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Monday, August 10, 2020

Ganesha Pancharatnam lyrics in English and Sanskrit with Meaning

Shri Ganesha

Shri Ganesha Pancharatnam Lyrics:

Mudakaraata modakam, Sadaa Vimukti Saadhakam,
Kalaa-dharaa-vatamsakam, Vilaasi Loka Rakshakam.
Anaayakaika-naayakam, Vinaashitebhadaityakam,
Nataashubhaashu naashakam namaami tam vinaayakam. 1

मुदकरात्त मोदकं सदा विमुक्ति साधकम्
कला धरावतंसकं विलासि-लोकरक्षकम्
अनायकैक-नायकं विनाशितेभदैत्यकं
नताशुभाशुनाशकम् नमामि तं विनायकम्।1।

Natetaraati-bheekaram Navodita-ark Bhaasvaram,
Namatsuraari nirjaram nataadhika-ap Dud-dharam.
Sureshwaram Nidheeshwaram Gajeshwaram Ganeshwaram,
Maheshwaram Tamaashraye Paraatparam Nirantaram. 2

नतेतरातिभीकरं नवोदितार्क-भास्वरम्
नमत्सुरारि निर्जरम् नताधिकापदुद्धरम्
सुरेश्वरम् निधीश्वरं गजेश्वरं गणेश्वरं
महेश्वरम् तमाश्रये परात्परं निरन्तरम्।2।

Samasta-loka Shankaram Nirasta-Daitya Kunjaram,
Dare-taro-daram varam, Vare-bhavatra-maksharam.
Kripakaram Kshamakaram Mudakaram Yashaskaram,
Manaskaram Namaskritaam Namas- karomi Bhaaswaram. 3

समस्तलोकशङ्करम् निरस्तदैत्यकुञ्जरम्
दरेतरोदरम् वरं वरेभवक्त्रमक्षरम्
कृपाकरं क्षमाकरं मुदाकरम् यशस्करम्
मनस्करं नमस्कृताम् नमस्करोमि भास्वरम्।3।

Akimchana-arti Maarjanam Chirantano-okti Bhaajanam,
Puraari Purva-nandanam, Suraarigarva-charvanam.
Prapancha-naasha Bheeshanam Dhananjayaadi-Bhushanam,
Kapola-daana vaaranam, bhaje purana-vaaranam. 4

अकिञ्चनार्ति मार्जनं चिरन्तनोक्ति भाजनं
पुरारिपूर्वनन्दनम् सुरारिगर्व चर्वणम्
प्रपञ्चनाश-भीषणम् धनञ्जयादि भूषणम्
कपोलदानवारणं भजेपुराणवारणम्।4।

Nitaanta-Kaanta-Danta-Kaanti-Manta-Kaanta-Kaatamajam,
Achintya Roopa-manta-heena-mantaraay krintanam.
Hridayantare Nirantaram Vasantamev Yoginaam,
Tameka-dantameva Tam, Vichintayaami Santatam. 5

नितान्तकान्त-दन्तकान्तिमन्तकान्तकात्मजं
अचिन्त्यरूपमन्तहीनमन्तराय-कृन्तनम्
हृदन्तरे निरन्तरम् वसन्तमेव योगिनाम्
तमेकदन्तमेव-तं विचिन्तयामि संततम्।5।

PhalaShruti:
MahaGanesha-Pancharatnam-aadarena Yo-anvaham,
Prajal-pati Prabhatake Hridi-smaran Ganeshwaram.
Arogataam-adoshataam Su-saasihi-teem Suputrataam,
Samaahitaa-ayurashta-bhootim-abhyu-paiti So chiraat. 

महागणेश पञ्चरत्नमादरेण योऽन्वहम्
प्रजल्पति-प्रभातके हृदि-स्मरन् गणेश्वरं
अरोगतामदोषतां सुसाहितीं सुपुत्रताम्
समाहितायुर्-अष्टभूतिमभ्युपैति सोऽचिरात्।6।
 

इति श्री गणेशपंचरात्नम सम्पूर्णं

Ganesha Pancharatnam meaning in Hindi-

अर्थ- जो अपने हाथों में सदैव प्रसन्नतापूर्वक मोदक को धारण किये रहते हैं, जो सदा अपने साधकों (भक्तों) को मुक्ति प्रदान करते हैं, जिन्होंने चन्द्रमा को आभूषण के रूप में धारण किया है और जो सभी लोकों के रक्षक हैं, जो अनाथों के नाथ और गजासुर के संहारकर्ता हैं, जो तीव्र वेग से सभी अशुभों का नाश करते हैं उन विनायक को नमस्कार है. 1

