Sunday, December 30, 2018

Shiv Tandav Stotram lyrics in Hindi with meaning- शिव तांडव स्तोत्र

Shiva tandav stotram
Lord Shiva

Shri Shiv Tandav Stotram is one of the most popular hymn (mantra) of lord Shiva. When Ravana wanted to take the whole Kailash with him to his kingdom Lanka, Lord Shiva pressed whole mountain with his left thumb and Ravana (रावण) got trapped under the mountain Kailasha. So, to please lord Shiva, he orated the Tandav Stotra and Shiva pleased on him. Lyrics of Tandav Stotram is as written down in hindi and then english.

NOTE: There are two version of Shiva Tandava- one with 15 shlokas and another with 17 shlokas. Shloka 14 and 15 are not used by some people. Here, 17 Shlokas arewritten. If you want to read Tandava Stotra with 15 Shlokas then please skip Shloka no. 14 and no. 15.

Shiv Tandav Stotram Lyrics in Hindi and english (with meaning)-

।। अथ श्री शिव तांडव स्तोत्रम ।।

जटा टवी गलज्जल प्रवाह पावितस्थले।
गलेवलम्ब्य लम्बितां भुजङ्गतुंगमालिकाम् ।
डमड्-डमड्-डमड्-डमन्निनाद वड्-डमर्वयं।
चकार चण्ड ताण्डवं तनोतु नः शिवः शिवम्।।१।।

 उनके बालों से बहने वाले जल से जिनका कंठ पवित्र है, जिनके गले में सांप एक माला की तरह लटका हुआ है और जिनके डमरू से डमड-डमड का नाद हो रहा है, शिव प्रचंड तांडव कर रहे हैं, वे हमें सम्पन्नता प्रदान करें।

जटा कटाहसंभ्रम भ्रमन्निलिम्पनिर्झरी।
विलोलवीचि वल्लरी विराजमानमूर्धनि।
धगद्-धगद्-धगज्-ज्वलल्ललाट पट्ट्पावके।
किशोरचन्द्रशेखरे रतिः प्रतिःक्षणम् मम।।२।।

गंगा की धारा से युक्त जिनकी लम्बी जटाएं [चक्कर में, round and round] घूम रही है, उनके बालों की लटें [गंगा की] लहरों की भांति लहरा रही हैं, जिनका मस्तक दीप्तिमान है जिस पर धगद-धगद की आवाज करती हुई अग्नि [तीसरा नेत्र] विराजित है, जिस [मस्तक] के शिखर पर अर्धचंद्र सुशोभित है, ऐसे शिव का तांडव प्रति क्षण मेरे मन में आनंद उत्पन्न कर रहा है।

धराधरेन्द्र नंदिनी विलासबन्धु वन्धु-
रस्फुरद्-दिगन्त संतति प्रमोदमानमानसे।
कृपाकटाक्ष-धोरणी निरुद्ध-दुर्धरापदि।
क्वचिद्दिगम्बरे मनोविनोदमेतु वस्तुनि।।३।।

 पर्वतराज (हिमालय) की पुत्री (पार्वती) जिनकी अर्धांगिनी हैं, जिस तांडव से सारा संसार कांपने लगता है उसकी सूक्ष्म तरंगें मेरे मन में सुख की लहरें उत्पन्न कर रही हैं, वे शिव जिनके कटाक्ष [तिरछी नजर] से बड़ी-बड़ी आपदाएं भी टल जाती हैं, जो दिगंबर हैं, मेरा मन उन ध्यान में आनंद प्राप्त करे।

जटा भुजंगपिंगल स्फुरत्फणामणिप्रभा-
कदंबकुंकुंम-द्रवप्रलिप्त दिग्वधूमुखे।
मदान्धसिन्धु रस्फुरत्वगुत्तरीयमेदुरे।
मनो विनोदमद्-भुतं विंभर्तुभूत-भर्तरि।।४।।

 जिनकी जटा पर लाल-भूरे सर्प अपना मणियों से चमकता फन फैलाये हुए बैठे हैं जो सभी की देवियों के चेहरों पर विभिन्न रंग बिखेर रहा है, जिनका ऊपरी वस्त्र मंद पवन में मदमस्त हाथी के चर्म (skin) की भांति हिल रहा है, जो सभी जीवों के रक्षक हैं मेरा मन उनके इस तांडव से पुलकित हो रहा है।

सहस्र लोचन प्रभृत्य शेषलेखशेखर-
प्रसून धूलिधोरणी विधूसरांघ्रिपीठभूः।
भुजंगराज मालया निबद्धजाटजूटकः।
श्रियै चिराय जायतां चकोर बन्धुशेखरः।।५।।

 जो नाचते हुए अपने पैरों की धूल से सहस्र लोचन (जिनके हजार नेत्र हैं अर्थात इंद्र) आदि देवताओं पर कृपा करते हैं, धरती पर नाचने से जिनके पैर भूरे रंग के हो गए है, जिनकी जटा सर्पराज की माला से बंधी है, चकोर पक्षी के मित्र चन्द्रमा जिनके मस्तक पर शोभित हैं, वे हमें सम्पन्नता प्रदान करें।

ललाट चत्वरज्व-लद्धनंजयस्फुलिङ्गभा-
निपीतपंचसायकं नमन्निलिम्पनायकम्।
सुधा मयूख लेखया विराजमान शेखरं।
महा कपालि संपदे शिरोजटालमस्तु नः।।६।।

जिनके ललाट पर अग्नि की चिंगारी जल रही है और अपनी दीप्ति फैला रही है, इस अग्नि ने कामदेव के पांच तीरों को नष्ट कर कामदेव को भस्म कर दिया था, जो अर्ध चंद्र से सुशोभित हैं उनकी जटाओं में स्थित सम्पदा हमें प्राप्त हो।

कराल भाल पट्टिका धगद् धगद् धगज्जवलद्ध-
नंजया धरीकृत प्रचण्डपंचसायके।
धराधरेन्द्र नंदिनी कुचाग्रचित्रपत्रक-
प्रकल्पनैकशिल्पिनि त्रिलोचने रतिर्मम।।७।।

 उनके  कराल (डरावने) मस्तक के तल पर धगद-धगद की ध्वनि करती हुई अग्नि जल रही है जिसने पांच तीर वाले (कामदेव) को नष्ट कर दिया था, तांडव की कदमताल से धरती (जो कि पर्वत पुत्री पार्वती का अंश है) के वक्ष पर सजावटी रेखाएं खिंच गयी हैं, मेरा मन त्रिनेत्रधारी शिव के इस तांडव से अत्यंत प्रसन्न है।

नवीनमेघ मंडली निरुद्ध-दुर्धरस्फुरत्कुहु-
निशीथनीतमः प्रबद्धबद्ध कन्धरः।
निलिम्पनिर्झरी धरस्तनोतु-कृत्ति-सिन्धुरः।
कलानिधानबन्धुरः श्रियं जगद्धुरंधरः।।८।।

महान तांडव के स्पंदन (धड़क) से शिव की गर्दन बादलों की परतों से ढकी अमावस्या की अर्धरात्रि की तरह काली है, हे गंगा को धारण करने वाले, हे गजचर्म पहनने वाले, हे अर्धचंद्रधारी, हे सारे संसार का भार उठाने वाले शिव! हमें सम्पन्नता प्रदान करें।

प्रफुल्ल नील पंकज-प्रपंचकालिमप्रभा ।
विडंबि कंठकंधरारुचि प्रबन्धकंधरम्।
रमच्च्छिदं पुरच्छिदं भवच्छिदं मखच्छिदं।
गजच्छिदान्ध कच्छिदं तमंतकच्छिदं भजे।।९।।

ब्रह्माण्ड की काली चमक (हलाहल विष) उनके गले में नीले कमल की तरह प्रतीत हो रहा है और करधनी की भाँती प्रतीत हो रहा है जिसे उन्होंने स्वयं रोक रखा है, जिन्होंने स्मर (कामदेव) और त्रिपुरासुर का अंत किया, जो सांसारिक बंधनों को नष्ट करते हैं, जिन्होंने दक्ष, अंधकासुर और गजासुर को विदीर्ण किया और यम को पराजित किया था मैं उन शिव की पूजा करता हूँ।

अखर्व(अगर्व) सर्वमंगला कलाकदंबमञ्जरी।
रसप्रवाह माधुरी विजृंभणा मधुव्रतम।
स्मरान्तकं पुरान्तकं भवान्तकं मखान्तकं।
गजान्तकान्धकान्तकं तमन्तकान्तकं भजे।।१०।।

वे सभी की सम्पन्नता के लिए कभी न कम होने वाले मंगल का भण्डार हैं, वे सभी कलाओं के स्रोत हैं, कदम्ब के फूलों से आने वाली शहद की सुगंध के कारण उनके चारों ओर मधुमक्खियां घूमती रहती हैं, जिन्होंने स्मर (कामदेव) और त्रिपुरासुर को नष्ट किया, जो सांसारिक बंधनों से मुक्त करते हैं, जिन्होंने दक्ष, अंधकासुर और गजासुर का अंत किया और यम को पराजित किया था मैं उन शिव की पूजा करता हूँ।

जयत्वदभ्रविभ्रम भ्रमद्भुजंगमस्फु-
रद्-धगद्-धगद्वि निर्गमत्कराल भाल हव्यवाट्-
धिमिद्धिमिद्धिमि ध्वनन्मृदंग-तुंगमंगल-
ध्वनिक्रमप्रवर्तित प्रचंड ताण्डवः शिवः।।११।।

उनकी भौहें आगे-पीछे गति कर रही हैं जो तीनों लोकों पर उनके स्वामित्व को दर्शाती हैं, उनकी गर्दन पर फुफकार मारते हुए सांप लोट रहे हैं, उनके मस्तक पर डरावनी तीसरी आँख यज्ञ की अग्नि की भाँति धड़क रही है, मृदंगों से लगातार धिमिध-धिमिध की ध्वनि हो रही है और इस ध्वनि पर शिव तांडव कर रहे हैं।

दृषद्विचित्रतल्पयोर्भुजंग मौक्तिकमस्र-
जोर्गरिष्ठरत्नलोष्ठयोः सुहृद्वि-पक्षपक्षयोः।
तृणारविन्दचक्षुषोः प्रजामहीमहेन्द्रयोः
प्रवर्तयन्मनः कदा सदाशिवं भजाम्यहम्।१२।।

 मैं आरामदायक बिस्तर और कठोर भूमि का स्पर्श में समानता कब देखूंगा? मैं मोतियों के हार और साँपों के हार को समान रूप से कब देखूंगा? मैं मित्र और शत्रु में एकरूपता कब देखूंगा? मैं कब सुन्दरता और कुरूपता को सामान दृष्टि से कब देखूंगा? मैं कब सम्राट और सामान्य लोगों को एकरूपता से देखूंगा? मैं दृष्टि और आचरण की समानता से सदाशिव की पूजा कब करूँगा?

कदा निलिम्पनिर्झरी निकुंजकोटरे वसन्।
विमुक्तदुर्मतिः सदा शिरःस्थमंजलिं वहन्।
विमुक्तलोललोचनो ललामभाललग्नकः।
शिवेति मन्त्रमुच्चरन्कदा सुखी भवाम्यहम्।।१३।।

मैं कब मन के पापयुक्त स्वभाव से मुक्त होकर गंगा के किनारे घने जंगलों की गुफाओं में दोनों हाथों को सर पर रखकर शिव की तपस्या में लीन रहूँगा? मैं कब नेत्रों के भटकाव (काम भावना) से मुक्त होकर माथे पर तिलक लगाकर शिव की पूजा करूँगा? मैं कब शिव के मन्त्रों का उच्चारण करते हुए सुखी होऊंगा?

निलिम्प नाथनागरी कदम्ब मौलमल्लिका-
निगुम्फनिर्भक्षरन्म धूष्णिकामनोहरः।
तनोतु नो मनोमुदं विनोदिनीं-महनिशं।
परिश्रय परं पदं तदंगजत्विषां चयः।।१४।।

 देवांगनाओं के सिर में गुंथे कदम्ब के पुष्पों की मालाओं के झड़ते सुगन्धित पराग से मनोहर, शोभा के धाम महादेव के अंगों की सुंदरता आनंदयुक्त हमारे मन की प्रसन्नता को सदा बढ़ाती रहे।

प्रचण्ड वाडवानल प्रभाशुभप्रचारिणी।
महाष्टसिद्धि कामिनी जनावहूत जल्पना।
विमुक्त वाम लोचनो विवाहकालिकध्वनिः।
शिवेति मन्त्रभूषगो जगज्जयाय जायताम्।।१५।।

बड़वानल (समुद्र की अग्नि) की भांति पापों को भस्म करने में स्त्री स्वरूपिणी अणिमादिक अष्ट महासिद्धियों और चंचल नेत्रों वाली देवकन्याओं से शिव विवाह समय में गान की गयी मंगल ध्वनि सब पर मन्त्रों में श्रेष्ठ शिव मन्त्र से परिपूर्ण होकर हम सांसारिक दुखों को नष्ट कर विजय पाएं।

इमं हि नित्यमेव मुक्तमुक्तमोत्तम स्तवं।
पठन्स्मरन् ब्रुवन्नरो विशुद्धमेति सन्ततम्।
हरे गुरौ सुभक्तिमाशु याति नान्यथा गतिम्।
विमोहनं हि देहनाम् तु शंकरस्य चिन्तनम।।१६।।

पवित्र मन से शिव का मनन (चिंतन) करके इस महान से भी महानतम स्तव ( स्तोत्र ) का जो भी नित्य अखंड पाठ करता है, गुरु शिव उस की ओर गति करते हैं, उस शिव की भक्ति प्राप्त होती है, इस भक्ति को पाने का कोई दूसरा मार्ग नहीं है, शिव के मनन से ऐसे व्यक्ति का मोह नष्ट हो जाता है।

पूजाऽवसानसमये दशवक्रत्रगीतं।
यः शम्भूपूजनमिदं पठति प्रदोषे।
तस्य स्थिरां रथगजेंद्रतुरंगयुक्तां।
लक्ष्मी सदैव सुमुखीं प्रददाति शम्भुः।।१७।।

शम्भू (शिव) की पूजा की समाप्ति के समय शाम को जो दशानन रावण के इस स्तोत्र (छंद) का पाठ करते हैं, जो इस पूजा में दृढ़ रहते हैं वे हाथी घोड़ों के रथ पर चलते हैं (सम्पन्नता दर्शाने के लिए. देवी लक्ष्मी की कृपा उन पर बनी रहती है, श्री शम्भू उन पर वरदान बनाये रखते हैं।

।। इति रावण रचितं शिव तांडव स्तोत्रं सम्पूर्णम।।

Monday, December 24, 2018

भैरो बाबा की आरती Bhairo Baba ki Arti, सुनो जी भैरव लाडले

bhairo baba ki arti
bhaairo baba

भैरो बाबा की आरती (Bhairav Baba ki aarti)

सुनो जी भैरव लाडले, कर जोड़ कर विनती करूँ
कृपा तुम्हारी चाहिए , में ध्यान तुम्हारा ही धरूँ

मैं चरण छूता आपके, अर्जी मेरी सुन सुन लीजिए
मैं हूँ मति का मंद, मेरी कुछ मदद तो कीजिए

महिमा तुम्हारी बहुत, कुछ थोड़ी सी मैं वर्णन करूँ
सुनो जी भैरव लाडले...

