपेषु कौबेरी त्वचं वागीश्र्वरी तथा ।। 33।।

रक्तमज्जावसामांसान्यस्थिमेदांसि पार्वती ।
अन्त्राणि कालरात्रिश्च पित्तं च मुकुटेक्ष्वरी ।। 34।।

पद्मावती पद्मकोशे कफे चूडामणिस्तथा ।।
ज्वालामुखी नखज्वालामभेद्या सर्वसंधिषु ।। 35 ।।

शुक्रं ब्रह्माणि मे रक्षेच्छायां छत्रेश्र्वरी तथा ।
अहंकार मनो बुद्धिं रक्षन्मे धर्मधारिणि ।। 36 ।।

प्राणापानौ तथा व्यानमुदानं च समानकम् ।
वज्रहस्ता च मे रक्षेत्प्राणं कल्याणशोभना ।। 37 ।।

रसे रूपे च गन्धे च शब्दे स्पर्शे च योगिनी ।
यशः कीर्ति च लक्ष्मीं च सदा रक्षतु वैष्णवी ।।38।।

आयू रक्षतु वाराही धर्मं रक्षतु वैष्णवी ।
यशः कीर्तिं च लक्ष्मीं च धनं विद्यां च चक्रिणी ।। 39 ।।

गोत्रमिन्द्राणि मे रक्षेत्पशून्मे रक्ष चण्डिके ।
पुत्रान् रक्षेन्महालक्ष्मीर्भार्यां रक्षतु भैरवी ।। 40 ।।

पन्थानं सुपथा रक्षेन्मार्गं क्षेमकरी तथा।।
राजद्वारे महालक्ष्मीर्विजया सर्वतः स्थिता ।। 41।

रक्षाहीनं तु यत्स्थानं वर्जितं कवचेन तु ।
तत्सर्वं रक्ष मे देवि जयन्ती पापनाशिनी ।। 42 ।।

पदमेकं न गच्छेत्तु यदीच्छेच्छुभमात्मनः ।।
कवचेनावृतो नित्यं यत्र यत्रैव गच्छति।। 43 ।।

तत्र तत्रार्थलाभश्र्च विजयः सार्वकामिकः ।
यं यं चिन्तयते कामं तं तं प्राप्नोति निश्र्चितम् ।
परमैश्वर्यमतुलं प्राप्स्यते भूतले पुमान् ।। 44 ।।

निर्भयो जायते मर्त्यः संग्रामेष्वपराजितः ।
त्रैलोक्ये तु भवेत्पूज्यः कवचेनावृतः पुमान् ।। 45 ।।

इदं तु देव्याः कवचं देवानामपि दुर्लभम् ।
यः पठेत्प्रयतो नित्यं त्रिसन्ध्यं श्रद्धयान्वितः ।। 46 ।।

दैवी कला भवेत्तस्य त्रैलोक्येष्वपराजितः ।
जीवेद् वर्षशतं साग्रमपमृत्युविवर्जितः ।। 47 ।।

नश्यन्ति व्याधयः सर्वे लूताविस्फोटकादयः ।
स्थावरं जङ्गमं चैव कृत्रिमं चापि यद्विषम् ।। 48 ।।

अभिचाराणि सर्वाणि मन्त्रयन्त्राणि भूतले ।
भूचराः खेचराश्चैव जलजाश्चोपदेशिकाः ।। 49 ।।

सहजा कुलज माला डाकिनी शाकिनी तथा ।
अन्तरिक्षचरा घोरा डाकिन्यश्र्च महाबलाः ।। 50 ।।

ग्रहभूतपिशाचाश्च यक्षगन्धर्वराक्षसाः ।
ब्रह्मराक्षसवेतालाः कूष्माण्डा भैरवादयः ।। 51 ।।

नश्यन्ति दर्शनात्तस्य कवचे हृदि संस्थिते ।
मानोन्नतिर्भवेद् राज्ञस्तेजोवृद्धिकरं परम् ।।52 ।।