जो घमंड से भरे लोगों के लिए भयंकर रूप धारण करते हैं, जो उगते हुए सूर्य की भांति चमकते हैं, जो देवों के द्वारा नमस्कृत और निर्जर (कभी वृद्ध न होने वाले) हैं, जो अपने शरणागतों की बाधाओं को दूर करते हैं, उन सुरेश्वर, निधीश्वर (समृद्धि के देव), गजेश्वर और गणेश्वर (गणों के राजा), महेश्वर की मैं शरण लेता हूँ. 2

जो सभी लोकों में शुभ हैं, जो बड़े-बड़े दैत्यों को दूर करते हैं, जिनका बड़ा उदर (पेट) समृद्धि का प्रतीक है और जिनका मुख अविनाशी प्रकृति को दर्शाता है, जो अपने भक्तों पर कृपा, क्षमा, आनंद और यश और बुद्धि की वर्षा करते हैं, उन विनायक के ओजस्वी रूप को मैं प्रणाम करता हूँ. 3

जो अपने शरणागतों की पीड़ा को दूर करते हैं, जिसकी प्राचीन काल से प्रशंसा हो रही है, जो भगवान् शिव (पुरारी) के पूर्वनन्दन (पुत्र) हैं, जो देवताओं के शत्रुओं के घमंड को चबा जाते हैं, जो प्रलय के समय प्रचंड शक्ति धारण करते हैं, जो अग्नि की शक्ति से विभूषित हैं, जिनके गालों (कपोलों) से कृपा की धारा बहती है उन आदिदेव श्री गणेश को मैं पूजता हूँ. 4

जिनका एकदन्त रूप भक्तों को प्रिय है, जो यम के संहारक (शिव) के पुत्र हैं, जिनका अनादि रूप अकल्पनीय है और जो भक्तों  के कष्टों को हर लेते हैं, जो योगियों के ह्रदय में निरंतर वास करते हैं, उन एकदन्त भगवान् का मैं ध्यान करता हूँ. 5

जो इस महागणेश पंचरत्न को भक्तिपूर्वक एवं भगवान् गणेश का ह्रदय में ध्यान करके पढ़ते हैं, उन्हें रोगों और दोषों से मुक्ति मिलती है और उन्हें गुणवान पत्नी और पुत्र की प्राप्ति होती है, वे लोग अष्ट ऐश्वर्य पाकर लम्बी आयु प्राप्त करते हैं. 6

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Monday, August 26, 2019

Shree Ganpati Atharvashirsha lyrics in Hindi with meaning

Shri Ganesha

 Shri Ganapati Atharvashirsha full lyrics-

। अथ श्री गणपति अथर्वशीर्षम् ।

ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवाः ।
भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः ।।
स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवाङ्ग्-सस्तनूभिः ।
व्यशेम देवहितं यदायूः ।।


अर्थ- ॐ, हे देव! जो कानों के लिए शुभ है वो सुनो, जो यज्ञ अनुष्ठानों के योग्य हैं वे हम अपनी आखों से मंगलमई घटित होते देखें। रोगमुक्त शरीर और स्वस्थ देह के माध्यम से आपकी स्तुति करते हुए जो प्रजापति ब्रह्मा ने हमारी आयु तय की है उसे पूरा करें।

स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवा ।
स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः ।।
स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः।
स्वस्ति नो वृहस्पतिर्दधातु ।।
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः।


अर्थ- ऐश्वर्यशाली इंद्र देव हमारा कल्याण करें, विश्व-वेद जिनका संसार के सब पदार्थों में स्मरण है वे पूषा अर्थात सूर्य देव हमारा कल्याण करें। जिनकी चक्रधारा के समान गति को कोई  रोक नहीं सकता, वे गरुड़देव हमारा कल्याण करें। वेदों की वाणी के स्वामी बृहस्पति हमारा कल्याण करें। ॐ शांति, शांति शांति।