करते सवारी श्वानकी, चारों दिशा में राज्य है
जितने भूत और प्रेत, सबके आप ही सरताज हैं |
हथियार है जो आपके, उनका क्या वर्णन करूँ
सुनो जी भैरो लाडले...

माताजी के सामने तुम, नृत्य भी करते हो सदा
गा गा के गुण अनुवाद से, उनको रिझाते हो सदा
एक सांकली है आपकी तारीफ़ उसकी क्या करूँ
सुनो जी भैरो लाडले...

बहुत सी महिमा तुम्हारी, मेहंदीपुर सरनाम है
आते जगत के यात्री बजरंग का स्थान है
श्री प्रेतराज सरकारके, मैं शीश चरणों मैं धरूँ
सुनो जी भैरव लाडले...

निशदिन तुम्हारे खेल से, माताजी खुश होती रहें
सर पर तुम्हारे हाथ रखकर आशीर्वाद देती रहे

कर जोड़ कर विनती करूँ अरुशीश चरणों में धरूँ
सुनो जी भैरव लाड़ले, कर जोड़ कर विनती करूँ

Bhairav Ji Ki Aarti (bhairo baba aarti)-


Suno ji bhairav ladle kar jod kar vinti karun,
Kripa tumhari chahiye, mein dhyaan tumhara hi dharun,

Mein charan choota aapke, arji meri sun leejiye,
mein hun mati ka mand, meri kuch madad to keejiye,

mahima tumhari bahut, kuch thodi si me barnan karun,
suno ji bhairo ladle...

karte sawari shwaan ki, chaaron disha me rajya hai,
jitne bhoot or pret, sabke aap hi sartaaj hai,
hatiyaar hai jo aapke, unka mein kya warnan karun,
suno ji bhairo ladle...

mataji ke saamne tum, nritya bhi karte ho sada,
ga ga ke gun anuvaad se, unko rijhaate ho sada,
ek saankali hai aapki, taarif uski kya karun,
suno ji bhairav ladle...

bahut si mahima tumhari, mehndipur sarnaam hai,
aate jagat ke yaatri bajrang ka sthaan hai,
shree pretraj sarkar ke, me shees charno me dharun,
suno ji bhairav ladle...

Nishdin tumhare khel se, mata ji khush  hoti rahen,
sir per tumhare haath rakhkar asheerwad deti rahein,
kar jor kar vinti karun aru sheesh charno me dharun,
suno ji bhairav laadle, kar jod kar vinti karun.

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Tags: Suno ji bhairav ladle lyrics in hindi, aarti,

Tuesday, November 27, 2018

Siddha Kunjika Stotram lyrics in Hindi (अर्थ सहित)

chandika sidhha kunjika stotram
Maa durga
सिद्धकुंजिका स्तोत्र (siddh kunjika stora) देवी माहात्म्य के अंतर्गत परम कल्याणकारी स्तोत्र है। यह स्तोत्र रुद्रयामल तंत्र के गौरी तंत्र भाग से लिया गया है। सिद्धकुंजिका स्तोत्र का पाठ पूरी दुर्गा सप्तशती के पाठ के बराबर है। इस स्तोत्र के मूल मन्त्र नवाक्षरी मंत्र ( ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ) के साथ प्रारम्भ होते है। कुंजिका का अर्थ है चाबी (key) अर्थात कुंजिका स्तोत्र दुर्गा सप्तशती की शक्ति को जागृत करता है जो महेश्वर शिव के द्वारा गुप्त (lock) कर दी गयी है। इस स्तोत्र के पाठ के उपरान्त किसी और जप या पूजा की आवश्यकता नहीं होती, कुंजिका स्तोत्र के पाठ मात्र से सभी जाप सिद्ध हो जाते है। कुंजिका स्तोत्र में आए बीजों (बीज मन्त्रो) का अर्थ जानना न संभव है और न ही अतिआवश्यक अर्थात केवल जप पर्याप्त है। सिद्ध कुंजिका स्तोत्र इस प्रकार है:-

शिव उवाच

शृणु देवि प्रवक्ष्यामि कुंजिकास्तोत्रमुत्तमम्।
येन मन्त्रप्रभावेण चण्डीजापः शुभो भवेत् ।।१।।

न कवचं नार्गलास्तोत्रं कीलकं न रहस्यकम्।
न सूक्तं नापि ध्यानं च न न्यासो न च वार्चनम् ।।२।।

कुञ्जिकापाठमात्रेण दुर्गापाठफलं लभेत्।
अति गुह्यतरं देवि देवानामपि दुर्लभम् ।।३।।

गोपनीयं प्रयत्नेन स्वयोनिरिव पार्वति।
मारणं मोहनं वश्यं स्तंभोच्चाटनादिकम।
पाठमात्रेण संसिध्येत् कुंजिकास्तोत्रमुत्तमम् ।।४।।

अथ मंत्रः

ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे। ॐ ग्लौं हुं क्लीं जूं सः
ज्वालय ज्वालय ज्वल ज्वल प्रज्वल प्रज्वल
ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ज्वल हं सं लं क्षं फट् स्वाहा ।।

। इति मंत्रः ।

नमस्ते रुद्ररूपिण्यै नमस्ते मधुमर्दिनि।
नमः कैटभहारिण्यै नमस्ते महिषार्दिनि ।।१।।

नमस्ते शुम्भहन्त्र्यै च निशुम्भासुरघातिनि ।
जाग्रतं हि महादेवि जपं सिद्धं कुरुष्व मे।।२।।

ऐंकारी सृष्टिरुपायै ह्रींकारी प्रतिपालिका ।
क्लींकारी कामरूपिण्यै बीजरूपे नमोस्तु ते।।३।।

चामुण्डा चण्डघाती च यैकारी वरदायिनी ।
विच्चे चाभयदा नित्यं नमस्ते मन्त्ररूपिणि ।।४।।

धां धीं धूं धूर्जटेः पत्नी वां वीं वूं वागधीश्वरी।
क्रां क्रीं क्रूं कालिका देवि शां शीं शूं मे शुभं कुरु ।।५।।

हुं हुं हुंकाररूपिण्यै जं जं जं जम्भनादिनी।
भ्रां भ्रीं भ्रूं भैरवी भद्रे भवान्यै ते नमो नमः ।।६।।

अं कं चं टं तं पं यं शं वीं दुं ऐं वीं हं क्षं
धिजाग्रं धिजाग्रं त्रोटय त्रोटय दीप्तं कुरु कुरु स्वाहा।।७।।

पां  पीं पूं पार्वती पूर्णा खां खीं खूं खेचरी तथा ।
सां सीं सूं सप्तशती देव्या मंत्रसिद्धिं कुरुष्व मे।।८।।

इदं तु कुंजिकास्तोत्रं मंत्रजागर्तिहेतवे।
अभक्ते नैव दातव्यं गोपितं रक्ष पार्वति ।।

यस्तु कुंजिकया देवि हीनां सप्तशतीं पठेत्।
न तस्य जायते सिद्धिररण्ये रोदनं यथा ।।

इति श्रीरुद्रयामले गौरीतन्त्रे शिवपार्वतीसंवादे कुंजिकास्तोत्रं सम्पूर्णम्।
।। ॐ तत्सत्।।

अर्थ ( Meaning ) -

शिव जी बोले-
  देवी !सुनो। मैं उत्तम कुंजिका स्तोत्र का  उपदेश करूँगा, जिस मन्त्र के प्रभाव से देवी का जप ( पाठ ) सफल होता है ।।१।।

कवच, अर्गला, कीलक, रहस्य, सूक्त, ध्यान, न्यास यहाँ तक कि अर्चन भी आवश्यक नहीं है ।।२।।
  केवल कुंजिका के पाठ से दुर्गापाठ का फल प्राप्त हो जाता है। ( यह कुंजिका ) अत्यंत गुप्त और देवों के लिए भी दुर्लभ है ।।३।।
  हे पार्वती !  स्वयोनि की भांति प्रयत्नपूर्वक गुप्त रखना चाहिए। यह उत्तम कुंजिकास्तोत्र केवल पाठ के द्वारा मारण, मोहन, वशीकरण, स्तम्भन और उच्चाटन आदि ( अभिचारिक ) उद्देश्यों को सिद्ध करता है ।।४।।
   मन्त्र -ॐ  ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे। ॐ ग्लौं हुं क्लीं जूं सः ज्वालय ज्वालय ज्वल ज्वल प्रज्वल प्रज्वल ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ज्वल हं सं लं क्षं फट् स्वाहा ।।

( मंत्र में आये बीजों का अर्थ जानना न संभव है, न आवश्यक और न ही वांछनीय (Desirable)। केवल जप पर्याप्त है। )
  हे रुद्ररूपिणी ! तुम्हे नमस्कार। हे मधु दैत्य को मारने वाली ! तुम्हे नमस्कार है। कैटभविनाशिनी को नमस्कार। महिषासुर को मारने वाली देवी ! तुम्हे नमस्कार है ।।१।।
  शुम्भ का हनन करने वाली और निशुम्भ को मारने वाली ! तुम्हे नमस्कार है ।।२।।
  हे महादेवी ! मेरे जप को जाग्रत और सिद्ध करो। 'ऐंकार' के रूप में सृष्टिरूपिणी, 'ह्रीं' के रूप में सृष्टि का पालन करने वाली ।।३।।
  क्लीं के रूप में कामरूपिणी ( तथा अखिल ब्रह्माण्ड ) की बीजरूपिणी देवी ! तुम्हे नमस्कार है। चामुंडा के रूप में तुम चण्डविनाशिनी और 'यैकार' के रूप में वर देने वाली हो ।।४।।
  'विच्चे' रूप में तुम नित्य ही अभय देती हो। ( इस प्रकार ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ) तुम इस मन्त्र का स्वरुप हो ।।५।।
  'धां धीं धूं' के रूप में धूर्जटी ( शिव ) की तुम पत्नी हो। 'वां वीं वूं' के रूप में तुम वाणी की अधीश्वरी हो। 'क्रां क्रीं क्रूं' के रूप में कालिकादेवी, 'शां शीं शूं' के रूप में मेरा कल्याण करो ।।६।।
  'हुं हुं हुंकार' स्वरूपिणी, 'जं जं जं' जम्भनादिनी, 'भ्रां भ्रीं भ्रूं' के रूप में हे कल्याणकारिणी भैरवी भवानी ! तुम्हे बार बार प्रणाम ।।७।।
  'अं कं चं टं तं पं यं शं वीं दुं ऐं वीं हं क्षं धिजाग्रं धिजाग्रं' इन सबको तोड़ो और दीप्त करो, करो स्वाहा। 'पां पीं पूं' के रूप में तुम पार्वती पूर्णा हो। 'खां खीं खूं' के रूप में तुम खेचरी ( आकाशचारिणी ) अथवा खेचरी मुद्रा हो।।८।।
  'सां सीं सूं' स्वरूपिणी सप्तशती देवी के मन्त्र को मेरे लिए सिद्ध करो। यह सिद्धकुंजिका स्तोत्र मन्त्र को जगाने के लिए है। इसे भक्तिहीन पुरुष को नहीं देना चाहिए। हे पार्वती ! इस मन्त्र को गुप्त रखो। हे देवी ! जो बिना कुंजिका के सप्तशती का पाठ करता है उसे उसी प्रकार सिद्धि नहीं मिलती जिस प्रकार वन में रोना निरर्थक होता है।
( इस प्रकार श्रीरुद्रयामल के गौरीतंत्र में शिव पार्वती संवाद में सिद्ध कुंजिका स्तोत्र सम्पूर्ण हुआ )

Benefits of Siddha Kunjika Stotram
-
By reciting this Stotra on can easily achieve to overcome murder, enchants, slavery, paralysing (stambham).
One's all enemies are destroyed and problems are solved by this Mantra.

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Wednesday, July 4, 2018

Shri Kanakadhara Stotram lyrics in Hindi | Sanskrit

Kanakadhara stotram lyrics
Goddess Lakshmi
कनकधारा स्तोत्रम - अङ्गम हरेः पुलकभूषणमाश्रयन्ती-
kanakadhara stotram lyrics in hindi sanskrit-

It is believed that Adi Shankaracahrya composed this hymn Sri Kanakdhara stotram to praise Godess Lakshmi and to shower wealth in home of a poor lady who gave him olive (amla fruit) as Bhiksha. Kanak means gold and Dhara means stream.

This incident happened on Akshay Tritiyaa. Adi Sankara was in the age of 8 years.
Best day for initiating this mantra: Friday or any Full Moon day.

अङ्गम हरेः पुलकभूषणमाश्रयन्ती,
भृङ्गाङ्गगनेव मुकुलाभरणं तमालम् ।
अङ्गीकृताखिलविभूतिरपाङ्गलीला,
मांगल्यदास्तु मम मंगलदेवतायाः ।।१।।

जैसे भँवरे अधखिले पुष्पों से अलंकृत तमाल के पेड़ का आश्रय लेते हैं , उसी प्रकार जो भगवान् विष्णु के अंगों पर सदैव पड़ती रहती है, जिसमें सभी ऐश्वर्यों का निवास है, सम्पूर्ण मंगलों की अधिष्ठात्री भगवती देवी महालक्ष्मी की वह कृपादृष्टि दृष्टि मुझ पर मंगलदायी हो।

मुग्धा मुहुर्विदधती वडने मुरारेः,
प्रेमत्रपाप्रणिहितानि गतागतानि।
माला दृशोर्मधुकरीव महोत्पले या,
सा में श्रियं दिशतु सागरसम्भवायाः ।।२।।

जैसे भ्रमरी (भँवरे) कमल के पत्तों पर मंडराते रहती हैं, उसी प्रकार जो भगवान हरि के मुखारविंद की ओर प्रेमपूर्वक जाकर लज्जा के कारण लौट आती है, समुद्र कन्या देवी लक्ष्मी की वह मनोहर दृष्टि मुझे धन-संपत्ति प्रदान करे।

विश्वामरेन्द्रपदविभ्रमदानदक्षम्
आनन्दहेतुरधिकं मुरविद्विषोऽपि।
ईषन्निषीदतु मयि क्षणमीक्षणार्धम्,
इन्दीवरोदरसहोदरमिन्दिरायाः ।।३।।

Also read : Mahalakshmi Ashtakam

जो सम्पूर्ण देवताओं के राजा इंद्र के पद का वैभव विलास देने में समर्थ हैं, श्री भगवान् हरि को  आनंदित करने वाली हैं तथा जो नीलकमल के भीतरी भाग के समान मनोहर दिखाई पड़ती हैं उन देवी लक्ष्मी के अधखुले नेत्रों की क्षण भर के लिए मुझ पर भी अवश्य पड़े।

आमीलिताक्षमधिगम्य मुदा मुकुन्दम-
आनदकंदमनिमेषमनङ्ग-तन्त्रम ।
आकेकरस्थितकनीनि-कपक्ष्मनेत्रं,
भूत्यै भवेन्मम भुजङ्गशयाङ्गनायाः ।।४।।

जिसकी पुतली एवं भौंहें काम के वशीभूत हो अर्ध विकसित एकटक नयनों को देखने वाले आनंदकंद सच्चिदानंद भगवान मुकुन्द को अपने सन्निकट पाकर किंचित तिरछी हो जाती है। ऐसे शेषशायी भगवान विष्णु की अर्द्धंगिनी श्री लक्ष्मी जी के नेत्र हमें प्रभूत धन-संपत्ति प्रदान करने वाले हों।