यशसा वर्धते सोऽपि कीर्तिमण्डितभूतले
जपेत्सप्तशतीं चण्डीं कृत्वा तु कवचं पुरा ।। 53 ।।

यावद्-भूमण्डलं धत्ते सशैलवनकाननम् ।
तावत्तिष्टति मेदिन्यां सन्ततिः पुत्रपौत्रिकी ।। 54 ।।

देहान्ते परमं स्थानं यत्सुरैरपि दुर्लभम् ।
प्राप्नोति पुरुषो नित्यं महामायाप्रसादतः ।। 55 ।।

लभते परमं रुपं शिवेन सह मोदते ।। ॐ ।। 56 ।।

।। इति श्रीवाराहपुराणे हरिहरब्रह्मविरचितं दे व्याः कवचम् संपूर्णम् ।।

 
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Devya Kavacham Hindi Meaning-

ॐ श्री चण्डिका देवी को नमस्कार है।

मार्कण्डेय जी ने कहा- पितामह! जो इस संसार में परम गोपनीय तथा सभी मनुष्यों की सब प्रकार से रक्षा करने वाला है और जो अब तक आपने दूसरे किसी के सामने प्रकट न किया हो, ऐसा कोई साधन मुझे बताइये. 1

ब्रह्मा जी बोले- ब्रह्मन्! ऐसा साधन तो एक देवी का कवच ही है, जो गोपनीय से भी परम गोपनीय, पवित्र तथा सम्पूर्ण प्राणियों का उद्धार करने वाला है. महामुने! उसे श्रवण करो.2

देवी की नौ मूर्तियाँ हैं, जिन्हें नवदुर्गा कहते हैं. उनके पृथक-पृथक (अलग-अलग) नाम बतलाये जाते हैं. प्रथम नाम शैलपुत्री है. दूसरी मूर्ति का नाम ब्रह्मचारिणी है. तीसरा स्वरुप चंद्रघंटा के नाम से प्रसिद्ध है. चौथी मूर्ति को कूष्मांडा कहते हैं. 3

पांचवी दुर्गा का नाम स्कंदमाता है. देवी के छठे रूप को कात्यायनी कहते हैं. सातवाँ कालरात्रि और आठवाँ स्वरुप महागौरी के नाम से प्रसिद्ध है.4

नवीं दुर्गा का नाम सिद्धिदात्री है. ये सब नाम सर्वज्ञ महात्मा वेद भगवान् के द्वारा ही प्रतिपादित हुए हैं.5

जो मनुष्य अग्नि में जल रहा हो, रणभूमि में शत्रु से घिर गया हो, विषम संकट में फँस गया हो तथा इस प्रकार भय से आतुर होकर जो भगवती की शरण में प्राप्त हुए हों- .6

-उनका कभी अमंगल नहीं होता. युद्ध के समय में संकट में पड़ने पर भी उनके ऊपर कोई विपत्ति नहीं दिखाई देती. उन्हें शोक दुःख और भय की प्राप्ति नहीं होती.7

जिन्होंने भक्ति पूर्वक देवी का स्मरण किया है, उनका निश्चय ही अभ्युदय होता है. देवेश्वरि! जो तुम्हारा चिंतन करते हैं, उनकी तुम निस्संदेह तुम रक्षा करती हो.8

चामुण्डा देवी प्रेत पर आरूढ़ होती हैं, वाराही भैंसे पर सवारी करती हैं, ऐन्द्री का वाहन ऐरावत हाथी है, वैष्णोदेवी गरुड़ पर ही आसन जमाती हैं.9

माहेश्वरी वृषभ पर आरूढ़ होती हैं, कौमारी का वाहन मयूर है. भगवान् विष्णु की प्रियतमा लक्ष्मी देवी कमल के आसन पर विराजमान हैं और हाथों में कमल धारण किये हुए हैं.10

वृषभ पर आरूढ़ ईश्वरी देवी ने श्वेत रूप धारण कर रखा है, ब्राह्मी देवी हंस पर बैठी हुई हैं और सब प्रकार के आभूषणों से विभूषित हैं.11