ॐ नमस्ते गणपतये ।।1।।

अर्थ- ॐ गणपति को नमस्कार है।।

त्वमेव प्रत्यक्षं तत्त्वमसि ।
त्वमेव केवलं कर्तासि ।
त्वमेव केवलं धर्तासि ।
त्वमेव केवलं हर्तासि ।
त्वं साक्षादात्माऽसि नित्यं ।।2।।


अर्थ- तुम ही प्रत्यक्ष तत्व हो, तुम ही एकमात्र कर्ता हो, तुम ही एकमात्र धर्ता हो, तुम ही एकमात्र हर्ता (हरण करने वाले ) हो, निश्चय ही इन रूपों में विराजमान तुम साक्षात आत्मा हो।।

ऋतं वच्मि सत्यं वच्मि ।।3।।

अर्थ- मैं ऋत ( न्यायसंगत बात ) कहता हूँ, सत्य कहता हूँ।।

अव त्वं माम् । अव वक्तारम्।
अव श्रोतारम्। अव दातारम्।
अव धातारम्। अवानूचानमव शिष्यम्।
अव पुरस्तरात्। अव दक्षिणात्तात्।
अव पश्चात्तात्। अवोत्तरात्तात्।
अव चोर्ध्वात्तात्। अवोधरात्तात्।
सर्वतो मां पाहि पाहि समन्तात् ।।4।।


अर्थ- तुम मेरी रक्षा करो, तुम वक्ता ( बोलने वाले ) की रक्षा करो, तुम श्रोता ( सुनने वाले ) की रक्षा करो, तुम दाता की रक्षा करो, तुम धाता की रक्षा करो, तुम आचार्य की रक्षा करो, शिष्य की रक्षा करो, तुम आगे से रक्षा करो, पीछे रक्षा करो, तुम पूर्व से रक्षा करो, पश्चिम से रक्षा करो, उत्तर दिशा से रक्षा करो, दक्षिण से रक्षा करो, ऊपर से रक्षा करो, नीचे से रक्षा करो. तुम सब ओर से मेरी रक्षा करो।।

त्वं वाङ्मयस्त्वं चिन्मयः।
त्वमानन्दमयस्त्वं ब्रह्ममयः।
त्वंसच्चिदानन्दाऽद्वितीयोऽसि ।
त्वं ज्ञानमयो विज्ञानमयोऽसि ।।5।।


अर्थ- तुम वाङ्मय हो, तुम चिन्मय (पूर्ण तथा विशुद्ध ज्ञानमय) हो, तुम आनंदमय हो, तुम ब्रह्ममय हो, तुम सच्चिदानंद और अद्वितीय (जिसके अलावा कोई दूसरा न हो) हो. तुम ज्ञानमय हो, तुम्ही विज्ञानमाय हो।।

सर्वं जगदिदं त्वत्तो जायते । सर्वं जगदिदंत्वत्तस्तिष्ठति ।
सर्वं जगदिदं त्वयि लयमेष्यति। सर्वं जगदिदं त्वयि प्रत्येति ।


त्वं भूमिरापोऽनलोऽनिलो नभः ।
त्वं चत्वारि वाक् परिमिता पदानि ।
त्वं गुणत्रयातीतः । त्वं अवस्थात्रयातीतः।
त्वं देहत्रयातीतः। त्वं  कालत्रयातीतः।
 त्वं मूलाधारस्थितोऽसिनित्यं ।
त्वं शक्तित्रयात्मकः। त्वं योगिनो ध्यायन्ति नित्यम् ।


त्वं ब्रह्मा त्वं विष्णुस्त्वं ।
रुद्रस्त्वमिन्द्रस्त्वमग्निस्त्वं ।
वायुस्त्वं सूर्यस्त्वं चन्द्रमास्त्वं ।
ब्रह्म भूर्भुवस्सुवरोम्  ।।6।।