बाह्वन्तरे मधुजितः श्रितकौस्तुभे या,
हारावलीव हरिनीलमयी विभाति।
कामप्रदा भगवतोऽपि कटाक्षमाला,
कल्याणमावहतु मे कमलालयायाः ।।५।।

जिन श्री हरि के कौस्तुभमणि से वशीभूत वक्षस्थल में इन्द्रनीलमय हारावली के समान सुशोभित होती है तथा उन भगवान के भी चित्त मे काम अर्थात स्नेह फैलाने वाली कमलवासिनी देवी लक्ष्मी की कटाक्ष माला मेरा मंगल करे।

कालाम्बुदालिललितोरसि कैटभारेर-
धाराधरे स्फुरति या तडिदङ्गनेव।
मातुः समस्तजगतां महनीयमूर्तिर-
भद्राणि में दिशतु भार्गवनन्दनायाः ।।६।।

जिस प्रकार मेघों की घनघोर घटा में बिजली चमकती है उसी प्रकार कैटभ दैत्य के शत्रु भी विष्णु भगवान के काले मेघों के समान मनोहर वक्ष:स्थल पर आप विद्युत के समान देदीप्यमान होती हैं तथा जो समस्त लोकों की माता, भार्गव-पुत्री भगवती श्री लक्ष्मी की पूजनीयामूर्ति मुझे कल्याण प्रदान करे।

प्राप्तं पदं प्रथमतः किल यत्प्रभावान्,
मांगल्यभाजि मधुमाथिनि मन्मथेन।
मय्यापतेत्तदिह मन्थरमीक्षणार्धं
मन्दालसं च मकरालयकन्यकायाः ||७||


समुद्रकन्या लक्ष्मी का वह मंदालस, मंथर, अर्धोंन्मीलित चंचल दृष्टि के प्रभाव से कामदेव ने मंगलमूर्ति भगवान मधुसूदन के हृदय में प्राथमिक (मुख्य) स्थान प्राप्त किया था। वही दृष्टि यहां मेरे ऊपर पड़े।

दद्याद् दयानुपवनो द्रविणाम्बुधाराम
अस्मिन्नकिंचनविहङ्गशिशौ  विषण्णे |
दुष्कर्मघर्ममपनीय चिराय दूरं
नरायणप्रणयिनीनयनाम्बुवाहः ||८||

भगवान नारायण की प्रेमिका लक्ष्मी का नेत्ररूपी मेघ, दाय रूपी अनुकूल वायु से प्रेरित होकर दुष्कर्म रूपी धाम को दीर्घकाल के लिए परे हटाकर विषादग्रस्त मुझ दीन-दुखी सदृश्य जातक पर धनरुपी जलधारा की वर्षा करे।

इष्टा विशिष्ट्मतयोऽपि यया दर्याद्र-
दृष्ट्या त्रिविष्टपपदं सुलभं लभन्ते |
दृष्टिः प्रहृष्टकमलोदरदीप्तिरिष्टां
पुष्टिं कृषीष्ट मम पुष्करविष्टरायाः ||९||

विलक्षण मतिमान मनुष्य जिनके प्रीतिपात्र होकर उनकी कृपा दृष्टि के प्रभाव से स्वर्ग पद को अनायास ही प्राप्त कर लेते हैं, उन्हीं कमलासना कमला लक्ष्मी की वह विकसित कमल गर्भ के सदृश्य कान्तिमती दृष्टि मुझे मनोSभिलाषित पुष्टि-सन्तत्यादि वृद्धि प्रदान करें।

गीर्देवतेति गरुणध्वजसुन्दरीति
शाकम्भरीति शशिशेखरवल्ल्भेति।
 सृष्टिस्थितिप्रलयकेलिषु संस्थितायै
तस्मै नमस्त्रिभुवनैकगुरोस्तरुण्यै।।१०।।

जो भगवती लक्ष्मी वृष्टि-क्रीड़ा के अवसर पर वाग्देवता अर्थात ब्रह्म शक्ति के स्वरूप में विराजमान होती है और पालन-क्रीड़ा के समय पर भगवान गुरुड़ ध्वज अथवा विष्णु भगवान सुंदरी पत्नी लक्ष्मी (वैष्णवी शक्ति) के स्वरूप में स्थित होती है तथा प्रयल लीला के समय शाकंभरी (भगवती दुर्गा) अथवा भगवान शंकर की प्रिय पत्नी पार्वती (रुद्रशक्ति) के रूप में विद्यमान होती है उन त्रिलोक के एकमात्र गुरु भगवान विष्णु की नित्ययौवन प्रेमिका भगवती लक्ष्मी को मेरा नमस्कार है।

श्रुत्यै नमोऽस्तु शुभकर्मफलप्रसूत्यै
रत्यै नमोऽस्तु रमणीयगुणार्णवायै।
शक्त्यै नमोऽस्तु शतपत्रनिकेतनायै
पुष्टयै नमोऽस्तु पुरषोत्तमवललभाय।।११।।

हे लक्ष्मी! शुभकर्म फलदायक! श्रुति स्वरूप में आपको प्रणाम है। रमणीय गुणों के समुद्र स्वरूपा रति के रूपा में स्थित आपको नमस्कार है। शतपत्र कमल-कुंज में निवास करने वाली शक्ति स्वरूपा रमा को नमस्कार है तथा पुरुषोत्तम श्री हरि की अत्यंत प्राणप्रिय पुष्टि-रूपा लक्ष्मी को नमस्कार है।

नमोऽस्तु नालिकनिभाननायै
नमोऽस्तु दुग्धोदधिजन्मभूत्यै।
नमोऽस्तु सोमामृतसोदरायै
नमोऽस्तु नारायणवाल्ल्भायै।।१२।।


कमल के समान मुखवाली लक्ष्मी को नमस्कार है। क्षीर समुद्र में उत्पन्न होने वाली रमा को प्रणाम है। चंद्रमा और अमृत की सहोदर बहन को नमस्कार है। भगवान नारायण की प्रेयसी लक्ष्मी को नमस्कार है।

सम्पत्कराणि सकलेन्द्रियनन्दनानि
साम्राज्यदानविभवानि सरोरूहाक्षि।
त्वद्-वन्दनानि दुरिताहरणोद्तानि
मामेव मातरनिशं कलयन्तु मान्ये।।१३।।


हे कमलाक्षि! आपके चरणों में की हुई स्तुति ऐश्वर्यदायिनी और समस्त इंद्रियों को आनन्दकारिणी है तथा साम्राज्य अर्थात पूर्णाधिकार देने में सर्वथा समर्थ एवं संपूर्ण पापों को नष्ट करने में उद्यत है। माता, मुझे आपके चरण कमलों की वन्दना करने का सदा शुभ अवसर प्राप्त होते रहे।

यत्कटाक्षसमुपासनाविधिः
सेवकस्य सकलार्थसम्पदः।
सन्नोती वचनाङ्गमानसैस
त्वां मुरारीहृदयेश्वरीम भजे।।१४।।


जिनके कृपा-कटाक्ष (तिरक्षी चितवन) के लिए की गई उपासना (आराधना), सेवक (उपासक) के लिए समस्त मनोरथ और संपत्ति का विस्तार करती है, उस भगवान मुरारी की हृदयेश्वरी लक्ष्मी का मैं मन, वचन और काया से भजन करता हूं।

सरसिजनिलये सरोजहस्ते
धवलतमांशुकगन्धमाल्येशोभे।
भगवती हरिवल्ल्भे मनोज्ञे
त्रिभुवनभूतिकरि प्रसीद मह्यं।।१५।।


जिनके कृपा-कटाक्ष (तिरक्षी चितवन) के लिए की गई उपासना (आराधना), सेवक (उपासक) के लिए समस्त मनोरथ और संपत्ति का विस्तार करती है, उस भगवान मुरारी की हृदयेश्वरी लक्ष्मी का मैं मन, वचन और काया से भजन करता हूं।

दिघस्तिभिः कनककुम्भमुखावसृष्ट -
स्वर्वाहिनीविमलचारुजलाप्लुताड्ंगीम।
प्रातर्नमामि जगतां जननीमशेष -
लोकाधिनाथगृहिणीममृताब्धिपुत्रीम।।१६।।


दिग्गजों के द्वारा कनक कुंभ (सुवर्ण कलश) के मुख से पतित आकाशगंगा के स्वच्छ, मनोहर जल से जिस (भगवान) के श्री अंग का अभिषेक (स्नान) होता है उस समस्त लोकों के अधीश्वर भगवान विष्णु पत्नी, क्षीर सागर की पुत्री, जगन्माता लक्ष्मी को मैं प्रात:काल नमस्कार करता हूं।

कमल कमलाक्षवल्ल्भे
त्वं करुणापुरतरङ्गितैरपाङ्गै।
अवलोकय मामकिंचनानाम
प्रथमं पात्रमकृत्रिमं दयायाः।।१७।।


हे कमलनयन भगवान विष्णु प्रिय लक्ष्मी! मैं दीन-हीन मनुष्यों में अग्रमण्य हूं इसलिए आपकी कृपा का स्वभाव सिद्ध पात्र हूं। आप उमड़ती हुई करुणा के बाढ़ की तरल तरंगों के सदृश्य कटाक्षों द्वारा मेरी दिशा में अवलोकन कीजिए।

स्तुवन्ति ये  स्तुतीभिरमूभिरन्वहं
त्रयीमयीं त्रिभुवनमातरम रमाम।
गुणाधिका गुरुतरभाग्यभागिनो
भवन्ति ते भुवि बुधभाविताशयाः।।१८।।


जो मनुष्य इन स्तोत्रों के द्वारा नित्य प्रति वेदत्रयी स्वरूपा तीनों लोकों की माता भगवती रमा (लक्ष्मी) का स्तोत्र पाठ करते हैं वे भक्तगण इस पृथ्वी पर महागुणी और अत्यंत सौभाग्यशाली होते हैं एवं विद्वद्जन भी उनके मनोगत भाव को समझने के लिए विशेष इच्छुक रहते हैं।

।।इति श्री कनक धारा स्तोत्रम सम्पूर्णम।।

Monday, June 18, 2018

MahaLakshmi Ashtakam Lyrics- Mahalaxmi Stotram lyrics in English


mahalakshmi stotram
Mahalakshmi ashtakam

महा लक्ष्मी अष्टकं स्तोत्र हिंदी hindi lyrics-(Click here for English)

This hymn called Mahalakshmi Ashtakam or MahaLakshmi Stotram is chanted by the devotees of Goddess Laxmi to please her and to gain prosperity and wealth. This Stotra or Ashtakam fulfils material desires and financial goals of the devotee. This stotra is said to first orated by Lord Indra.

When and how to chant Mahalakshmi Stotram?

1. Padma purana says that this stotra should be chanted 8 times a day continuously for 41 days. Doing this can open your fortune.
 
2. Also, when any mantra is chanted 108 times, it will overcome ill effects of 9 planets. Chanting this mantra 108 times will be more beneficial to anyone.
 
3. For those who are busy in their life, they can do this paatha in the early morning every day.
 
4. Chanting Mahalakshmi Ashtakm on Deepawali is considered very auspicious.


।।अथ इंद्रकृत महालक्ष्मी अष्टकम ( महालक्ष्मी स्तोत्रम् )।।


नमस्तेऽस्तु महामाये श्रीपीठे सुरपूजिते।
शङ्खचक्रगदाहस्ते महालक्ष्मि नमोस्तुते ।।१।।
नमस्ते गरुडारूढे कोलासुरभयङ्करि।
सर्वपापहरे देवि महालक्ष्मि नमोस्तुते ।।२।।

मैं महामाया कही जाने वाली देवी महालक्ष्मी को प्रणाम करता हूँ, श्री पीठ में देवता जिनकी पूजा करते हैं। जिनके हाथ में शंख, चक्र और गदा शोभित है उन महालक्ष्मी (देवी) को नमस्कार है।
उन देवी को नमस्कार है जो गरुड़ पर आरूढ़ होती हैं और कोलासुर के लिए जो भयंकर प्रतीत होती हैं। सभी पापों को हरने वाली महालक्ष्मी देवी को नमस्कार है।

सर्वज्ञे सर्ववरदे सर्वदुष्टभयङ्करि।
सर्वदुःखहरे देवि महालक्ष्मि नमोस्तुते ।।३।।s
सिद्धिबुद्धिप्रदे देवि भक्तिमुक्तिप्रदायिनी।
मन्त्रमूर्ते सदा देवि महालक्ष्मि नमोस्तुते ।।४।।
 
जो सबकुछ जानती है और जो सभी वरदान देने वाली है, जो सभी दुखों को हर लेतीं हैं उन महालक्ष्मी को नमस्कार है।
सभी प्रकार की सिद्धि और बुद्धि प्रदान करने वाली तथा मोक्ष प्रदान करने वाली देवी जो सदैव मन्त्र के सूक्ष्म रूप में विद्यमान रहती हैं, उन महालक्ष्मी को मैं नमस्कार करता हूँ।

आद्यन्तरहिते देवि आद्यशक्तिमहेश्वरि।
योगजे योगसम्भूते महालक्ष्मि नमोस्तुते ।।५।।
स्थूलसूक्ष्ममहारौद्रे महाशक्ति महोदरे।
महापापहरे देवि महालक्ष्मि नमोस्तुते ।।६।।
 
वे जो आदि और अंत से रहित हैं और जो आदिशक्ति हैं उन योग से जन्मीं और योग से जुड़ीं महालक्ष्मी देवी को नमस्कार है। जो स्थूल और सूक्ष्म दोनों रूपों में विद्यमान हैं, जो रुद्राणी देवी का भयंकर रूप हैं। जो महाशक्ति के उदर (womb) में स्थित हैं उन महापाप को हरने वाली महालक्ष्मी देवी को नमस्कार है।

पद्मासनस्थिते देवि परब्रम्हस्वरूपिणी।
परमेशि जगन्मातर्महालक्ष्मि नमोस्तुते ।।७।।
श्वेताम्बरधरे देवि नानालङ्कारभूषिते।
जगत्स्थिते जगन्मातर्महालक्ष्मि नमोस्तुते ।।८।।
 
जो कमल के आसान पर विराजमान हैं और जो परब्रम्ह का स्वरुप हैं उन महादेवी सम्पूर्ण जगत की माता महालक्ष्मी को नमस्कार है।
जिन्होंने सफ़ेद वस्त्र पहने हुए हैं और जो अनेको आभूषणों से सुशोभित हैं उन (संसार में निहित) महालक्ष्मी देवी को नमस्कार है।

फलश्रुति: -
महालक्ष्म्यष्टकम् स्तोत्रं यः पठेद्भक्तिमान्नरः।
सर्वसिद्धिमवाप्नोति राज्यं प्राप्नोति सर्वदा ।।
एककाले पठेन्नित्यं महापापविनाशनम्।
द्विकालं यः पठेन्नित्यं धनधान्यसमन्वितः।।
जो पूरी श्रद्धा और भक्ति के साथ महालक्ष्मी स्तोत्र को पढ़ता है वह सभी सिद्धियों और समृद्धि को प्राप्त करता है।
प्रतिदिन एक बार पाठ करने वाले के महान पापों का भी नाश हो जाता है। दो बार पढ़ने वाले को धनधान्य की प्राप्ति होती है।

त्रिकालं यः पठेन्नित्यं महाशत्रुविनाशनम्।
महालक्ष्मिर्भवेन्नित्यं प्रसन्ना वरदा शुभा ।।

तीन बार इस स्तोत्र को पढ़ने वाले के शत्रुओं का नाश हो जाता है और महालष्मी सदैव उससे प्रसन्न होतीं है।