इस प्रकार ये सभी मातायें सब प्रकार की योग शक्तियों से सम्पन्न हैं. इनके सिवा और भी बहुत सी देवियाँ हैं, जो अनेक प्रकार के आभूषणों की शोभा से युक्त तथा नाना प्रकार के रत्नों से सुशोभित हैं.12

ये सम्पूर्ण देवियाँ क्रोध में भरी हुई हैं और भक्तों की रक्षा के लिए रथ पर बैठी हुई दिखाई देती हैं. ये शंख, चक्र, गदा, शक्ति, हल और मुसल, खेटक और तोमर, परशु, पाश, कुंत और त्रिशूल एवं उत्तम शारंग धनुष आदि अस्त्र-शस्त्र अपने हाथों में धारण करती हैं.13-14

दैत्यों के शरीर का नाश करना, भक्तों को अभयदान देना और देवताओं का कल्याण करना- यही उनके शास्त्र धारण का उद्देश्य है.15

महान रौद्ररूप, अत्यंत घोर पराक्रम, महान बल और महान उत्साह वाली देवी! तुम महान भय का नाश करने वाली हो तुम्हें नमस्कार है.16

तुम्हारी ओर देखना भी कठिन है. शत्रुओं का भय बढ़ाने वाली जगदम्बिके! मेरी रक्षा करो. पूर्व दिशा में ऐन्द्री (इन्द्रशक्ति) मेरी रक्षा करें. अग्निकोण में अग्निशक्ति मेरी रक्षा करें.17

दक्षिण दिशा में वाराही तथा नैर्ऋत्य कोण में खड्गधारिणी मेरी रक्षा करें. पश्चिम दिशा में वारुणी और वायव्य कोण में मृग पर सवारी करने वाली देवी मेरी रक्षा करें. १८

उत्तर दिशा में कौमारी और ईशान कोण में शूलधारिणी रक्षा करें. ब्रह्माणि! तुम ऊपर की ओर से मेरी रक्षा करो और वैष्णवी देवी नीचे की ओर से मेरी रक्षा करें.19

इसी प्रकार शव को अपना वाहन बनाने वाली चामुंडा देवी दासों दिशाओं से मेरी रक्षा करें, जया आगे से और विजया पीछे की और से मेरी रक्षा करें.20

वाम भाग में अजित और दक्षिण भाग में अपराजिता रक्षा करें. उद्योतिनी शिखा की रक्षा करें. उमा मेरे मस्तक पर विराजमान होकर रक्षा करें.21

ललाट में मालाधारी रक्षा करें और यशस्विनी मेरि भौहों का संरक्षण करें. भौहों के मध्य भाग में त्रिनेत्रा और नथुनों की यमघंटा देवी रक्षा करें.22

दोनों नेत्रों के मध्य भाग में शंखिनी और कानों में द्वारवासिनी रक्षा करें. कालिका देवी कपोलों की तथा भगवती शांकरी कानों के मूल की रक्षा करें.23

नासिका में सुगंधा और ऊपर के ओठ में चर्चिका देवी रक्षा करें. नीचे के ओठ में अमृतकला तथा जिह्वा में सरस्वती देवी रक्षा करें.24

कौमारी दाँतों की और चंडिका कंठप्रदेश की रक्षा करें. चित्रघंटा गले की घांटी की और महामाया तालु में रहकर रक्षा करें.२५

कामाक्षी ठोढ़ी की और सर्वमंगला मेरी वाणी की रक्षा करें. भद्रकाली ग्रीवा में और धनुर्धरी पृष्ठवंश (मेरुदंड) में रहकर रक्षा करें.२६

कंठ के बाहरी भाग में नीलग्रीवा और कंठ की नली में नलकूबरी रक्षा करें. दोनों कधों में खड्गिनी और मेरी दोनों भुजाओं की वज्रधारिणी रक्षा करें.27