अर्थ- सारा जगत तुमसे उत्पन्न होता है, सारा जगत तुमसे सुरक्षित रहता है, सारा जगत तुममे लीं रहता है, सारा जगत तुम्ही में प्रतीत होता है।
तुम्ही भूमि, जल, आकस्श और अग्नि हो. तुम्ही चतुर्विध अर्थात चार प्रकार की वाणी (परा, पश्यंती, मध्यमा और वैखरी) हो. तुम तीनों गुणों सत-रज-तम से परे हो. तुम भूत-भविष्य और वर्तमान से परे हो. तुम स्थूल, सूक्ष्म और कारण इन तीनों देहों से परे हो. तुम मूलाधार चक्र में स्थित हो. प्रभु-शक्ति, उत्साह-शक्ति और मन्त्र-शक्ति ये तीनों शक्तियां तुम्ही हो. सभी योगी नित्य तुम्हारा ध्यान करते हैं.
तुम ब्रह्मा, विष्णु और रूद्र हो. तुम इंद्र हो, तुम अग्नि हो, तुम वायु हो, तुम सूर्य हो, तुम्ही चन्द्रमा हो, तुम्ही ब्रह्म और तुम्ही त्रिपाद भू, भुवः और स्वः हो।।

गणादिं पूर्वमुच्चार्य वर्णादींस्तदनन्तरम्।
अनुस्वारः परतरः।
अर्धेन्दुलसितम् ।
तारेण ऋद्धम् ।
एतत्तव मनुस्वरूपं ।।7।।


[गणपति का मन्त्र स्वरुप इस प्रकार है-] 'गण' के प्रथम शब्दांश (ग) का उच्चारण करने के बाद प्रथम वर्ण (अ) का उच्चारण करें, उसके बाद अनुस्वर (म्) का उच्चारण करें (जिससे 'गम्' बनता है), इसके बाद इसे अर्धचन्द्र से सुशोभित करें (गँ) और तार से इसे बढ़ाएं (इस प्रकार "ॐ गॅं" बनता है)।

गकारः पूर्वरूपम् ।
अकारो मध्यरूपम्।
अनुस्वारश्चान्त्यरूपम्।
बिन्दुरुत्तररूपम्।
नादस्सन्धानम्।
संहिता संधिः ।।8।।

[इस मंत्र स्वरुप में] ग-कार प्रथम रूप है, अ-कार मध्य रूप है और अनुस्वर अंतिम रूप है (जिससे "gam" की ध्वनि बनती है) बिंदु उत्तर (ऊपरी) रूप है (जिससे चंद्र बिंदु की ध्वनि उत्पन्न होने पर "गॅंग" की ध्वनि होती है) अंत में नाद का संधान (योग) होता है, ये सभी रूप आपस में मिल जाते हैं।।

सैषा गणेशविद्या।
गणक ऋषिः।
निचृद्गायत्रीच्च्हन्दः।
गणपतिर्देवता।
ॐ गं गणपतये नमः ।।9।।

[मंत्रस्वरूप से श्री गणेश की पूजा के द्वारा आत्मज्ञान की और ले जाने वाली] यह गणेश विद्या है, गणक इसके ऋषि हैं, निचृद्-गायत्री छंद है, गणपति देवता हैं, ॐ गं गणपतये नमः।।

एकदन्ताय विद्महे वक्रतुण्डाय धीमहि।
तन्नो दन्तिः प्रचोदयात् ।।10।।

[गणपति गायत्री-] हम एकदन्त और वक्रतुण्ड (टेढ़े मुख वाले) भगवान का ध्यान करते हैं, वे दन्ती (हाथीदांत वाले) भगवान् जागृत हों।।

एकदन्तं चतुर्हस्तं पाशमङ्कुश्धारिणम्।
रदं च वरदं हस्तैर्बिभ्राणं मूषकध्वजम्।
रक्तं लंबोदरं शूपकर्णकं रक्तवाससम् ।
रक्तगन्धानुलिप्ताङ्गं रक्त्पुष्पैस्सुपूजितं ।

भक्तानुकम्पिनम् देवं जगत्कारणमच्युतम् ।
आविर्भूतं च सृष्ट्यादौ प्रकृतेः पुरुषात्परम् ।
एवं ध्यायति यो नित्यं स योगी योगिनां वरः ।।11।।

[भगवान् गणेश का दृश्य स्वरुप इस प्रकार है] उनका एक [बड़ा] दांत है, उनकी चार भुजाएं हैं, जिनमें वे पाश, अंकुश, दन्त और वर मुद्रा धारण करते हैं, उनके ध्वज पर मूषक का चिन्ह बना हुआ है. उनके शरीर पर लालिमा छाई हुई है, वे पेट बड़ा है (लम्बोदर) और कान लम्बे हैं (शूपकर्ण), वे लाल वस्त्र धारण करते हैं. उनका रूप लाल गंध और लाल फूलों से पूजित है।

