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Thursday, September 3, 2020

Shri Surya Chalisa in Hindi सूर्य चालीसा लिरिक्स

Surya Chlisa

For Lyrics in English- Click here

Surya Chalisa lyrics in Hindi-

 दोहा
कनक बदन कुंडल मकर, मुक्ता माला अंग।
पद्मासन स्थित ध्याइये, शंख-चक्र के संग।

चौपाई-
जय सविता जय जयति दिवाकर,सहस्रांशु सप्ताश्व तिमिरहर।1।
 भानु पतंग मरीचि भास्कर, सविता हंस सुनूर विभाकर।2।

विवस्वान आदित्य विकर्तन, मार्तंड हरिरूप विरोचन ।3।
अम्बरमणि खग रवि कहलाते, वेद हिरण्यगर्भ कह गाते।4।

सहस्रांशु प्रद्योतन कहिकहि, मुनिगन होत प्रसन्न मोदलहि।5।
अरुण सदृश सारथी मनोहर, हांकत हय साता चढ़ि रथ पर।6।

मंडल की महिमा अति न्यारी, तेज रूप केरी बलिहारी।7।
उच्चैःश्रवा सदृश हय जोते, देखि पुरंदर लज्जित होते।8।

मित्र मरीचि भानु अरुण भास्कर, सविता सूर्य अर्क खग कलिकर।9।
 पूषा रवि आदित्य नाम लै, हिरण्यगर्भाय नमः कहिकै ।10।

द्वादस नाम प्रेम सौं गावै, मस्तक बारह बार नवावै ।11।
चार पदारथ जन सो पावै, दुःख दारिद्र अघ पुंज नसावै।12।

नमस्कार को चमत्कार यह, विधि-हरिहर को कृपासार यह।13।
सेवै भानु तुमहि मन लाइ, अष्ट सिद्धि नवनिधि तेहिं पाई।14।

बारह बार उच्चारण करते, सहस जनम के पातक टरते ।15।
उपाख्यान जो करते तवजन, रिपु सों जमलहते सोतेहि छन।16।

धन सूत जुत परिवार बढ़त है, प्रबल मोह को फंद कटत है।17।
अर्क शीश को रक्षा करते, रवि ललाट पर नित्य बिहरते ।18।

सूर्य नेत्र पर नित्य विराजत, कर्ण देस पर दिनकर छाजत ।19।
भानु नासिका वास करहु नित,भास्कर करत सदा मुख को हित।20।
 
ओंठ रहैं परजन्य तुम्हारे, रसना बीच तीक्ष्ण बस प्यारे।21।
कंठ सुवर्ण रेत की शोभा, तिग्म तेजसः काँधे लोभा ।22।

पूषा बाहू मित्र पीठहिं पर, त्वष्टा वरुण रहत सु-उष्णुकर।23।
युगल हाथ पर रक्षा कारन, भानुमान उरसर्म सु-उदरचन।24।

बसत नाभि आदित्य मनोहर, कतिमंह रहत मन मुदभर ।25।
जंघा गोपति सविता वासा, गुप्त दिवाकर करत हुलासा।26।

विवस्वान पद की रखवारी, बाहर बसते नित तम हारी।27।
सहस्रांशु सर्वांग सम्हारै, रक्षा कवच विचित्र विचारे ।28।

अस जोजन अपने मन मांही, भय जगबीच करहुं तेहि नाहीं।29।
दद्रु कुष्ठ तेहिं कबहुं न व्यापै, जो जन याको मन मंह जापै।30।

अन्धकार जग का जो हरता, नव प्रकाश से आनंद भरता।31।
ग्रह गन ग्रसि न मिटावत जाही, कोटि बार मैं प्रनवों ताही।32।

मंद सदृश सुत जग में जाके, धर्मराज सम अदभुत बांके।33।
धन्य धन्य तुम दिनमनि देवा, किया करत सुरमुनि नर सेवा।34।

भक्ति भावयुत पूर्ण नियम सों, दूर हटत सो भव के भ्रम सों।35।
परम धन्य सों नर तनधारी, हैं प्रसन्न जेहि पर तम हारी।36।

अरुणमाघ मंह सूर्य फाल्गुन, मधु वेदांग नाम रवि उदयन।37।
भानु उदय बैसाख गिनावै, ज्येष्ठ इंद्र अषाढ़ रवि गावै।38।
 
यम भादों अश्विन हिमरेता, कातिक होत दिवाकर नेता।39।
अगहन भिन्न विष्णु हैं पूषहिं, पुरुष नाम रवि हैं मल मासहिं।40।

दोहा-
भानु चालीसा प्रेम युत, गावहिं जे नर नित्य।
सुख संपत्ति लहि बिबिध, होहिं सदा कृतकृत्य।।
 
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Surya Chalisa Lyrics in English

DOHA-
Kanak badan kundal makar, mukta mala ang.
Padmaasan sthita dhyaaiye, shankh-chakra ke sang.