दोनों हाथों में दंडिनी और अँगुलियों में अम्बिका रक्षा करें. शूलेश्वरी नखों की रक्षा करें. कुलेश्वरी कुक्षि (पेट) में रहकर रक्षा करें.28

महादेवी दोनों स्तनों की और शोकविनासिनी देवी मन की रक्षा करें. ललिता देवी ह्रदय में और शूलधारिणी उदार में रहकर रक्षा करें.29

नाभि में कामिनी और गुह्यभाग की गुह्येश्वरी रक्षा करें. पूतना और कामिका लिंग की और महिषवाहिनी गुदा की रक्षा करें.30

भगवती कटिभाग में और विंध्यवासिनी घुटनों की रक्षा करें, सम्पूर्ण कामनाओं को देने वाली महाबला देवी दोनों पिंडलियों की रक्षा करें. 31

नारसिंही दोनों घुट्टियों की और तैजसी देवी दोनों चरणों के पृष्ठ भाग की रक्षा करें. श्रीदेवी पैरों की अँगुलियों में और तलवासिनी पैरों के तलुओं में रहकर रक्षा करें. 32

अपनी दाढ़ों के कारण भयंकर दिखने वाली दंष्ट्राकराली देवी नखों की और ऊर्ध्वकेशिनी देवी केशों की रक्षा करें. रोमावलियों के छिद्रों में कौबेरी और त्वचा की वागीश्वरी देवी रक्षा करें.३३

पार्वती देवी रक्त, मज्जा, वसा, मांस, हड्डी और मेद की रक्षा करें. आतों की कालरात्रि और पित्त की मुकुटेश्वरी रक्षा करें.३४

मूलाधार आदि कमल-कोशों में पद्मावती देवी और कफ में चूणामणि देवी स्थित होकर रक्षा करें. नख के तेज की ज्वालामुखी रक्षा करें. जिसका किसी भी अस्त्र से भेदन नहीं हो सकता, वह अभेद्य देवी शरीर की समस्त संधियों में रहकर रक्षा करें. ३५

ब्रह्माणि! आप मेरे वीर्य की रक्षा करें. छत्रेश्वरी छाया की तथा धर्मधारिणी देवी मेरे अहंकार, मन और बुद्धि की रक्षा करें.३६

हाथ में वज्र धारण करने वाली वज्रहस्ता देवी मेरे प्राण, अपान, व्यान, उदान और समान वायु की रक्षा करें. कल्याण से शोभित होने वाली भगवती कल्याणशोभना मेरे प्राण की रक्षा करें.३७

रस, रूप, गंध, शब्द और स्पर्श- इन विषयों का अनुभव करते समय योगिनी देवी रक्षा करें तथा सत्त्वगुण, रजोगुण और तमोगुण की रक्षा सदा नारायणी देवी करें.३८

वाराही आयु की रक्षा करें. वैष्णवी धर्म की रक्षा करें तथा चक्रिणी देवी यश, कीर्ति, लक्ष्मी, धन तथा विद्या की रक्षा करें.३९

इंद्राणी! आप मेरे गोत्र की रक्षा करें, चण्डिके! तुम मेरे पशुओं की रक्षा करो. महालक्ष्मी पुत्रों की रक्षा करे और भैरवी पत्नी की रक्षा करे.40

मेरे पथ की सुपथा तथा मार्ग की क्षेमकरी रक्षा करे. राजा के दरबार में महालक्ष्मी रक्षा करे तथा सब ओर व्याप्त रहने वाली विजय देवी सम्पूर्ण भयों से रक्षा करें.४१

देवि! जो स्थान कवच में नहीं कहा गया है, अतएव रक्षा से रहित है, वह सब तुम्हारे द्वारा सुरक्षित हो; क्योंकि तुम विजयशालिनी और पापनाशिनी हो.४२

यदि अपने शरीर का भला चाहे तो मनुष्य बिना कवच के कहीं एक पग भी ना जाय- कवच का पाठ करके ही यात्रा करे. कवच के द्वारा सब ओर से सुरक्षित मनुष्य जहाँ-जहाँ भी जाता है, 43