वे अपने भक्तों पर कृपा करते हैं, वे जगत की उत्पत्ति के कारण हैं, वे अविनाशी (अच्युत) हैं, वे सृष्टि के आदि (शुरुआत) में परम पुरुष से उत्त्पन्न हुए हैं, जो उनका ध्यान करता है, वह योगियों में श्रेष्ठ योगी होता है।।

नमो व्रातपतये ।
नमो गणपतये ।
नमः प्रथमपतये ।
नमस्तेअस्तु लम्बोदरायैकदन्ताय।
विघ्ननाशिने शिवसुताय वरदमूर्तये नमः ।।12।।

सभी मनुष्यों के स्वामी को नमस्कार है, सभी गणों के स्वामी को नमस्कार है, सभी प्रमथों (शिवजी के अनुसरण करने वाले राक्षस) के स्वामी को नमस्कार है. हे लम्बोदर, हे एकदंत तुम्हें नमस्कार है, विघ्नविनाशक, शिव के पुत्र, वरदान देने वाले को नमस्कार है।।

एतदथर्वशीर्षं योऽधीते स ब्रह्मभूयाय कल्पते ।
स सर्वविघ्नैर्न बाध्यते ।
स सर्वत्र सुखमेधते ।
स पञ्चमहापापात्प्रमुच्यते।

सायमधीयानो दिवसकृतं पापं नाशयति ।
प्रातरधीयानो रात्रिकृतं पापं नाशयति ।
सायं प्रातः प्रयुञ्जानो पापोऽपापो भवति।
सर्वत्राधीयानोऽपविघ्नो भवति ।
धर्मार्थकाममोक्षं च विन्दति ।।13।।

जो इस अथर्वशीर्ष का पाठ करता है, वह ब्रह्म को जानने योग्य हो जाता है, उसे विघ्नों के बंधन से मुक्त हो जाता है, हर जगह उसका सुख बढ़ता जाता है, वह पांच महा पापों से मुक्त हो जाता है।

शाम को पाठ करने से दिन में किये पापों का नाश होता है, सुबह पाठ करने से रात में किये पापों का नाश होता है, सुबह और शाम दोनों समय पाठ करने पर सभी पापों से मुक्ति मिलती है, सभी जगह [सभी परिस्थितियों में] पाठ करने पर विघ्नों का नाश होता है और धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की प्राप्ति होती है।

इदमथर्वशीर्षमशिष्याय न देयम् ।
यो यदि मोहाद्दास्यति स पापीयान् भवति ।
सहस्रावर्तनाद्यम् यं काममधीते तं तमनेन साधयेत् ।।14।।

इस अथर्वशीर्ष को अयोग्य पुरुष को नहीं देना चाहिए, यदि साधक मोहवश किसी अयोग्य को यह मन्त्र दे देता है तो वह पाप का भागी होता है, जब एक हजार बार इसका पाठ गहन अध्ययन किया जाता है तो साधक को सिद्धि की प्राप्ति होती है।।

अनेन गणपतिमभिषिन्चति स वाग्मी भवति ।
चतुर्थ्यामनश्नन जपति स विद्यावान् भवति ।
इत्यथर्वणवाक्यम् ।
ब्रह्माद्यावरणं विद्यान्न विभेति कदाचनेति ।।15।। 

 जो इस उपनिषद् से गणपति का अभिषेक करता है, वह प्रखर वक्ता (speaker) हो जाता है, जो चतुर्दशी के दिन उपवास करके इस उपनिषद् का पाठ करता है उसे ज्ञान की प्राप्ति होती है, ये अथर्व ऋषि का कथन है. उसे ब्रह्म विद्या प्राप्त होती है और वे भयमुक्त हो जाते हैं।।

यो दुर्वाङ्कुरैर्यजति स वैश्रवणोपमो भवति ।
यो लाजैर्यजति स यशोवान् भवति ।
स मेधावान भवति ।
यो मोदकसहस्रेण यजति स वाञ्छितफलमवाप्नोति ।
यस्साज्यसमिद्भिर्यजति स सर्वं लभते स सर्वं लभते ।।16।। 