।। इति श्री महालक्ष्मी अष्टकम सम्पूर्णम।।

Shri MahaLakshmi Ashtakam (stotram) English Lyrics

om
Namaste- astu Mahamaaye shripeethe- surpujite
shankha- chakra- gadaa- haste Mahalakshmi Namostute, 1
Namaste Garudharudhe, Kolasura- bhayankari
Sarva- paap- hare devi, Mahalakshmi Namostute, 2

Sarvagye sarva varade sarvadushta bhayankari,
Sarva- dukhh- hare devi Mahalakshmi Namostute, 3
Siddhi buddhi prade devi bhukti mukti pradaayini,
Mantra moorte sada devi Mahalakshmi Namostute, 4

Aadyanta- rahite devi Aadyashakti Maheshwari,
Yogaje yogsambhoote, Mahalakshmi Namostute, 5
Sthulsukshm- maharaudre mahashakti mahodare,
Mahapaapa- hare devi Mahalakshmi Namostute, 6

Padmaasana- sthite devi Parabramha- swarupini,
Parameshi JaganmaatarMahalakshmi Namostute, 7
Shwetaambar- dhare devi Nana-alankaar bhushite,
Jagat- sthite JaganmaatarMahalakshmi Namostute, 8

Mahalakshmyashtakam Stotram yah pathed-bhaktimaanarah,
Sarvsiddhimavapnoti rajyam praapnoti sarvada, 9
Ekakaale pathennityam Mahapaapa- vinashanam,
dwikaalam yah pathennityam dhan-dhaanya- samanvitah, 10

Trikaaalam yah pathennityam Mahashatru Vinaashanam,
Mahalakshmeer- bhavennityam prasanna varadaa shubha, 11

iti shri mahalakshmi ashtakam sampurnam

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Saturday, June 16, 2018

प्रेतराज सरकार की आरती | Pretraj Sarkar Ki Aarti lyrics

shri pretraj sarkar aarti
Pretraj Sarkar

श्री प्रेतराज सरकार की आरती -

प्रेतराज सरकार का मंदिर मेहंदीपुर राजस्थान में स्थित है, प्रेतराज सरकार को भूतों के देवता(राजा) के रूप में पूजा जाता है। प्रेतराज सरकार बालाजी के सहायक देव हैं और बालाजी की पूजा के साथ प्रेतराज सरकार की पूजा भी अनिवार्य है। यहाँ हमारी वेबसाइट पर प्रेतराज सरकार की आरती हिंदी और उसके नीचे english में दी गयी है।

जय प्रेतराज कृपाल मेरी, अरज अब सुन लीजिये |
मैं शरण तुम्हारी आ गया हूँ , नाथ दर्शन दीजिये ||

मैं करूँ विनती आपसे अब तुम दयामय चित्त धरो |
चरणों का ले लिया आसरा, प्रभु वेग से दुःख मेरा हरो ||

सिर पर मुकुट कर में धनुष, गल बीच मोतियन माल है |
जो करें दर्शन प्रेम से, सब कटत भाव के जाल है ||

जब पहन दस्तर  खडग बाई बगल में ढाल है |
ऐसा भयंकर रूप जिसको देख डरपत काल है ||

अति प्रबल सेना विकत योद्धा, संग में विकराल है|
सब भूत प्रेत पिशाच बाँधे, कैद करते  हाल है ||

तव रूप धरते वीर का, करते तैयारी चलन की |
संग में लडाके जवान, जिनकी थाह नहीं बलन की ||

तुम सब तरह सामर्थ्य हो, सकल सुख के धाम हो |
दुष्टों के मारनहार हो,  भक्तों के पूरण काम हो ||

मैं हूँ मति का मंद मेरी, बुद्धि  को निर्मल करो |
अज्ञान का अँधेरा उर में ज्ञान का दीपक धरो ||

सब मनोरथ सिद्ध करते, जो कोई सेवा करे |
तंदुल, बूरा , घ्रत,  मेवा, भेंट ले आगे धरे ||

सुयश सुनके आपका, दुखिया तो आये दूर से |
सब स्त्री अरु पुरुष आकर पड़े हैं चरण हुजूर के ||

लीला है अदभुत आपकी महिमा तो अपरंपार है |
मैं ध्यान जिस दिन धरत हूँ, रच देना मंगलाचार है ||

सेवक गणेशपुरी महंत जी की, लाज तुम्हारे हाथ है |
करना खता सब माफ़ उनकी, देना हरदम साथ है||

दरबार में आयो अभी, सरकार में हाजिर खड़ा |
इंसाफ मेरा अब करो, चरणों में आकर गिर पड़ा ||

अर्जी बमूजिब दे चुका, अब गौर इस पर कीजिये |
तत्काल इस पर हुक्म लिख दो, फैसला कर दीजिये ||

महाराज की यह स्तुति, कोई नियम रूप से गाया करे |
सब सिद्ध कारज होये, उनके रोग पीड़ा सब हरे ||

भक्त सेवक आपके, उनको नहीं विसराइये |
जय जय मनायें आपकी, बेड़े को पार लगाइये ||

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Pretraj Sarkar ki aarti lyrics-

Pretraj sarkar ki aarti lyrics in english

jay pretraj kripaal meri araj ab sun lijiye
mein sharan tumhari aa gaya hun naath darshan dijiye.

mein karun vinti aapse ab tum dayamay chitt dharo
charno ka le liya aasra prabhu veg se mera dukh haro.

sir par mukut kar me dhanush gal beech motiyan maal hai
jo karen darshan prem se sab katat bhav ke jaal hai.

jab pehan dastar le khadag by bagal me dhaal hai
esa bhayankar roop jisko dekh darpat kaal hai.

ati prabal sena vikat yodha sang me vikraal hai
sab bhoot pretpisaach baandhe kaid karte haal hai.

tab roop dharte veer ka karte taiyaari chalan ki
sang me ladake javan jinki thaah nhi balan ki.

tum sab tarah saamarthya ho prabhu sakal sukh ke dhaam ho
duston ke maaranhaar ho bhakton ke puran kaam ho.

mein hu mati ka mand meri buddhi ko nirmal karo
agyaan ka andhera ur mein gyaan ka deepak dharo.

sab manorath siddh karte jo koi seva kare
tandul boora ghrt meva bhent le aage dhare.

suyash sun ke aapka dukhiya to aaye dur se
sab stri or purush aakr pade charan hujur ke.

leela hai adbhut aapki mahima to aprampaar hai
me dhyaan jis din dharat hu, rach dena manglachar hai.

sevak ganeshpuri mahant ji ki laaj tumhare haanth hai
karna khata sab maaf unki dena hardam saath hai.

darbaar me aayo abhi sarkar me haajir khada
insaaf mera ab karo charon me aakar gir pada.

arji bamujib de chuka ab gor is par keejiye
tatkaal is pr hukm likh do faisla kar deejiya.

maharaj ki yah stuti koi niyam se gaaya kare
sab siddh kaaraj hoye unke rog peeda sab hare.

bhakt sevak aapke unko nahi visraaiye
jai jai manayen aapki bede ko paar lagaiye.

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Thursday, June 14, 2018

Shri Ram Chalisa in Hindi

 shri ram

श्री राम चालीसा -

चौपाई 
श्री रघुवीर भक्त हितकारी| सुन लीजे प्रभु अरज हमारी ||
निशदिन ध्यान धरे जो कोई | ता सम भक्त और नहिं होई ||

ध्यान धरे शिवजी मन माहीं | ब्रम्ह इंद्र पार नहिं पाहीं ||
जय जय जय रघुनाथ कृपाला , सदा करो संतान प्रतिपाला।।

तुम्हार वीर हनुमाना | जासु प्रभाव तिहूं पुर जाना ||
तब भुज दंड प्रचंड कृपाला | रावण मारि सुरन प्रतिपाला ||

तुम अनाथ के नाथ गुंसाई | दीनन के हो सदा सहाई ||
ब्रम्हादिक तव पारन पावैं| सदा ईश तुम्हरो यश गावैं ||

चारिउ वेद भरत हैं साखी | तुम भक्तन की लज्जा राखीं ||
गुण गावत शारद मन माहीं | सुरपति ताको पार न पाहीं ||

नाम तुम्हार लेत जो कोई | ता सम धन्य और नहिं होई ||
राम नाम है अपरम्पारा | चारिहु वेदन जाहि पुकारा ||

गणपति नाम तुम्हारो लीन्हो | तिनको प्रथम पूज्य तुम कीन्हो ||
शेष रटत नित नाम तुम्हारा| माहि को भार शीश पर धारा ||

फूल सामान रहत सो भारा| पाव न कोउ तुम्हरो पारा ||
भरत नाम तुम्हरो उर धारो| तासों कबहुं न रण में हरो||

नाम शत्रुघन हृदय प्रकाशा | सुमिरत होत शत्रु कर नाशा ||
लखन तुम्हारे आज्ञाकारी | सदा करत सन्तन रखवारी ||

ताते रण जीते नहिं कोई | युद्ध जुरे यमहूं किन होइ ||
महालक्ष्मी धर अवतारा| सब विधि करात पाप को छारा ||

सीता राम पुनीता गायो| भुवनेश्वरी प्रभाव दिखायो ||
घाट सों प्रकट भाई सो आई| जाको देखत चंद्र लजाई ||

सो तुमरे नित पांव पलोटत| नवो निद्धि चरणन में लोटत ||
सिद्धि अठारह मंगलकारी| सो तुम पर जावे बलिहारी ||

औरहु जो अनेक प्रभुताई | सो सीतापति तुमहिं बनाई ||
इच्छा ते कोटिन संसारा | रचत न लागत पल की बारा ||

जो तुम्हे चरणन चित लावै| ताकि मुक्ति अवसि हो जावै ||
जय जय जय प्रभु ज्योति स्वरूपा| निर्गुण ब्रम्ह अखंड अनूपा||

सत्य सत्य जय सत्यव्रत स्वामी| सत्य सनातन अन्तर्यामी||
सत्य भजन तुम्हरो जो गावे| सो निश्चय चरों फल पावें||

सत्य सपथ गौरीपति कीन्हि| तुमने भक्तिहिं सब विधि दीन्हीं||
सुनहु राम तुम तात हमारे | तुमहिं भरत कुल पूज्य प्रचारे ||

तुम्हीं देव कुल देव हमारे | तुम गुरु देव प्राण के प्यारे ||
जो कुछ हो सो तुम्हीं राजा| जय जय जय प्रभु राखो लाजा ||

राम आत्मा पोषण हारे| जय जय दशरथ राज दुलारे ||
ज्ञान हृदय दो ज्ञान स्वरूपा| नमो नमो जय जगपति भूपा||

धन्य धन्य तुम धन्य प्रतापा| नाम तुम्हार हरत संतापा ||
सत्य शुद्ध देवन मुख गाया| बजी दुन्दुभि शंख बजाया ||

सत्य सत्य तुम सत्य सनातन| तुम ही हो हमारे तन मन धन ||
याको पाठ करे जो कोई| ज्ञान प्रकट ताके उर होइ ||

आवागमन मिटै तिहि केरा| सत्य वचन माने शिर मेरा ||
और आश मन में जो होइ| मनवांछित फल पावे सोइ ||

तीनहुँ काल ध्यान जो ल्यावै| तुलसी दाल अरु फूल चढ़ावे||
साग पत्र सो भोग लगावे| सो नर सकल सिद्धता पावे ||

अंत समय रघुवरपुर जाई| जहाँ जन्म हरि भक्त कहाई ||
श्री हरिदास कहै अरु गावे| सो बैकुण्ठ धाम को पावै ||
दोहा -

सात दिवस जो नेम कर , पाठ करे चित लाये |
हरिदास हरी कृपा से , अवसि भक्ति को पाय ||

राम चालीसा जो पढ़े , राम चरण चित लाय |
जो इच्छा मन में करै , सकल सिद्ध हो जय ||

।। इति श्री प्रभु राम चालीसा सम्पूर्णम ।।

Ram Chalisa in Hindi ( Lyrics )-

shri raghuveer bhakt hitkari sun lije prabhu araj hmari.
nishdin dhyaan dhare jo koi ta sam bhakt or nhi hoi..

dhyaan dhare shivji man mahi brahma indra par nhi pahi.
jai jai jai raghunaath kripala sada karo santan pratipala..

doot tumhaar veer hanumaana jasu prabhav tihu pur jana.
tav bhujdand prachan kripala ravan mari suran pratipala..

tum anah ke naat gusai deenan ke ho sada sahai.
bramhadik tav par na paven sada eesh tumharo yash gave..

chariu ved bharat hai sakhi tum bhaktan ki lajja rakhi.
gun gavat sharad man mahi surpati tako par na pahi..

naam tumhare let jo koi ta sam dhyan aur nhi koi.
ram naam hai aprampara charin ved jahi pukara..

ganpati naam tumharo linho tinko pujya pratham tum kinho.
shesh ratat nit naam tumhara mahi ko bhar shish par dhara..

phool saman rahat so bahara pavat kou na tumhara para.
bharat naam tumharo ur dharo taso kabahu na ran me haro..

naam satrugna hriday prakasha sumirat hot satru kar nasha.
lakhan tumhare aagykari sada karat santan rakhwari..

taate ran jeete nahi koi yuddh jure yamahu kin hoi.
mahalakshmi dhar avtara sab vidhi karat paap ko chara..

seeta ram puneet gayo bhuvneswari prabhav dikhayo.
ghat pe prakat bhai so aayi jako dekhat chand lajai..

so tumhare nit paon palotat navo nidhi charnan mein lotat
siddhi atharah mangalkari so tum par jave balihari

aurahu jo naek prabhutai so seetapati tumahi banai
ichcha te kotin sansara rachat na lagat pal ki bhara

jotumhare charnan chit lave, taki mukti avasi ho jaye
sunahu ram tum tat hmare tumhi bharat kul pujya prachare

tumhi dev kul dev hmare, tum gurudev pran ke pyare
jai jai jai prabhu jyoti swarupa, nirgun bramha akhand anoopa

satya satya jai satyavrt swami, satya sanatan antaryami
satya bhajan tumharo jo gaave, so nishchy charon phal pave

satya sapath gauripati kinhi tumne bhaktahi sab siddhi dinhi
gyan hrady jo gyaan swarupa namo namo jai jagpati bhoopa

dhyan dhyan tum dhyan pratapa naam tumhar harat santapa
satya shudh deva mukh gaya baji dundubhi shankh bajaya

satya satya tum satya sanatan tumhi ho hmara tan man dhan
yako path kare jo koi gyan prakat take ur hoi

awagaman mitsi tihi kera satya vachan mane shiv mera
aur aas man mein jo hoi manvanchit phal pave soi

teenahu kal dhyan jo lave tulsidas anu phool chadave
saag patra so bhog lagave so nar sakal siddhata pave

ant samay raghuvar pur jai jaha janam hari bhakt kahai
shri haridas khai aru gaave so vaikunth dham ko pave

-doha-

saat diwas jo nem kar path kare chit laye
hardas harikripa se avasi bhakti k pave

ram chalisa jo padhe ram sharan chit laye
jo ichcha man mein kare sakal siddha ho jaye

| iti shri ram chalisa sampurnam |

Shri Ram Ji Ki Aarti lyrics, श्री राम चन्द्र कृपालु भजमन

shri ram ji
Shri Ram

राम जी की आरती -

 श्री राम जी की आरती संत गोस्वामी तुलसीदास जी के द्वारा लिखी गयी है। इस आरती के साथ हनुमान जी की आरती भी करना चाहिए। 
श्री राम चंद्र कृपालु भजु मन, हरण भव भय दारुणम |
नव कंज लोचन कंज मुख, कर कंज, पद कंजारुणम ||


कंदर्प अगणित अमित छवि नव नील नीरज सुंदरम ||
पटपीत मानहु तड़ित रूचि शुचि नौमि जनक सुतावरम |

भजु दीन बन्धु दिनेश, दानव दैत्य वंश निकन्दनम |
रघुनन्द आनंदकंद कौशलचंद्र, दशरथ नन्दनम ||

सिर मुकुट कुण्डल तिलक, चारु उदारु अंग विभूषणं |
आजानुभुज सर-चाप धर , संग्रामजित खरदूषणं ||

इति वदति तुलसीदास शंकर, शेष मुनि मन रंजनम |
मम हृदय कुञ्ज निवास कुरु, कामादि खल दल भंजनम||

मन जाहि राचेउ मिलहि सो, वर सहज सुंदर सांवरो |
करूणानिधान सुजान सील, सनेह जानत रावरो ||

एहि भांति गौरी असीस सुनी, सिय सहित हर्षित अली |
तुलसी भवानिहि पुजि पुनि पुनि, मुदित मन मंदिरचली ||

-दोहा-

जानी गौरि अनुकूल, सिय हिय हरषु न जाई कहि |
मजुल मंगल मूल, बाम अंग फरकन लगे ||

Ram Ji Ki Aarti, Shri Ram aarti-

Ram aarti is created and sung by Goswami Tulsidas Ji. With this aarti, Hanuman aarti is very effective in worship.