वहां-वहां उसे धन लाभ होता है तथा सम्पूर्ण कामनाओं की सिद्धि करने वाली विजय की प्राप्ति होती है. वह जिस-जिस अभीष्ट वास्तु का चिंतन करता है, उस-उस को निश्चय ही प्राप्त कर लेता है. वह पुरुष इस पृथ्वी पर तुलनारहित महान ऐश्वर्य का भागी होता है.४४

कवच से सुरक्षित मनुष्य निर्भय हो जाता है. युद्ध में उसकी पराजय नहीं होती तथा वह तीनों लोकों में पूजनीय होता है. ४५

देवी का यह कवच देवताओं के लिए भी दुर्लभ है. जो प्रतिदिन नियमपूर्वक तीनों संध्याओं के समय श्रद्धा के साथ इसका पाठ करता है,46

उसे दैवी कला प्राप्त होती है तथा वह तीनों लोकों में कहीं भी पराजित नहीं होता. इतना ही नहीं, वह अमृत्यु से रहित हो सौ से भी अधिक वर्षों तक जीवित रहता है.४७

मकरी, चेचक और कोढ़ आदि उसकी सम्पूर्ण व्याधियां नष्ट हो जाती हैं. कनेर, भांग, अफीम, धतूरे आदि का स्थावर विष, सांप और बिच्छू आदि के काटने से चढ़ा हुआ जंगम विष तथा अहिफेन और तेल के संयोग आदि से बनने वाला कृत्रिम विष- ये सभी प्रकार के विष दूर हो जाते हैं, उनका कोई भी असर नहीं होता.48

इस पृथ्वी पर मारण, मोहन, आदि जितने आभिचारिक प्रयोग होते हैं तथा इस प्रकार के जितने मंत्र-यंत्र होते हैं, वे सब इस कवच को हृदय में धारण कर लेने पर उस मनुष्य को देखते ही नष्ट हो जाते हैं. ये ही नहीं, पृथ्वी पर विचारने वाले ग्राम देवता, आकाशचारी देवविशेष, जल के सम्बन्ध से प्रकट होने वाले गण, उपदेश मात्र से सिद्ध होने वाले निम्नकोटि के देवता,४९

अपने जन्म के साथ प्रकट होने वाले देवता, कुलदेवता, माला (कंठमाला आदि), डाकिनी, शाकिनी, अंतरिक्ष में विचारने वाली भयानक डाकिनियाँ, 50

ग्रह, भूत, पिशाच, यक्ष, गन्धर्व, राक्षस, ब्रह्मराक्षस, बेताल, कूष्माण्ड और भैरव आदि अनिष्टकारक देवता भी, ५१

ह्रदय में कवच धारण किये रहने पर उस मनुष्य को देखते ही भाग जाते हैं. कवचधारी पुरुष को राजा से सम्मान-वृद्धि प्राप्त होती है. यह कवच मनुष्य के तेज की वृद्धि करने वाला और उत्तम है.५२

कवच का पाठ करने वाला पुरुष अपनी कीर्ति से विभूषित भूतल पर अपने सुयश के साथ-साथ वृद्धि को प्राप्त होता है. जो पहले कवच का पाठ करके उसके बाद सप्तशती चण्डी का पाठ करता है,५३

उसकी जब तक वन, पर्वत और काननों (जंगलों) सहित यह पृथ्वी टिकी रहती है, तब तक यहाँ पुत्र-पौत्र आदि संतान परंपरा बनी रहती है.54

फिर देह का अंत होने पर वह पुरुष भगवती महामाया के प्रसाद से उस नित्य परमपद को प्राप्त होता है जो देवताओं के लिए भी दुर्लभ है. ५५

वह सुन्दर दिव्य रूप धारण करता और कल्याणमय शिव के आनंद का भागी होता है.५६

।इस प्रकार श्री देवी कवच पूरा हुआ।
 
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