 जो दूर्वा (दूब) से गणपति की पूजा करता है वे कुबेर के समान समृद्ध हो जाता है, जो चावलों से पूजा करता है वह कीर्ति प्राप्त करता है और मेधावान (होनहार) बनता है, जो एक हजार मोदकों से पूजा करता है वह मनोवांछित फल प्राप्त करता है, जो घी आदि समिधा से गणपति के लिए हवन करता है उसे सब कुछ प्राप्त होता है।।

अष्टौ ब्राह्मणान सम्यग् ग्राहयित्वा सूर्यवर्चस्वी भवति ।
सूर्यग्रहेमहानद्याम्  प्रतिमासंनिधौ वा जप्त्वा सिद्धमन्त्रो भवति ।
महाविघ्नात प्रमुच्यते ।
महादोषात् प्रमुच्यते ।
महाप्रत्यवायात् प्रमुच्यते ।
स सर्वविद् भवति स सर्वविद् भवति।
य एवं वेद ।
इत्युपनिषत् ।।17।।
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ।

जो भी आठ ब्राह्मणों को ज्ञाता बनाता है वह सूर्य के समान तेजस्वी हो जाता है, जो भी सूर्या ग्रहण के समय नदी के किनारे बैठकर या गणेश जी की प्रतिमा के सामने बैठकर इस उपनिषद् का पाठ करता है उसे मंत्र-सिद्धि प्राप्त होती है, वह घोर विघ्नों से मुक्त हो जाता है, वह महान दोषों से मुक्ति पाता है, वह पापों के गर्त से ऊपर उठ जाता है, वह सभी विद्याओं का ज्ञाता हो जाता है, यह वेद का कथन है, इस प्रकार यह उपनिषद् है, ॐ शांति शांति शांति...।।

। इति श्री गणपतिअथर्वशीर्षम सम्पूर्णं ।


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Thursday, March 22, 2018

Shree Ganesh Chalisa

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Shree Ganesh Chalisa-

॥दोहा॥
जय गणपति सदगुणसदन, कविवर बदन कृपाल।
विघ्न हरण मंगल करण, जय जय गिरिजालाल॥

जय जय जय गणपति गणराजू।
मंगल भरण करण शुभ काजू ॥

॥चौपाई॥
जै गजबदन सदन सुखदाता। विश्व विनायक बुद्घि विधाता॥
वक्र तुण्ड शुचि शुण्ड सुहावन। तिलक त्रिपुण्ड भाल मन भावन॥

राजत मणि मुक्तन उर माला। स्वर्ण मुकुट शिर नयन विशाला॥
पुस्तक पाणि कुठार त्रिशूलं । मोदक भोग सुगन्धित फूलं ॥1॥

सुन्दर पीताम्बर तन साजित । चरण पादुका मुनि मन राजित ॥
धनि शिवसुवन षडानन भ्राता । गौरी ललन विश्वविख्याता ॥

ऋद्घिसिद्घि तव चंवर सुधारे । मूषक वाहन सोहत द्घारे ॥
कहौ जन्म शुभकथा तुम्हारी । अति शुचि पावन मंगलकारी ॥2॥

एक समय गिरिराज कुमारी । पुत्र हेतु तप कीन्हो भारी ॥
भयो यज्ञ जब पूर्ण अनूपा । तब पहुंच्यो तुम धरि द्घिज रुपा ॥
अतिथि जानि कै गौरि सुखारी । बहुविधि सेवा करी तुम्हारी ॥
अति प्रसन्न है तुम वर दीन्हा । मातु पुत्र हित जो तप कीन्हा ॥3॥
मिलहि पुत्र तुहि, बुद्घि विशाला । बिना गर्भ धारण, यहि काला ॥
गणनायक, गुण ज्ञान निधाना । पूजित प्रथम, रुप भगवाना ॥
अस कहि अन्तर्धान रुप है । पलना पर बालक बनि शिशु,
 रुदन जबहिं तुम ठाना। लखि मुख सुख नहिं गौरि समाना ॥4॥

सकल मगन, सुखमंगल गावहिं । नभ ते सुरन, सुमन वर्षावहिं ॥
शम्भु, उमा, बहु दान लुटावहिं । सुर मुनिजन, सुत देखन आवहिं ॥
लखि अति आनन्द मंगल साजा । देखन भी आये शनि राजा ॥
निज अवगुण गुनि शनि मन माहीं । बालक, देखन चाहत नाहीं ॥5॥