Shree ram chandra kripalu bhaju man,
haran bhav bhay darunam,
nav kanj lochan, kanj mukh,
kar kanj, pad kanjarudnam,

kandarp agadit amit chavi,
nav neel neeraj sundaram,
patpeet manahu tadit ruchi suchi,
naumi janaksutavaram,

bhaju deen bandhu dinesh,
danav daityavans nikandnam,
raghunand anandkand kaushalchandra,
dasrath nandnam,

sir mukut kundal tilak,
charu udaru ang vibhusnam,
aajanubhuj sar chaap dhar,
sangramjit khardushnam,

iti vadit tulsidas shankar,
shesh muni man ranjnam,
mam hraday kunj nivas kuru,
kamadi khal dal bhanjnam,

man jaahi racheu milahi so var,
sahaj sundar saanwaro,
karunanidhan sujaan seel,
saneh jaanat raawaro,

ehi bhaanti gauri asees suni,
siy sahit hiy harshit ali,
tulsi bhawanihi pooji puni puni,
mudit man mandir chali.

-Doha-

jaani gauri anukul, siy hiy harsu na jayi kahi,
manjul mangal mul, baam ang farkan lage


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Wednesday, May 30, 2018

Keelak Stotram | कीलक स्तोत्र अर्थ सहित Lyrics

Chandi Keelak Stotram


कीलक स्तोत्र का पाठ दुर्गा सप्तशती (देवी माहात्म्य) के अंतर्गत किया जाता है। इस स्तोत्र का पाठ अनिवार्य रूप से दुर्गा कवच और अर्गला स्तोत्र के बाद किया जाता है।

इस स्तोत्र के पहले मंत्र का ३१ बार प्रतिदिन जप करने से मन में शान्ति प्राप्त होती है। यहाँ कीलक स्तोत्र का पूरा विवरण अर्थ सहित दिया गया है। 
~~अथ कीलक स्तोत्रम्~~
विनियोगः- ॐ अस्य कीलकमंत्रस्य शिव ऋषिः अनुष्टुप् छन्दः श्रीमहासरस्वती देवता श्रीजगदम्बाप्रीत्यर्थं सप्तशतीपाठाङ्गत्वेन जपे विनियोगः।।
ॐ नमश्चण्डिकायै
मार्कण्डेय उवाच
ॐ विशुद्धज्ञानदेहाय त्रिवेदीदिव्यचक्षुषे ।
श्रेयःप्राप्तिनिमित्ताय नमः सोमार्धधारिणे ।।१।।
सर्वमेतद्विजानियान्मंत्राणामभिकीलकम् ।
सो-अपि क्षेममवाप्नोति सततं जाप्यतत्परः ।।२।।

मार्कण्डेय जी कहते हैं- विशुद्ध ज्ञान ही जिनका शरीर है, तीनों वेद ही जिनके तीन नेत्र हैं, जो कल्याण प्राप्ति के हेतु हैं तथा अपने मस्तक पर अर्धचंद्र धारण करते हैं, उन भगवान् शिव को नमस्कार है। मन्त्रों का जो अभिकीलक है अर्थात मन्त्रों की सिद्धि में विघ्न उपस्थित करने वाले शापरूपी कीलक का निवारण करने वाला है, उस सप्तशती स्तोत्र को सम्पूर्ण रूप से जानना चाहिए (और जानकर उसकी उपासना करनी चाहिए)।।१-२।।

सिध्यन्त्युच्याटनादीनि वस्तुनि सकलान्यपि।
एतेन स्तुवतां देवी स्तोत्रमात्रेण सिद्ध्यति ।। ३।।
न मन्त्रो नौषधं तत्र न किञ्चिदपि विद्यते।
विना जाप्येन सिद्ध्यते सर्वमुच्चाटनादिकम् ।।४।।

उसके भी उच्चाटन आदि कर्म सिद्ध होते हैं उसे भी समस्त दुर्लभ वस्तुओं की प्राप्ति होती है; तथापि जो अन्य मन्त्रों का जप न करके केवल इस सप्तशती नामक स्तोत्र से ही देवी की स्तुति करते हैं, उन्हें स्तुति मात्र से ही सच्चिदानन्दस्वरूपिणी देवी सिद्ध हो जाती हैं। उन्हें अपने कार्य की सिद्धि के लिये मंत्र, औषधि तथा अन्य किसी साधन के उपयोग की आवश्यकता नहीं रहती | बिना जप के उनके उच्चाटन आदि समस्त अभिचारिक कर्म सिद्ध हो जाते हैं ।।३-४।।

समग्राण्यपि सिद्धयन्ति लोकशङ्कामिमां हरः।
कृत्वा निमन्त्रयामास  सर्वमेवमिदं शुभम् ।।५।।
स्तोत्रं वै चण्डिकायास्तु तच्च गुप्तं चकार सः।

समाप्तिर्न च पुण्यस्य तां यथावान्नियन्त्रणाम् ।।६।।

इतना ही नहीं ,उनकी संपूर्ण अभीष्ट वस्तुएँ भी सिद्ध होती है | लोगों के मन में यह शंका थी कि 'जब केवल सप्तशती की उपासना से भी सामान रूप से अथवा सप्तशती को छोड़कर अन्य मंत्रो की उपासना से भी सामान रूप से सब कार्य सिद्ध होते है, अब इनमे श्रेष्ठ कौन सा साधन है?' लोगों की इस शंका को सामने रखकर भगवान् शंकर ने अपने पास आए हुए जिज्ञासुओं को समझाया की यह सप्तशती नामक संपूर्ण स्रोत ही सर्वश्रेष्ठ एवं कल्याणमय है तदनन्तर भगवती चण्डिकाके सप्तशती नामक स्त्रोत को महादेव जी ने गुप्त कर दिया; सप्तशती के पाठसे जो पुण्य प्राप्त होता है, उसकी कभी समाप्ति नहीं होती; किंतु अन्य मंत्रो के जपजन्य पुण्य की समाप्ति हो जाती है, अतः भगवान् शिव ने अन्य मंत्रो की अपेक्षा जो सप्तशती की ही श्रेष्ठता का निर्णय किया उसे जानना चाहिए ।।५-६।।

सोअपि  क्षेममवाप्नोति  सर्वमेवं न संशयः।
कृष्णायां वा चतुर्दश्यामष्टम्यां वा समाहितः ।।७।।
ददाति प्रतिगृह्णाति नान्यथैषा प्रसीदति।
इत्थंरूपेण कीलेन महादेवेन कीलितम ।।८।।

अन्य मंत्रो का जप करनेवाला पुरुष भी यदि सप्तशती के स्त्रोत और जप का अनुष्ठान कर ले तो वह भी पूर्ण रूप से ही कल्याण का भागी होता है, इसमें तनिक भी संदेह नहीं है, जो साधक कृष्णपक्ष की चतुर्दशी अथवा अष्टमी को एकाग्रचित होकर भगवती कीसेवा में अपना सर्वस्वा समर्पित कर देता है और फिर उसे प्रसाद रूप से ग्रहण करता है, उसी पर भगावती प्रसन्न होती है; अन्यथा उनकी प्रसन्नता नहीं प्राप्त होती; इस प्रकार सिद्धि के प्रतिबंधक रूप कीलके द्वारा महादेव जी ने इस स्त्रोत को कीलित कर रखा है ।।७-८।।

यो निष्कीलां विधायैनां नित्यं जपति संस्फुटम्।
स सिद्धः स गणः सोअपि गन्धर्वो जायते नरः।।9।।
न चैवाप्यटतस्तस्य भयं क्वापीह जायते।
नापमृत्युवशं याति मृतो मोक्षमवाप्नुयात् ।।१०।।

जो पूर्वोक्त रीति से निष्कीलन करके इस सप्तसती स्त्रोत का प्रतिदिन स्पष्ट उच्चारणपूर्वक पाठ करता है, वह मनुस्य सिद्ध हो जाता है, वही देवी का पार्षद होता है और वही गांधर्व भी होता है । सर्वत्र विचरते रहने पर भी इस संसार में उसे कहीं भी भय नहीं होता | वह अपमृत्यु के वश में नहीं पड़ता तथा देह त्यागने के अनन्तर मोक्ष प्राप्त कर लेता है।।9-10।।

ज्ञात्वा प्रारभ्य कुर्वीत न कुर्वाणो विनश्यति।
ततो ज्ञात्वैव सम्पन्नमिदं प्रारभ्यते बुधैः ।।११।।
सौभाग्यादि च यत्किञ्चित्त दृश्यते ललनाजने।
तत्सर्वं  तत्प्रसादेन तेन  जाप्यमिदं शुभम् ।।१२।।

अतः कीलन को जानकार उसका परिहार करके ही सप्तसती का पाठ आरंभ करे, जो ऐसा ही करता उसका नाश हो जाता है, इसलिए कीलकऔर निष्कीलन का ज्ञान प्राप्त करने पर ही यह स्त्रोत निर्दोष होता है और विद्वान् पुरुष इस निर्दोष स्तोत्र का ही पाठ आरंभ करते है। स्त्रियों में जो कुछ भी सौभाग्य आदि दृश्टिगोचर होता है, वह सब देवी के प्रसाद का ही फल है | अतः इस कल्याणमय स्त्रोत का सदा जप करना चाहिए ।।११-१२।।

शनैस्तु जप्यमाने-अस्मिन स्तोत्रे सम्पत्तिरुच्चकैः।
भवत्येव  समग्रापि  ततः  प्रारभ्यमेव  तत् ।।१३।।
ऐश्वर्यं    यत्प्रसादेन   सौभाग्यारोग्यसम्पदः।
शत्रुहानिः परो मोक्षः स्तूयते सा न किं जनैः।।ॐ।।१४।।

इस स्त्रोत का मंद स्वर से पाठ करने पर स्वल्प फल की सिद्धि है, अतः उच्च स्वर से ही इसका पाठ आरंभ करना चाहिए जिनके प्रसाद से ऐश्वर्य, सौभाग्य, आरोग्य, सम्पत्ति, शत्रुनाश तथा परम मोक्ष की भी सिद्धि होती है, उन कल्याणमयी जगदम्बा की स्तुति मनसा क्यों नहीं करते ?
इति श्री देव्याः कीलकस्तोत्रम सम्पूर्णम् ।

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Thursday, May 24, 2018

अर्गला स्तोत्रम् | Argala Stotram lyrics in Hindi

argala stotram prayer hindi sanskrit
jayanti mangla

अर्गला स्तोत्र का पाठ दुर्गा कवच के बाद और कीलक स्तोत्र के पहले किया जाता है। यह देवी माहात्म्य के अंतर्गत किया जाने वाला स्तोत्र अत्यंत शुभकारक और लाभप्रद है।

इस स्तोत्र का पाठ नवरातत्रि के अलावा देवी पूजन में भी किया जाता है।

।। अथार्गलास्तोत्रम् ।।

विनियोग- ॐ अस्य श्री अर्गलास्तोत्रमन्त्रस्य विष्णुर्ऋषिः अनुष्टुप छन्दः श्रीमहालक्ष्मीर्देवता श्रीजगदम्बाप्रीतये सप्तशती पाठाङ्गत्वेन जपे विनियोगः ।

ॐ नमश्चण्डिकायै
[ मार्कण्डेय उवाच ]
ॐ जयंती मंगला काली भद्रकाली कपालिनी।
दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोऽस्तुते ।। १।।
जय त्वं देवि चामुण्डे जय भूतार्तिहारिणि।
जय सर्वगते देवि कालरात्रि नमोऽस्तुते ।।२।।

ॐ चंडिका देवी को नमस्कार है। 
मार्कण्डेय जी कहते हैं - जयन्ती, मंगला, काली, भद्रकाली, कपालिनी, दुर्गा, क्षमा, शिवा, धात्री, स्वाहा और स्वधा - इन नामों से प्रसिद्ध जगदम्बिके! तुम्हें मेरा नमस्कार हो। देवि चामुण्डे! तुम्हारी जय हो। सम्पूर्ण प्राणियों की पीड़ा हरने वाली देवि! तुम्हारी जय हो। सब में व्याप्त रहने वाली देवि! तुम्हारी जय हो। कालरात्रि! तुम्हें नमस्कार हो।।

मधुकैटभविद्राविविधातृ वरदे नमः।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि।।३।।
महिषासुरनिर्णाशि भक्तनाम सुखदे नमः।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि।। ४।।

मधु और कैटभ को मारने वाली तथा ब्रह्माजी को वरदान देने वाली देवि! तुम्हे नमस्कार है। तुम मुझे रूप (आत्मस्वरूप का ज्ञान) दो, जय (मोह पर विजय) दो, यश (मोह-विजय और ज्ञान-प्राप्तिरूप यश) दो और काम-क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो।। महिषासुर का नाश करने वाली तथा भक्तों को सुख देने वाली देवि! तुम्हें नमस्कार है। तुम रूप दो, जय दो, यश दो और काम-क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो ।।३-४।।

रक्तबीजवधे देवि चण्डमुण्डविनाशिनी।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ।। ५ ।।
शुम्भस्यैव निशुम्भस्य धूम्राक्षस्य च मर्दिनी।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि।। ६।।

रक्तबीज का वध और चण्ड-मुण्ड का विनाश करने वाली देवि! तुम रूप दो, जय दो, यश दो और काम-क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो ।। शुम्भ और निशुम्भ तथा धूम्रलोचन का मर्दन करने वाली देवि! तुम रूप दो, जय दो, यश दो और काम-क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो ।।५-६।।

वन्दिताङ्घ्रियुगे देवि सर्वसौभाग्यदायिनी।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि।। ७।।
अचिन्त्यरूपचरिते सर्वशत्रुविनाशिनि।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि।। ८।।