CHAUPAI-

Jay Savita jay jayati diwakar, sahasranshu saptaashva timirhar.
Bhaanu patang mareechi bhaskar, savita hans sunoor vibhaakar .2

vivasvaan aaditya vikartan, maartand hariroop virochan.
ambarmani khag ravi kehlaate, ved hiranyagarbh kah gaate .4

sahasranshu pradyotan kahi kahi, munigan hot prasann moda lahi.
arun sadrisha saarathi manohar, haankat hay saata chadhi rath par .6

mandal ki mahima ati nyaari, tej roop keri balihaari.
ucchaishravaa sadrish hay jote, dekh purandar lajjit hote .8

mitra mareechi bhaanu arun bhaaskar, savita soory ark khag kalikar.
poosha ravi aaditya naam lai, hirangarbhaay namah kahi kai .10

dwaadas naam prem so gaavai, mastak baarah baar navavai.
chaar padaarath jan so paavai, dukh daaridra agh punj nasaavai .12

namaskar ko chamatkaar yah, vidhi-harihar ko kripasaar yah.
sevai bhaanu tumahi man laai, ashta siddhi navanidhi tehin paai .14

baarah baar uchaaran karte, sahas janam ke paatak tarate.
upaakhyan jo karte tavajan, ripu son jamalahate sotehi chan .16

dhan sut jut parivar badhat hai, prabal moh ko fand katat hai.
ark sheesh ko raksha karte, ravi lalaat par nitya baharate .18

soory netra par nitya viraajat, karna des par dinkar chaajat.
bhaanu naasika vaas karahu nit, bhaaskar karat sadaa mukh ko hit .20

onth rahen parjanya tumhaare, rasna beech teekshn bas pyaare.
kanth suvarnret ki shobha, tigma tejasah kaandhe lobha .22

poosha baahu mitr peethanhin par, tvashtaa varun rehet su-ushnukar.
yugal haath par raksha kaaran, bhaanumaan ursarma su-udarachan .24

basat naabhi aaditya manohar, katimanh rehet man mudabhar.
janghaa gopati savita vaasa, gupt diwakar karat hulaasa .26

vivasvaan pad ki rakhvaari, baahar basate nit tam haari.
sahasraanshu sarvaang samhaarai, raksha kavach vichitr vichaare .28

as jojan apne man maanhi, bhay jagbeech karahun tehi naaheen.
dadru kushth tehin kabahun na vyaapai, jo jan yaako man manh jaapai .30

andhakaar jag ka jo harta, nav prakash se aanand bharta.
grah gan grasi na mitaavat jaahi, koti baar main pranavon taahi .32

mand sadrish sut jag men jaake, dharmraaj sam adbhut baanke.
dhany dhany tume din mani deva, kiya karat sur-muni-nar seva .34

bhaktibhav yut purna niyam saun, door hatat so bhav ke bhram saun.
param dhany saun nar tandhaari, hain prasanna jehi par tam haari .36

arun maagh manh surya faalgun, madhu vedaang naam ravi udayan.
bhaanu uday vaisaakh ginaavai, jyeshth indra ashaadh ravi gaavai .38

yam bhaadon ashvin himreta, kaatik hot divaakar neta.
agahan bhinn vishnu hain pushahin, purush naam ravi hain malmaasahin .40

DOHA-
bhanu chalisa prem yut, gaavahin je nar nitya.
sukh sampatti lahi bibidh, honhi sadaa krikritya.

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Thursday, January 3, 2019

Aditya Hridaya Stotra lyrics in hindi आदित्य हृदय स्तोत्र

Aditya hrudayam
आदित्य ह्रदय स्तोत्र अगस्त्य ऋषि की रचना है और भगवान सूर्य को समर्पित यह स्तोत्र शक्ति और बुद्धि का संचार करने वाला है यह स्तोत्र मुनि अगस्त्य ने, जब भगवान् श्री राम युद्ध से थककर खड़े थे, तब श्री राम से कहा था। इस स्तोत्र का पाठ प्रतिदिन सुबह सूर्योदय के समय में करना सबसे अच्छा माना जाता है . आदित्य ह्रदय की lyrics यहाँ दी गयी है इसी के साथ इस स्तोत्र की english lyrics भी नीचे दी गयी है।

Aditya Hridaya Stotra ( Aditya hrudayam ) lyrics in Hindi / sanskrit-

विनियोगः
ॐ अस्य आदित्य हृदयस्तोत्रस्यागस्त्यऋषिरनुष्टुपछन्दः, आदित्येहृदयभूतो भगवान ब्रह्मा देवता निरस्ताशेषविघ्नतया ब्रह्मविद्यासिद्धौ सर्वत्र जयसिद्धौ च विनियोगः।।

ध्यानम्-
नमस्सवित्रे जगदेक चक्षुसे,
जगत्प्रसूति स्थिति नाशहेतवे,
त्रयीमयाय त्रिगुणात्म धारिणे,
विरिञ्चि नारायण शङ्करात्मने।।