गिरिजा कछु मन भेद बढ़ायो । उत्सव मोर, न शनि तुहि भायो ॥

कहन लगे शनि, मन सकुचाई । का करिहौ, शिशु मोहि दिखाई ॥

नहिं विश्वास, उमा उर भयऊ । शनि सों बालक देखन कहाऊ ॥

पडतहिं, शनि दृग कोण प्रकाशा । बोलक सिर उड़ि गयो अकाशा ॥6॥

गिरिजा गिरीं विकल है धरणी । सो दुख दशा गयो नहीं वरणी ॥

हाहाकार मच्यो कैलाशा । शनि कीन्हो लखि सुत को नाशा ॥

तुरत गरुड़ चढ़ि विष्णु सिधायो । काटि चक्र सो गज शिर लाये ॥

बालक के धड़ ऊपर धारयो । प्राण, मन्त्र पढ़ि शंकर डारयो ॥7॥

नाम गणेश शम्भु तब कीन्हे । प्रथम पूज्य बुद्घि निधि, वन दीन्हे ॥

बुद्घ परीक्षा जब शिव कीन्हा । पृथ्वी कर प्रदक्षिणा लीन्हा ॥

चले षडानन, भरमि भुलाई। रचे बैठ तुम बुद्घि उपाई ॥

चरण मातुपितु के धर लीन्हें । तिनके सात प्रदक्षिण कीन्हें ॥8॥

तुम्हरी महिमा बुद्घि बड़ाई । शेष सहसमुख सके न गाई ॥

मैं मतिहीन मलीन दुखारी । करहुं कौन विधि विनय तुम्हारी ॥

भजत रामसुन्दर प्रभुदासा । जग प्रयाग, ककरा, दर्वासा ॥
अब प्रभु दया दीन पर कीजै । अपनी भक्ति शक्ति कछु दीजै ॥9॥

॥दोहा॥
श्री गणेश यह चालीसा, पाठ करै कर ध्यान।
नित नव मंगल गृह बसै, लहे जगत सन्मान॥

सम्बन्ध अपने सहस्त्र दश, ऋषि पंचमी दिनेश।
पूरण चालीसा भयो, मंगल मूर्ति गणेश ॥


Shree Ganesh Chalisa-

Jaya ganapati sadhguna sadana, kavi vara badana kripaala.
Vighna harana mangala karana, jaya jaya girijaa laala.
Jaya jaya ganapati gan raaju, mangala bharana karana shubha kaaju .
Jaya gajabadana sadana sukhadaataa, vishva vinaayaka buddhi vidhaata.

Vakra tunda shuchi shunda suhaavana, tilaka tripunda bhaala mana bhaavana.
Raajata mani muktana ura maala, svarna mukuta shira nayana vishaala.

Pustaka paani kuthaara trishuulam, modaka bhoga sugandhita phoolam.
Sundara piitaambara tana saajita, charana paaduka muni mana raajita.

Dhani shiva suvana shadaanana bhraata, gaurii lalana vishva-vidhaata.
Riddhi siddhi tava chanvara sudhaare, mushaka vaahana sohata dvaare.

Kahaun janma shubha kathaa tumhaari, ati shuchi paavana mangala kaari.
Eka samaya giriraaj kumaari, putra hetu tapa kinha bhaari.
Bhayo yagya jaba puurna anuupa, taba pahunchyo tuma dhari dvija ruupa.

Atithi jaani kai gauri sukhaari, bahuvidhi sevaa kari tumhaari.

Ati prasanna hvai tuma vara diinha, maatu putra hita jo tapa kiinha.

Milahi putra tuhi buddhi vishaala, binaa garbha dhaarana yahi kaala.

Gananaayaka, guna gyaana nidhaana, puujita prathama ruupa bhagavana.

Asa kahi antardhyaana ruupa hvai, palana para baalaka svaruupa hvai.

Bani shishu rudana jabahi tuma thaana, lakhi mukha sukha nahin gauri samaan.

Sakala magana, sukha mangala gaavahin, nabha te surana sumana varshaavahin.

Shambhu uma, bahu dana lutavahin, sura munijana, suta dekhana aavahin.

Lakhi ati aananda mangala saaja, dekhana bhi aaye shani raaja.
Nija avaguna guni shani mana maahin, baalaka, dekhan chaahata naahin.
Giraja kachhu mana bheda badhaayo, utsava mora na shani tuhi bhaayo.