सबके द्वारा वन्दित युगल चरणों वाली तथा सम्पूर्ण सौभग्य प्रदान करने वाली देवि! तुम रूप दो, जय दो, यश दो और काम-क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो ।। देवि! तुम्हारे रूप और चरित्र अचिन्त्य हैं। तुम समस्त शत्रुओं का नाश करने वाली हो। तुम रूप दो, जय दो, यश दो और काम-क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो ।।७-८।।

नतेभ्यः सर्वदा भक्त्या चण्डिके दुरितापहे।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि।। ९।।
स्तुवद्भ्यो भक्तिपूर्वं त्वाम चण्डिके व्याधिनाशिनि।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ।। १०।।

पापों को दूर करने वाली चण्डिके! जो भक्तिपूर्वक तुम्हारे चरणों में सर्वदा (हमेशा) मस्तक झुकाते हैं, उन्हें रूप दो, जय दो, यश दो और काम-क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो ।। रोगों का नाश करने वाली चण्डिके! जो भक्तिपूर्वक तुम्हारी स्तुति करते हैं, उन्हें तुम रूप दो, जय दो, यश दो और काम-क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो ।।९-१०।।

चण्डिके सततं ये त्वामर्चयन्तीह भक्तितः।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि।। ११।।
देहि सौभाग्यमारोग्यं देहि मे परमं सुखम्।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि।। १२।।

चण्डिके! इस संसार में जो भक्तिपूर्वक तुम्हारी पूजा करते हैं उन्हें रूप दो, जय दो, यश दो और काम-क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो ।। मुझे सौभाग्य और आरोग्य (स्वास्थ्य) दो। परम सुख दो, रूप दो, जय दो, यश दो और काम-क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो ।।११-१२।।

विधेहि द्विषतां नाशं विधेहि बलमुच्चकैः।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि।। १३।।
विधेहि देवि कल्याणम् विधेहि परमां श्रियम।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि।। १४।।

जो मुहसे द्वेष करते हों, उनका नाश और मेरे बल की वृद्धि करो। रूप दो, जय दो, यश दो और काम-क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो ।। देवि! मेरा कल्याण करो। मुझे उत्तम संपत्ति प्रदान करो। रूप दो, जय दो, यश दो और काम-क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो ।। १३-१४।।

सुरसुरशिरोरत्ननिघृष्टचरणेम्बिके।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि।। १५।।
विद्यावन्तं यशवंतं लक्ष्मीवन्तं जनं कुरु।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि।। १६।।

अम्बिके! देवता और असुर दोनों ही अपने माथे के मुकुट की मणियों को तुम्हारे चरणों पर घिसते हैं तुम रूप दो, जय दो, यश दो और काम-क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो ।। तुम अपने भक्तजन को विद्वान, यशस्वी, और लक्ष्मीवान बनाओ तथा रूप दो, जय दो, यश दो और काम-क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो ।।१५-१६।।

प्रचण्डदैत्यदर्पघ्ने चण्डिके प्रणताय मे।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि।। १७।।
चतुर्भुजे चतुर्वक्त्र संस्तुते परमेश्वरि।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि।। १८।।

प्रचंड दैत्यों के दर्प का दलन करने वाली चण्डिके! मुझ शरणागत को रूप दो, जय दो, यश दो और काम-क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो ।। चतुर्भुज ब्रह्मा जी के द्वारा प्रशंसित चार भुजाधारिणी परमेश्वरि! तुम रूप दो, जय दो, यश दो और काम-क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो ।।१७-१८।।

कृष्णेन संस्तुते देवि शश्वत भक्त्या सदाम्बिके।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि।। १९।।
हिमाचलसुतानाथसंस्तुते परमेश्वरि।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि।। २०।।

देवि अम्बिके! भगवान् विष्णु नित्य-निरंतर भक्तिपूर्वक तुम्हारी स्तुति करते रहते हैं। तुम रूप दो, जय दो, यश दो और काम-क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो ।। हिमालय-कन्या पार्वती के पति महादेवजी के द्वारा होने वाली परमेश्वरि! तुम रूप दो, जय दो, यश दो और काम-क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो ।।१९-२०।।

इन्द्राणीपतिसद्भावपूजिते परमेश्वरि।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि।। २१।।
देवि प्रचण्डदोर्दण्डदैत्यदर्पविनाशिनि।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि।। २२।।

शचीपति इंद्र के द्वारा सद्भाव से पूजित होने वाल परमेश्वरि! तुम रूप दो, जय दो, यश दो और काम-क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो ।। प्रचंड भुजदण्डों वाले दैत्यों का घमंड चूर करने वाली देवि! तुम रूप दो, जय दो, यश दो और काम-क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो ।।२१-२२।।

देवि भक्तजनोद्दामदत्तानन्दोदये अम्बिके।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि।। २३।।
पत्नीं मनोरमां देहिमनोवृत्तानुसारिणीम्।
तारिणीं दुर्ग संसारसागरस्य कुलोद्भवाम् ।। २४।।

देवि! अम्बिके तुम अपने भक्तजनों को सदा असीम आनंद प्रदान करती हो। मुझे रूप दो, जय दो, यश दो और काम-क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो ।। मन की इच्छा के अनुसार चलने वाली मनोहर पत्नी प्रदान करो, जो दुर्गम संसार से तारने वाली तथा उत्तम कुल में जन्मी हो।।२३-२४।।

इदं स्तोत्रं पठित्वा तु महास्तोत्रं पठेन्नरः।
स तु सप्तशती संख्या वरमाप्नोति सम्पदाम्। ॐ ।। २५।।

जो मनुष्य इस स्तोत्र का पाठ करके सप्तशती रूपी महास्तोत्र का पाठ करता है, वह सप्तशती की जप-संख्या से मिलने वाले श्रेष्ठ फल को प्राप्त होता है। साथ ही वह प्रचुर संपत्ति भी प्राप्त कर लेता है।।२६।।

।। इति देव्या अर्गला स्तोत्रं सम्पर्णम ।।
 
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Monday, May 14, 2018

Unknown differences between Hinduism and Islam


Hinduism
ऐसे अनेक तथ्य हैं  जिनसे  समाज में भ्रम फैलाया जा रहा है, जैसे कि हिन्दुओं में यह भ्रम है कि हिन्दुओं के ३३ करोड़ भगवान हैं लेकिन असलियत में हिन्दू धर्म में ३३ प्रकार के देवी - देवताओं के होने गयी है |

हिन्दू धर्म और इस्लाम में जमीन आसमान का अंतर है | कुछ अंतर यहाँ दिए गए हैं |

  • हिन्दू धर्म में देश और मातृभूमि को सर्वोच्च स्थान दिया जाता है, इस्लाम में धर्म से बड़ा कुछ नहीं |
  • हिन्दू अपने  भगवान् को किसी भी तरह से मान सकते हैं, अक्सर हिन्दू अपने धर्म का मजाक भी उड़ा देते हैं, इस्लाम में ऐसा करना खतरनाक है |
  • हिन्दू धर्म अन्य धर्मों का विरोध नहीं करता और दूसरे धर्मों को अपनाने की पूरी स्वतंत्रता देता है लेकिन दूसरे धर्मों का सम्मान गलत है और यह एक पाप है |
  • हिन्दू धर्म नास्तिक (ईश्वर को ना मानने वाला) बनने की स्वतंत्रता देता है, इस्लाम में नास्तिक होना पाप है |
  • हिन्दू धर्म एक परम "ईश्वर के अनेक रूप" को मानता है, इस्लाम "केवल और केवल एक ईश्वर" को मानता है |
कुरान (3:56)
जो मुझमें आस्था नहीं रखते, मैं उन्हें घोर यातना के साथ सजा दूंगा,
और उनकी मदद करने वाला कोई नहीं होगा ||

भगवदगीता (18 :63)
कृष्ण (अर्जुन से)- मैंने तुम्हे संसार का संपूर्ण ज्ञान दिया है, इस पर विचार करो,
फिर जैसा चाहते हो वैसा करो ||

  • इस्लाम १५०० साल पुराना है, जबकि हिन्दुओं का सबसे प्राचीन ज्ञात (known) ग्रन्थ ऋग्वेद १०००० साल से भी ज्यादा पुराना है |
इस्लाम-  औरत को कष्ट देने और सताने से तुम जन्नत में जाओगे |

हिंदुत्व- "यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः,"
(जहाँ नारी की पूजा होती है वहां देवता प्रसन्न होते हैं)

इस्लाम- मुस्लिम अपने धर्म में गलतियां नहीं निकल सकते और ना ही  बोल सकते हैं|

हिंदुत्व- अगर हिन्दू को अपने धर्म में कुछ गलत लगता है तो उसे सुधार करने की पूरी स्वतंत्रता है |

--> हिन्दुओं मुस्लिमों में एक समानता भी है, दोनों की २०६ हड्डियां होती है |

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AshtaLakshmi Stotram lyrics in hindi अर्थ सहित

the hindu prayer stotram
Asht Lakshmi
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श्री अष्टलक्ष्मी स्तोत्रम | हिंदी |
देवी शक्ति के आठ रूपों की पूजा का सकारात्मक परिणाम मिलता है | जो व्यक्ति सच्चे मन से अष्टलक्ष्मी स्तोत्र के द्वारा पूजा करता है उसे देवी की कृपा से सुख तथा समृद्धि की प्राप्ति होती है | अष्ट लक्ष्मी स्तोत्र का प्रतिदिन पाठ करने से देवी की असीम अनुकम्पा प्राप्त होती है |

मुख्यतः इस स्तोत्र का पाठ तथा साथ में श्री यंत्र पूजा व्यवसाय और धन की प्राप्ति के लिए किया जाता है | यदि संभव हो तो पूजा के दौरान सफ़ेद वस्त्र पहनने चाहिए |

अष्टलक्ष्मी स्तोत्र का पाठ करने से पहले पूजा के स्थान को अच्छी तरह पवित्र चाहिए | संभव हो तो गंगाजल का प्रयोग करें | अपने सामने लक्ष्मी जी की मूर्ति स्थापित करके श्री यन्त्र को भी स्थापित करना चाहिए | पाठ के अंत में देवी को खीर का भोग अर्पित करके अपने बाद में भोग को प्रसाद के रूप में परिवार में बाँट देना चाहिए |

ॐ- अथ श्री अष्टलक्ष्मी स्तोत्रम -ॐ

आदि लक्ष्मी-
सुमनस वन्दित सुन्दरि माधवि चंद्र सहोदरि हेममये |
मुनिगण वन्दित मोक्षप्रदायिनी मंजुल भाषिणि वेदनुते ||
पङ्कजवासिनि देवसुपूजित सद-गुण वर्षिणि शान्तिनुते |
जय जय हे मधुसूदन कामिनि आदिलक्ष्मि परिपालय माम् || १ ||

धान्य लक्ष्मि-
अयिकलि कल्मष नाशिनि कामिनि वैदिक रूपिणि वेदमये |
क्षीर समुद्भव मङ्गल रुपिणि मन्त्रनिवासिनि मन्त्रनुते ||
मङ्गलदायिनि अम्बुजवासिनि देवगणाश्रित पादयुते |
जय जय हे मधुसूदनकामिनि धान्यलक्ष्मि परिपालय माम् || २ ||

धैर्य लक्ष्मि- 
जयवरवर्षिणि वैष्णवि भार्गवि मन्त्र स्वरुपिणि मन्त्रमये |
सुरगण पूजित शीघ्र फलप्रद ज्ञान विकासिनि शास्त्रनुते ||
भवभयहारिणि पापविमोचनि साधु जनाश्रित पादयुते |
जय जय हे मधुसूदन कामिनि धैर्यलक्ष्मि सदापालय माम् || ३ ||

गजलक्ष्मि-
जय जय दुर्गति नाशिनि कामिनि वैदिक रूपिणि वेदमये |
रधगज तुरगपदाति समावृत परिजन मंडित लोकनुते ||
हरिहर ब्रम्ह सुपूजित सेवित ताप निवारिणि पादयुते |
जय जय हे मधुसूदन कामिनि गजलक्ष्मि रूपेण पालय माम् || ४ ||

सन्तानलक्ष्मि-
अयि खगवाहिनी मोहिनि चक्रिणि रागविवर्धिनि ज्ञानमये |
गुणगणवारिधि लोकहितैषिणि सप्तस्वर भूषित गाननुते ||
सकल सुरासुर देव मुनीश्वर मानव वन्दित पादयुते |
जय जय हे मधुसूदन कामिनि सन्तानलक्ष्मि परिपालय माम् || ५ ||

विजयलक्ष्मि-
जय कमलासनि सद-गति दायिनि ज्ञानविकासिनि गानमये |
अनुदिन मर्चित कुङ्कुम धूसर भूषित वसित वाद्यनुते ||
कनकधरास्तुति वैभव वन्दित शङ्करदेशिक मान्यपदे |
जय जय हे मधुसूदन कामिनि विजयक्ष्मि परिपालय माम् || ६ ||

विद्यालक्ष्मि-
प्रणत सुरेश्वरि भारति भार्गवि शोकविनाशिनि रत्नमये |
मणिमय भूषित कर्णविभूषण शान्ति समावृत हास्यमुखे ||
नवनिद्धिदायिनी कलिमलहारिणि कामित फलप्रद हस्तयुते |
जय जय हे मधुसूदन कामिनि विद्यालक्ष्मि सदा पालय माम् || ७ ||

धनलक्ष्मि-
धिमिधिमि धिन्धिमि धिन्धिमि-दिन्धिमी दुन्धुभि नाद सुपूर्णमये |
घुमघुम घुङ्घुम घुङ्घुम घुङ्घुम शङ्ख निनाद सुवाद्यनुते ||
वेद पुराणेतिहास सुपूजित वैदिक मार्ग प्रदर्शयुते |
जय जय हे कामिनि धनलक्ष्मी रूपेण पालय माम् || ८ ||

फ़लशृति-

श्लोक- अष्टलक्ष्मी नमस्तुभ्यं वरदे कामरूपिणि |
विष्णुवक्षःस्थलारूढे भक्तमोक्षप्रदायिनी ||

श्लोक- शङ्ख चक्र गदाहस्ते विश्वरूपिणिते जयः |
जगन्मात्रे च मोहिन्यै मङ्गलम शुभ मङ्गलम ||

 -इति श्री अष्टलक्ष्मी स्तोत्रम सम्पूर्णम- 
 
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Shri Ashtalakshmi Stotra in English

Adilaksmi
sumanasa vandita sundari madhavi, candra sahodari hemamaye
munigana vandita moksapradayani, manjula bhasini vedanute|
pankajavasini deva supujita, sadguna varsini sanityute
jaya jayahe madhusudana kamini, adilaksmi paripalaya mam||1||

Dhanyalaksmi
ayikali kalmasa nasini kamini, vaidika rupini vedamaye
ksira samubhava mangala rupini, mantranivasini mantranute|
mangaladayini ambujavasini, devaganasrita padayute
jaya jayahe madhusudana kamini, dhanyalaksmi paripalaya mam||2||

Dhairyalaksmi
jayavarvarsini vaisnavi bhargavi, mantra svarupini mantramaye
suragana pujita sighra phalaprada, nnana vikasini sastranute|
bhavabhayaharini papavimocani, sadhu janasrita padayute
jaya jayahe madhusudhana kamini, dhairlaksmi paripalaya mam||3||
Gajalaksmi

jaya jaya durgati nasini kamini, sarvaphalaprada sastramaye
radhagaja turagapadati samavrta, parijana mandita lokanute|
harihara brahma supujita sevita, tapa nivarini padayute
jaya jayahe madhusudhana kamini, gajalaksmi rupena palaya mam||4||

Santanalaksmi
ayikhaga vahini mohini chakrini, ragavivardhini  gyaanamaye
gunaganavaradhi lokahitasini, saptasvara bhusita gananute|
sakala surasura deva munisvara, manava vandita padayute
jaya jayahe madhusudana kamini, santanlaksmi paripalaya mam||5||

Vijyalaksmi
jaya kamlasini sadgati dayini, nnanavikasini ganamaye
anudina marcita kun kuma dhusara, bhusita ganayute|
kanakadharastuti vaibhava vandita, sankaradesika manayapade
jaya jayahe madhusudana kamini, vijyalaksmi paripalaya mam||6||

Vidyalaksmi
paranata suresvari bharati bhargavi, sokvinasini ratnamye
manimaya bhusita karnavibhusana, santi samavrta hasyamukhe|
navanidhi dayini kalimalaharni, kamita phalaprada hastayute
jaya jayahe madhusudana kamini, vidyalaksmi sada palaya mam||7||

Dhanalaksmi
dhimidhimi dhindhimi dhindhimi-dindhimi, dundhubhi nada supurnamaye
ghumaghuma ghunghuma ghunghuma ghunghuma,sankha ninadasuvadyanute|
veda puranetihasa supujita, vaidika marga pradarsyute
jaya jayahe madhusudana kamini, dhanlaksmi rupena palaya mam||8||
Phalashruti-
Shlok- astalaksmi namastubhyam varade kamarupini |
visnuvaksah sthala rudhe bhakta moksa pradayini ||

Shlok-sankha cakragadahaste visvarupinite jayah |
jaganmatre ca mohinyai mangalam subha manglam || ॐ ||

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Tuesday, May 8, 2018

शिवलिंग पर दूध क्यों अर्पित करते हैं?

भारत में कुछ ऐसे लोग हैं जो शिवलिंग पर दूध अर्पित करना गलत मानते हैं और कहते हैं कि वह दूध गरीबो को देदो लेकिन इस बात के दुसरे भी पहलू भी हैं .
  • आईये देखते हैं इन्ही लोगो की कुछ हरकतें 
वे कहते हैं की शिवलिंग पर दूध डालना पैसों की बर्बादी है तो ये क्या है-

दूध की कीमत - 40 Rs प्रति लीटर
शैमपेन - 1000 Rs प्रति लीटर

समारोहों में पैसो की बर्बादी -

shiv ling the hindu prayer

तो क्या दीपिका पादुकोण को शराब अर्पित करना सही है -

पार्टीज में पैसो की बर्बादी-

टोमेटो फेस्टिवल में टमाटर की बर्बादी -

बर्थडे का केक गरीबो की भूख नहीं मिटा सकता क्या जो ऐसे बर्बाद कर रहे हो- 

लेकिन उन्हें केवल हिन्दुओं में ही दुनिया भर की गलत बातें नजर आती हैं | लोगो को यही बताने के लिए हमारी इस पोस्ट को आगे बढ़ाएं और शेयर करें ताकि औरों को भी ये बातें मालूम हो |
  • इन बातों की किसी को चिंता नहीं लेकिन शिवलिंग पर दूध डालना उनके लिए गलत है


  • सनातन धर्म के अनुसार भगवान् शिव को संसार का पिता माना जाता है तो आने पिता को दूध अर्पित करने में क्या गलत है ?
  • शिव जी पर अर्पित किया गया दूध प्रसाद माना जाता है और भारत के अनेक मंदिरों में इस दूध को  प्रसाद के रूप में बांटने की परंपरा है |
  • लम्बे समय तक हम अपने परम्पराओं को जाने बिना कोसते रहे जबकि उनके महत्व को हम खुद ही नहीं पहचानते और यह सब पश्चिमी ताकतों के दुष्प्रचार की वजह से है

उनके पास सवाल तो हैं लेकिन जबाब नहीं


मैं बता दूँ कि हमारे पास जवाब हैं इन सवालों के-
  • दिवाली के पटाखे 
  • होली पर पानी प्रयोग करना 
  • करवा चौथ पर व्रत करना 
  • देवों को भोग लगाना 
लेकिन इन का क्या-
  • क्रिसमस पर हजारों पेड़ काटना 
  • ईद पर हजारो बकरों की हत्या 
  • नमाज़ में लाउडस्पीकर प्रयोग करना 
  • NEW YEAR और क्रिसमस पर पटाखों से POLLUTION. 

अंतिम शब्द --
-: जय भोलेनाथ :-

Wednesday, May 2, 2018

Devi Kavacham Lyrics In Hindi देवी कवचम अर्थ सहित

Shri Durga kavach in hindi

Shri Durga devi Kavach (devya kavacham)-

दुर्गा कवच ( Devi Kavach ) का पाठ दुर्गा सप्तशती के पाठ करने से पहले किया जाता है। इस कवच का पाठ करने से देवी भगवती अपने भक्तों पर प्रसन्न होकर उन्हें रक्षा प्रदान करतीं हैं।
इस कवच के पाठ करने के बाद अर्गला स्तोत्र का पाठ और उसके बाद कीलक स्तोत्र का पाठ करना चाहिए। इन तीनों स्तोत्र का पाठ करना अत्यंत शुभ माना जाता है।
।। विनियोगः।।
।। ॐ अस्य श्रीचण्डीकवचस्य ब्रम्हा ऋषि:, अनुष्टुप् छन्द:, चामुण्डा देवता, अङ्गन्यासोक्तमातरो बीजम, दिग्बंधदेवतास्तत्वम, श्रीजगदम्बाप्रीत्यर्थे सप्तशतीपाठाङ्गत्वेन विनियोगः ।।

।। मार्कण्डेय उवाच ।।
ॐ यद्गुह्यं परमं लोके सर्वरक्षाकरं नृणांम|
यन्न कस्यचिदाख्यातं तन्मे ब्रूहि पितामह || १ ||
।। ब्रम्होवाच ।।
अस्ति गुह्यतमं विप्र सर्वभूतोपकारकम |
देव्यास्तु कवचं पुण्यं तच्छृणुष्व महामुने || २ ||

प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रम्ह्चारणी |
तृतीयं चन्द्रघण्टेति कूष्मांडेति चतुर्थकम || 3 ||

पंचमं स्कन्दमातेति षष्ठं कात्यायनीति च |
सप्तमम् कालरात्रीति महागौरीति चाष्टमम् || 4 ||

नवमम् सिद्धिदात्री च नवदुर्गाः प्रकीर्तिताः |
उक्तान्येतानि नामानि ब्रम्हणैव महात्मना || 5 ||

अग्निना दह्यमानस्तु शत्रुमध्ये गतो रणे |
विषमे दुर्गमे चैव भयार्ताः शरणं गताः || 6 ||

न तेषां जायते किँचिदशुभं रणसंकटे |
नापदं तस्य पश्यामि शोकदुःखभयं न हि || 7||

यैस्तु भक्त्या स्मृता नूनं तेषां वृद्धिः प्रजायते |
ये त्वां स्मरन्ति देवेशि रक्षसे तान्न संशयः || 8 ||

प्रेतसंस्था तु चामुण्डा वाराही महिषासना |
ऐन्द्री गजसमारुढा वैष्णवी गरुणासना || 9 ||

माहेश्वरी वृषारूढा कौमारी शिखिवाहना |
लक्ष्मीः पद्मासना देवी पद्महस्ता हरिप्रिया || 10 ||

श्वेतरूपधरा देवी ईश्वरी वृषवाहना |
ब्राम्ही हंससमारूढा सर्वाभरणभूषिता || 11 ||

इत्येता मातरः सर्वाः सर्वयोगसमन्विताः |
नानाभरण शोभाया नानारत्नोपशोभिताः || 12 ||

दृश्यन्ते रथमारुढा देव्यः क्रोधसमाकुलाः |
शङ्खं चक्रं गदां शक्तिं हलं च मुसलायुधम् || 13 ||

खेटकं तोमरं चैव परशुं पाशमेव च |
कुन्तायुधं त्रिशूलं च शार्ङ्गमायुधमुत्तमम् || 14 ||

दैत्यानां देहनाशाय भक्तानामभयाय च |
धारयन्त्यायुधानीत्यं देवानां च हिताय वै || 15 ||

नमस्तेऽस्तु महारौद्रे महाघोरपराक्रमे |
महाबले महोत्साहे महाभयविनाशिनि || 16 ||

त्राहि मां देवि दुष्प्रेक्ष्ये शत्रूणां भयवर्धिनि |
प्राच्यां रक्षतु मामैन्द्री आग्नेय्यामग्निदेवता || 17 ||

दक्षिणेऽवतु वाराही नैऋत्यां खड्गधारिणी |
प्रतीच्यां वारुणी रक्षेद् वायव्यां मृगवाहिनी || १८ ||

उदीच्यां पातु कौमारी ऐशान्यां शूलधारिणी |
उर्ध्वम ब्रम्हाणि  मे रक्षेदधस्ताद वैष्णवी तथा || 19 ||

एवं दश दिशो रक्षेच्चामुण्डा शववाहना |
जया मे चाग्रतः पातु विजया पातु पृष्ठतः || 20 ||

अजिता वामपार्श्वे  तु दक्षिणे चापराजिता |
शिखामुद्योतिनी रक्षेदुमा मूर्ध्नि व्यवस्थिता || 21 ||

मालाधरी ललाटे च भ्रुवौ रक्षेद् यशस्विनी |
त्रिनेत्रा च भ्रुवोर्मध्ये यमघण्टा च नासिके || 22 ||

शंखिनी चक्षुषोर्मध्ये श्रोत्रयोर्द्वारवासिनी |
कपोलौ कालिका रक्षेत्कर्णमूले तु शांकरी || 23 ||

नासिकायां सुगन्धा च उत्तरोष्ठे च चर्चिका |
अधरे चामृतकला जिह्वायां च सरस्वती || 24 ||

दन्तान् रक्षतु कौमारी कण्ठमध्ये तु चण्डिका |
घण्टिकां चित्रघण्टा च महामाया च तालुके|| 25 ||

कामाक्षी चिबुकं रक्षेद् वाचं मे सर्वमंगला ।
ग्रीवायां भद्रकाली च पृष्ठवंशे धनुर्धरी ।। 26 ।।

नीलग्रीवा बहिःकण्ठे नलिकां नलकूबरी ।।
स्कन्धयोः खड्गिनी रक्षेद् बाहू मे वज्रधारिणी ।। 27 ।।

हस्तयोर्दण्डिनी रक्षेदम्बिका चांगुलीषु च ।।
नखाञ्छूलेश्वरी रक्षेत्कुक्षौ रक्षेत्कुलेश्वरी ।। 28 ।।

स्तनौ रक्षेन्महादेवी मनः शोकविनाशिनी ।
हृदये ललिता देवी उदरे शूलधारिणी ।। 29 ।।

नाभौ च कामिनी रक्षेद् गुह्यं गुह्येश्र्वरी तथा ।
पूतना कामिका मेढ्रं गुदे महिषवाहिनी ।।30 ।।

कट्यां भगवती रक्षेज्जानुनी विन्ध्यवासिनी ।
जंघे महाबला रक्षेद् सर्वकामप्रदायिनी ।।31।।

गुल्फयोर्नारसिंही च पादपृष्ठे तु तैजस ।
पादांगुलीषु श्री रक्षेत्पादास्तलवासिनी ।। 32।।

नखान् दंष्ट्राकराली च केशांश्चैवोर्ध्वकेशिनी।
रोमकूपेषु कौबेरी त्वचं वागीश्र्वरी तथा ।। 33।।

रक्तमज्जावसामांसान्यस्थिमेदांसि पार्वती ।
अन्त्राणि कालरात्रिश्च पित्तं च मुकुटेक्ष्वरी ।। 34।।

पद्मावती पद्मकोशे कफे चूडामणिस्तथा ।।
ज्वालामुखी नखज्वालामभेद्या सर्वसंधिषु ।। 35 ।।

शुक्रं ब्रह्माणि मे रक्षेच्छायां छत्रेश्र्वरी तथा ।
अहंकार मनो बुद्धिं रक्षन्मे धर्मधारिणि ।। 36 ।।

प्राणापानौ तथा व्यानमुदानं च समानकम् ।
वज्रहस्ता च मे रक्षेत्प्राणं कल्याणशोभना ।। 37 ।।

रसे रूपे च गन्धे च शब्दे स्पर्शे च योगिनी ।
यशः कीर्ति च लक्ष्मीं च सदा रक्षतु वैष्णवी ।।38।।

आयू रक्षतु वाराही धर्मं रक्षतु वैष्णवी ।
यशः कीर्तिं च लक्ष्मीं च धनं विद्यां च चक्रिणी ।। 39 ।।

गोत्रमिन्द्राणि मे रक्षेत्पशून्मे रक्ष चण्डिके ।
पुत्रान् रक्षेन्महालक्ष्मीर्भार्यां रक्षतु भैरवी ।। 40 ।।

पन्थानं सुपथा रक्षेन्मार्गं क्षेमकरी तथा।।
राजद्वारे महालक्ष्मीर्विजया सर्वतः स्थिता ।। 41।

रक्षाहीनं तु यत्स्थानं वर्जितं कवचेन तु ।
तत्सर्वं रक्ष मे देवि जयन्ती पापनाशिनी ।। 42 ।।

पदमेकं न गच्छेत्तु यदीच्छेच्छुभमात्मनः ।।
कवचेनावृतो नित्यं यत्र यत्रैव गच्छति।। 43 ।।

तत्र तत्रार्थलाभश्र्च विजयः सार्वकामिकः ।
यं यं चिन्तयते कामं तं तं प्राप्नोति निश्र्चितम् ।
परमैश्वर्यमतुलं प्राप्स्यते भूतले पुमान् ।। 44 ।।

निर्भयो जायते मर्त्यः संग्रामेष्वपराजितः ।
त्रैलोक्ये तु भवेत्पूज्यः कवचेनावृतः पुमान् ।। 45 ।।

इदं तु देव्याः कवचं देवानामपि दुर्लभम् ।
यः पठेत्प्रयतो नित्यं त्रिसन्ध्यं श्रद्धयान्वितः ।। 46 ।।

दैवी कला भवेत्तस्य त्रैलोक्येष्वपराजितः ।
जीवेद् वर्षशतं साग्रमपमृत्युविवर्जितः ।। 47 ।।

नश्यन्ति व्याधयः सर्वे लूताविस्फोटकादयः ।
स्थावरं जङ्गमं चैव कृत्रिमं चापि यद्विषम् ।। 48 ।।

अभिचाराणि सर्वाणि मन्त्रयन्त्राणि भूतले ।
भूचराः खेचराश्चैव जलजाश्चोपदेशिकाः ।। 49 ।।

सहजा कुलज माला डाकिनी शाकिनी तथा ।
अन्तरिक्षचरा घोरा डाकिन्यश्र्च महाबलाः ।। 50 ।।

ग्रहभूतपिशाचाश्च यक्षगन्धर्वराक्षसाः ।
ब्रह्मराक्षसवेतालाः कूष्माण्डा भैरवादयः ।। 51 ।।

नश्यन्ति दर्शनात्तस्य कवचे हृदि संस्थिते ।
मानोन्नतिर्भवेद् राज्ञस्तेजोवृद्धिकरं परम् ।।52 ।।