Kahana lage shani, mana sakuchaai, kaa karihau, shishu mohi dikhaai.
Nahin vishvaasa, uma ur bhayau, shani so baalaka dekhana kahyau.

Padatahin, shani driga kona prakaasha, baalaka shira udi gayo aakaasha.
Giraja giriin vikala hvai dharani, so dukha dasha gayo nahin varani.

Haahaakaara machyo kailaasha, shani kiinhyon lakhi suta ka naasha.
Turata garuda chadhi Vishnu sidhaaye, kaati chakra so gaja shira laaye.Baalaka ke dhada upara dhaarayo, praana, mantra padha shankara darayo.
Naama ‘ganesha’ shambhu taba kiinhe, prathama puujya buddhi nidhi, vara diinhe.
Buddhi pariiksha jaba shiva kiinha, prithvii kar pradakshina liinha.
Chale shadaanana, bharami bhulaIi, rachi baitha tuma buddhi upaai.

Charana maatu-pitu ke dhara linhen, tinake saata pradakshina kinhen.
Dhani ganesha, kahi shiva hiya harashe, nabha te surana sumana bahu barase.
Tumhari mahima buddhi badaye., shesha sahasa mukha sakai na gaai.
Mein mati hina malina dukhaari, karahun kauna vidhi vinaya tumhaari.

Bhajata ‘raamasundara’ prabhudaasa, lakha prayaga, kakara, durvasa .
Aba prabhu daya dina para kijai, apani bhakti shakti kuchhu dijai.

DOHA:
Shri Ganesh yah chalisa, path karai dhari dhyan, 

Nit nav mangal gruha bashe, lahi jagat sanman.

Sambandh apne sahstra dash, rushi panchami dinesh.
Puran chalisa bhayo, mangal murti ganesha.

Tuesday, March 20, 2018

Ganesh Ji Ki Aarti

Ganesh ji ki arti

Ganesh Ji ki Aarti-

जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा।
माता जाकी पार्वती पिता महादेवा|| 

एकदन्त दयावन्त चारभुजाधारी| 

माथे पर तिलक सोहे, मूसे की सवारी||

जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा।
माता जाकी पार्वती पिता महादेवा|| 


पान चढ़े फूल चढ़े और चढ़े मेवा|

लड्डुअन का भोग लगे सन्त करे सेवा||



जय गणेश जय गणेश जय गणेश देव।
माता जाकी पार्वती पिता महादेवा||



अँधे को आँख देत कोढ़िन को काया|
बाँझन को पुत्र देत निर्धन को माया||

रिद्धि देत सिद्धि देत और देत माया| 

मेरो दुःख दूर करो निरोग करो काया||  

जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा।
माता जाकी पार्वती पिता महादेवा|| 


दीनन की लाज राखो संभुसुत हारी| 

कामना को पूरा करो जाऊं बलिहारी|| 

सूर श्याम शरण आए सफल कीजे सेवा|


जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा।
माता जाकी पार्वती पिता महादेवा||

माता जाकी पार्वती पिता महादेवा|
माता जाकी पार्वती पिता महादेवा..


Ganesh Ji Ki Aarti-

Jai ganesh jai ganesh jai ganesh deva
mata jaki parvati, pita mahadeva

ekadanta dayavanta, char bhujadhaari
mathe par tilak sohe, muse ki savari


Jai ganesh jai ganesh jai ganesh deva
mata jaki parvati, pita mahadeva

paan charhe, phool charhe aur charhe meva
ladduan ka bhog lage, sant karein seva

Jai ganesh jai ganesh jai ganesh deva
mata jaki parvati, pita mahadeva

andhe ko aankh deta, korhina ko kaya
baanjhana ko putra deta, nirdhan ko maya

Jai ganesh jai ganesh jai ganesh deva
mata jaki parvati, pita mahadeva

ridhi det sidhi det or det maya
mero dukh door karo nirog karo kaaya

Jai ganesh jai ganesh jai ganesh deva
mata jaki parvati, pita mahadeva

deenan ki laag rakho sambhusut hari
kaamna ko poora karo jaaun balihari

Jai ganesh jai ganesh jai ganesh deva
mata jaki parvati, pita mahadeva

maata jaki parvati, pitaa mahadeva
mataa jaki parvati, pita mahadeva..
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