यशसा वर्धते सोऽपि कीर्तिमण्डितभूतले
जपेत्सप्तशतीं चण्डीं कृत्वा तु कवचं पुरा ।। 53 ।।

यावद्-भूमण्डलं धत्ते सशैलवनकाननम् ।
तावत्तिष्टति मेदिन्यां सन्ततिः पुत्रपौत्रिकी ।। 54 ।।

देहान्ते परमं स्थानं यत्सुरैरपि दुर्लभम् ।
प्राप्नोति पुरुषो नित्यं महामायाप्रसादतः ।। 55 ।।

लभते परमं रुपं शिवेन सह मोदते ।। ॐ ।। 56 ।।

।। इति श्रीवाराहपुराणे हरिहरब्रह्मविरचितं दे व्याः कवचम् संपूर्णम् ।।

 
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Devya Kavacham Hindi Meaning-

ॐ श्री चण्डिका देवी को नमस्कार है।

मार्कण्डेय जी ने कहा- पितामह! जो इस संसार में परम गोपनीय तथा सभी मनुष्यों की सब प्रकार से रक्षा करने वाला है और जो अब तक आपने दूसरे किसी के सामने प्रकट न किया हो, ऐसा कोई साधन मुझे बताइये. 1

ब्रह्मा जी बोले- ब्रह्मन्! ऐसा साधन तो एक देवी का कवच ही है, जो गोपनीय से भी परम गोपनीय, पवित्र तथा सम्पूर्ण प्राणियों का उद्धार करने वाला है. महामुने! उसे श्रवण करो.2

देवी की नौ मूर्तियाँ हैं, जिन्हें नवदुर्गा कहते हैं. उनके पृथक-पृथक (अलग-अलग) नाम बतलाये जाते हैं. प्रथम नाम शैलपुत्री है. दूसरी मूर्ति का नाम ब्रह्मचारिणी है. तीसरा स्वरुप चंद्रघंटा के नाम से प्रसिद्ध है. चौथी मूर्ति को कूष्मांडा कहते हैं. 3

पांचवी दुर्गा का नाम स्कंदमाता है. देवी के छठे रूप को कात्यायनी कहते हैं. सातवाँ कालरात्रि और आठवाँ स्वरुप महागौरी के नाम से प्रसिद्ध है.4

नवीं दुर्गा का नाम सिद्धिदात्री है. ये सब नाम सर्वज्ञ महात्मा वेद भगवान् के द्वारा ही प्रतिपादित हुए हैं.5

जो मनुष्य अग्नि में जल रहा हो, रणभूमि में शत्रु से घिर गया हो, विषम संकट में फँस गया हो तथा इस प्रकार भय से आतुर होकर जो भगवती की शरण में प्राप्त हुए हों- .6

-उनका कभी अमंगल नहीं होता. युद्ध के समय में संकट में पड़ने पर भी उनके ऊपर कोई विपत्ति नहीं दिखाई देती. उन्हें शोक दुःख और भय की प्राप्ति नहीं होती.7

जिन्होंने भक्ति पूर्वक देवी का स्मरण किया है, उनका निश्चय ही अभ्युदय होता है. देवेश्वरि! जो तुम्हारा चिंतन करते हैं, उनकी तुम निस्संदेह तुम रक्षा करती हो.8

चामुण्डा देवी प्रेत पर आरूढ़ होती हैं, वाराही भैंसे पर सवारी करती हैं, ऐन्द्री का वाहन ऐरावत हाथी है, वैष्णोदेवी गरुड़ पर ही आसन जमाती हैं.9

माहेश्वरी वृषभ पर आरूढ़ होती हैं, कौमारी का वाहन मयूर है. भगवान् विष्णु की प्रियतमा लक्ष्मी देवी कमल के आसन पर विराजमान हैं और हाथों में कमल धारण किये हुए हैं.10

वृषभ पर आरूढ़ ईश्वरी देवी ने श्वेत रूप धारण कर रखा है, ब्राह्मी देवी हंस पर बैठी हुई हैं और सब प्रकार के आभूषणों से विभूषित हैं.11

इस प्रकार ये सभी मातायें सब प्रकार की योग शक्तियों से सम्पन्न हैं. इनके सिवा और भी बहुत सी देवियाँ हैं, जो अनेक प्रकार के आभूषणों की शोभा से युक्त तथा नाना प्रकार के रत्नों से सुशोभित हैं.12

ये सम्पूर्ण देवियाँ क्रोध में भरी हुई हैं और भक्तों की रक्षा के लिए रथ पर बैठी हुई दिखाई देती हैं. ये शंख, चक्र, गदा, शक्ति, हल और मुसल, खेटक और तोमर, परशु, पाश, कुंत और त्रिशूल एवं उत्तम शारंग धनुष आदि अस्त्र-शस्त्र अपने हाथों में धारण करती हैं.13-14

दैत्यों के शरीर का नाश करना, भक्तों को अभयदान देना और देवताओं का कल्याण करना- यही उनके शास्त्र धारण का उद्देश्य है.15

महान रौद्ररूप, अत्यंत घोर पराक्रम, महान बल और महान उत्साह वाली देवी! तुम महान भय का नाश करने वाली हो तुम्हें नमस्कार है.16

तुम्हारी ओर देखना भी कठिन है. शत्रुओं का भय बढ़ाने वाली जगदम्बिके! मेरी रक्षा करो. पूर्व दिशा में ऐन्द्री (इन्द्रशक्ति) मेरी रक्षा करें. अग्निकोण में अग्निशक्ति मेरी रक्षा करें.17

दक्षिण दिशा में वाराही तथा नैर्ऋत्य कोण में खड्गधारिणी मेरी रक्षा करें. पश्चिम दिशा में वारुणी और वायव्य कोण में मृग पर सवारी करने वाली देवी मेरी रक्षा करें. १८

उत्तर दिशा में कौमारी और ईशान कोण में शूलधारिणी रक्षा करें. ब्रह्माणि! तुम ऊपर की ओर से मेरी रक्षा करो और वैष्णवी देवी नीचे की ओर से मेरी रक्षा करें.19

इसी प्रकार शव को अपना वाहन बनाने वाली चामुंडा देवी दासों दिशाओं से मेरी रक्षा करें, जया आगे से और विजया पीछे की और से मेरी रक्षा करें.20

वाम भाग में अजित और दक्षिण भाग में अपराजिता रक्षा करें. उद्योतिनी शिखा की रक्षा करें. उमा मेरे मस्तक पर विराजमान होकर रक्षा करें.21

ललाट में मालाधारी रक्षा करें और यशस्विनी मेरि भौहों का संरक्षण करें. भौहों के मध्य भाग में त्रिनेत्रा और नथुनों की यमघंटा देवी रक्षा करें.22

दोनों नेत्रों के मध्य भाग में शंखिनी और कानों में द्वारवासिनी रक्षा करें. कालिका देवी कपोलों की तथा भगवती शांकरी कानों के मूल की रक्षा करें.23

नासिका में सुगंधा और ऊपर के ओठ में चर्चिका देवी रक्षा करें. नीचे के ओठ में अमृतकला तथा जिह्वा में सरस्वती देवी रक्षा करें.24

कौमारी दाँतों की और चंडिका कंठप्रदेश की रक्षा करें. चित्रघंटा गले की घांटी की और महामाया तालु में रहकर रक्षा करें.२५

कामाक्षी ठोढ़ी की और सर्वमंगला मेरी वाणी की रक्षा करें. भद्रकाली ग्रीवा में और धनुर्धरी पृष्ठवंश (मेरुदंड) में रहकर रक्षा करें.२६

कंठ के बाहरी भाग में नीलग्रीवा और कंठ की नली में नलकूबरी रक्षा करें. दोनों कधों में खड्गिनी और मेरी दोनों भुजाओं की वज्रधारिणी रक्षा करें.27

दोनों हाथों में दंडिनी और अँगुलियों में अम्बिका रक्षा करें. शूलेश्वरी नखों की रक्षा करें. कुलेश्वरी कुक्षि (पेट) में रहकर रक्षा करें.28

महादेवी दोनों स्तनों की और शोकविनासिनी देवी मन की रक्षा करें. ललिता देवी ह्रदय में और शूलधारिणी उदार में रहकर रक्षा करें.29

नाभि में कामिनी और गुह्यभाग की गुह्येश्वरी रक्षा करें. पूतना और कामिका लिंग की और महिषवाहिनी गुदा की रक्षा करें.30

भगवती कटिभाग में और विंध्यवासिनी घुटनों की रक्षा करें, सम्पूर्ण कामनाओं को देने वाली महाबला देवी दोनों पिंडलियों की रक्षा करें. 31

नारसिंही दोनों घुट्टियों की और तैजसी देवी दोनों चरणों के पृष्ठ भाग की रक्षा करें. श्रीदेवी पैरों की अँगुलियों में और तलवासिनी पैरों के तलुओं में रहकर रक्षा करें. 32

अपनी दाढ़ों के कारण भयंकर दिखने वाली दंष्ट्राकराली देवी नखों की और ऊर्ध्वकेशिनी देवी केशों की रक्षा करें. रोमावलियों के छिद्रों में कौबेरी और त्वचा की वागीश्वरी देवी रक्षा करें.३३

पार्वती देवी रक्त, मज्जा, वसा, मांस, हड्डी और मेद की रक्षा करें. आतों की कालरात्रि और पित्त की मुकुटेश्वरी रक्षा करें.३४

मूलाधार आदि कमल-कोशों में पद्मावती देवी और कफ में चूणामणि देवी स्थित होकर रक्षा करें. नख के तेज की ज्वालामुखी रक्षा करें. जिसका किसी भी अस्त्र से भेदन नहीं हो सकता, वह अभेद्य देवी शरीर की समस्त संधियों में रहकर रक्षा करें. ३५

ब्रह्माणि! आप मेरे वीर्य की रक्षा करें. छत्रेश्वरी छाया की तथा धर्मधारिणी देवी मेरे अहंकार, मन और बुद्धि की रक्षा करें.३६

हाथ में वज्र धारण करने वाली वज्रहस्ता देवी मेरे प्राण, अपान, व्यान, उदान और समान वायु की रक्षा करें. कल्याण से शोभित होने वाली भगवती कल्याणशोभना मेरे प्राण की रक्षा करें.३७

रस, रूप, गंध, शब्द और स्पर्श- इन विषयों का अनुभव करते समय योगिनी देवी रक्षा करें तथा सत्त्वगुण, रजोगुण और तमोगुण की रक्षा सदा नारायणी देवी करें.३८

वाराही आयु की रक्षा करें. वैष्णवी धर्म की रक्षा करें तथा चक्रिणी देवी यश, कीर्ति, लक्ष्मी, धन तथा विद्या की रक्षा करें.३९

इंद्राणी! आप मेरे गोत्र की रक्षा करें, चण्डिके! तुम मेरे पशुओं की रक्षा करो. महालक्ष्मी पुत्रों की रक्षा करे और भैरवी पत्नी की रक्षा करे.40

मेरे पथ की सुपथा तथा मार्ग की क्षेमकरी रक्षा करे. राजा के दरबार में महालक्ष्मी रक्षा करे तथा सब ओर व्याप्त रहने वाली विजय देवी सम्पूर्ण भयों से रक्षा करें.४१

देवि! जो स्थान कवच में नहीं कहा गया है, अतएव रक्षा से रहित है, वह सब तुम्हारे द्वारा सुरक्षित हो; क्योंकि तुम विजयशालिनी और पापनाशिनी हो.४२

यदि अपने शरीर का भला चाहे तो मनुष्य बिना कवच के कहीं एक पग भी ना जाय- कवच का पाठ करके ही यात्रा करे. कवच के द्वारा सब ओर से सुरक्षित मनुष्य जहाँ-जहाँ भी जाता है, 43

वहां-वहां उसे धन लाभ होता है तथा सम्पूर्ण कामनाओं की सिद्धि करने वाली विजय की प्राप्ति होती है. वह जिस-जिस अभीष्ट वास्तु का चिंतन करता है, उस-उस को निश्चय ही प्राप्त कर लेता है. वह पुरुष इस पृथ्वी पर तुलनारहित महान ऐश्वर्य का भागी होता है.४४

कवच से सुरक्षित मनुष्य निर्भय हो जाता है. युद्ध में उसकी पराजय नहीं होती तथा वह तीनों लोकों में पूजनीय होता है. ४५

देवी का यह कवच देवताओं के लिए भी दुर्लभ है. जो प्रतिदिन नियमपूर्वक तीनों संध्याओं के समय श्रद्धा के साथ इसका पाठ करता है,46

उसे दैवी कला प्राप्त होती है तथा वह तीनों लोकों में कहीं भी पराजित नहीं होता. इतना ही नहीं, वह अमृत्यु से रहित हो सौ से भी अधिक वर्षों तक जीवित रहता है.४७

मकरी, चेचक और कोढ़ आदि उसकी सम्पूर्ण व्याधियां नष्ट हो जाती हैं. कनेर, भांग, अफीम, धतूरे आदि का स्थावर विष, सांप और बिच्छू आदि के काटने से चढ़ा हुआ जंगम विष तथा अहिफेन और तेल के संयोग आदि से बनने वाला कृत्रिम विष- ये सभी प्रकार के विष दूर हो जाते हैं, उनका कोई भी असर नहीं होता.48

इस पृथ्वी पर मारण, मोहन, आदि जितने आभिचारिक प्रयोग होते हैं तथा इस प्रकार के जितने मंत्र-यंत्र होते हैं, वे सब इस कवच को हृदय में धारण कर लेने पर उस मनुष्य को देखते ही नष्ट हो जाते हैं. ये ही नहीं, पृथ्वी पर विचारने वाले ग्राम देवता, आकाशचारी देवविशेष, जल के सम्बन्ध से प्रकट होने वाले गण, उपदेश मात्र से सिद्ध होने वाले निम्नकोटि के देवता,४९

अपने जन्म के साथ प्रकट होने वाले देवता, कुलदेवता, माला (कंठमाला आदि), डाकिनी, शाकिनी, अंतरिक्ष में विचारने वाली भयानक डाकिनियाँ, 50

ग्रह, भूत, पिशाच, यक्ष, गन्धर्व, राक्षस, ब्रह्मराक्षस, बेताल, कूष्माण्ड और भैरव आदि अनिष्टकारक देवता भी, ५१

ह्रदय में कवच धारण किये रहने पर उस मनुष्य को देखते ही भाग जाते हैं. कवचधारी पुरुष को राजा से सम्मान-वृद्धि प्राप्त होती है. यह कवच मनुष्य के तेज की वृद्धि करने वाला और उत्तम है.५२

कवच का पाठ करने वाला पुरुष अपनी कीर्ति से विभूषित भूतल पर अपने सुयश के साथ-साथ वृद्धि को प्राप्त होता है. जो पहले कवच का पाठ करके उसके बाद सप्तशती चण्डी का पाठ करता है,५३

उसकी जब तक वन, पर्वत और काननों (जंगलों) सहित यह पृथ्वी टिकी रहती है, तब तक यहाँ पुत्र-पौत्र आदि संतान परंपरा बनी रहती है.54

फिर देह का अंत होने पर वह पुरुष भगवती महामाया के प्रसाद से उस नित्य परमपद को प्राप्त होता है जो देवताओं के लिए भी दुर्लभ है. ५५

वह सुन्दर दिव्य रूप धारण करता और कल्याणमय शिव के आनंद का भागी होता है.५६

।इस प्रकार श्री देवी कवच पूरा हुआ।
 
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