।। अथ आदित्य हृदय स्तोत्रम ।।

ततो युद्धपरिश्रान्तं समरे चिन्तया स्थितम्।
रावणं चाग्रतो दृष्ट्वा युद्धाय समुपस्थितम् ।।१।।
दैवतैश्च समागम्य द्रष्टुमभ्यागतो रणम् ।
उपगम्या ब्रवीद्रामम् अगस्त्यो भगवान् ऋषिः ।।2।।

उधर थककर चिंता करते हुए श्री राम जी रणभूमि में खड़े थे, उतने में रावण भी  युद्ध के लिए उनके सामने आ गया। यह देखकर अगस्त्य मुनि श्री राम चंद्र जी के पास गए और इस प्रकार बोले।।

राम राम महाबाहो शृणु गुह्यं सनातनम् ।
येन सर्वानरीन् वत्स समरे विजयिष्यसि ।।3।।
आदित्य हृदयं पुण्यं सर्वशत्रु विनाशनम् ।
जयावहं जपेन्नित्यम् अक्षय्यं परमं शिवम् ।।4।।

सभी के हृदय में रमण करने वाले ( बसने वाले ) हे महाबाहो ( लम्बी भुजाओं वाले ) राम ! यह गोपनीय स्तोत्र सुनो। इस स्तोत्र के जप से तुम अवश्य ही शत्रुओं पर विजय पाओगे।। यह आदित्य ह्रदय स्तोत्र परम पवित्र और सभी शत्रुओं का विनाश करने वाला है। इसके जप से सदा ही विजय की प्राप्ति  होती है। यह नित्य अक्षय तथा परम कल्याणकारी स्तोत्र है।।

सर्वमङ्गल माङ्गल्यं सर्व पाप प्रणाशनम्।
चिन्ताशोक प्रशमनम् आयुर्वर्धन मुत्तमम् ।।5।।
रश्मिमन्तं समुद्यन्तं देवासुर नमस्कृतम् ।
पूजयस्व विवस्वन्तं भास्करं भुवनेश्वरम् ।।6।।

 यह सभी मंगलों में भी मंगल और सभी पापों का नाश करने वाला यह स्तोत्र चिन्ता और शोक को मिटाने वाला और आयु को बढ़ाने वला है।। जो अनंत किरणों से शोभायमान ( रश्मिमान ), नित्य उदय होने वाले ( समुद्यंत ), देवों और असुरों दोनों के द्वारा नमस्कृत हैं, तुम विश्व में अपनी प्रभा ( प्रकाश ) फैलाने वाले संसार के स्वामी ( भुवनेश्वर ) भगवान् भास्कका पूजन करो।। 

सर्वदेवात्मको ह्येष तेजस्वी रश्मिभावनः ।
एष देवासुर गणान् लोकान् पाति गभस्तिभिः ।।7।।
एष ब्रह्मा च विष्णुश्च शिवः स्कन्दः प्रजापतिः ।
महेन्द्रो धनदः कालो यमः सोमो ह्यपां पतिः ।।8।।

सभी देवता इनके रूप हैं, ये देवता ( सूर्य ) अपने तेज और किरणों से जगत को स्फूर्ति प्रदान करते हैं। ये ही अपनी किरणों ( रश्मियों ) से देवता और असुरगण आदि सभी लोकों का पालन करते हैं।। ये ही ब्रह्मा, शिव, स्कन्द, प्रजापति, इंद्र, कुबेर, काल, समय, यम, चन्द्रमा, वरुण आदि को प्रकट करने वाले हैं।।

पितरो वसवः साध्या ह्यश्विनौ मरुतो मनुः ।
वायुर्वह्निः प्रजाप्राणः ऋतुकर्ता प्रभाकरः ।।9।।
आदित्यः सविता सूर्यः खगः पूषा गभस्तिमान् ।
सुवर्णसदृशो भानुः हिरण्यरेता दिवाकरः ।।10।।

ये पितरों, वसु, साध्य, अश्विनीकुमारों, मरुदगण, मनु, वायु, अग्नि, प्रजा, प्राण और ऋतुओं को जन्म देने वाले प्रभा के पुंज हैं। इनके नाम आदित्य, सविता ( जगत को उत्पन्न करने वाले ), सूर्य (सर्व व्याप्त), खग, पूषा, गभस्तिमान (प्रकाशमान), सुवर्णसदृश, भानु, हिरण्येता, दिवाकर और।।

हरिदश्वः सहस्रार्चिः सप्तसप्ति-र्मरीचिमान् ।
तिमिरोन्मथनः शम्भुः त्वष्टा मार्ताण्डको‌ऽशुमान् ।।11।।
हिरण्यगर्भः शिशिरः तपनो भास्करो रविः ।
अग्निगर्भो‌दितेः पुत्रः शङ्खः शिशिरनाशनः ।।12।।

हरिदश्व, सहस्रार्चि, सप्तसप्ति (सात घोड़ों वाले ), मरीचिमान (किरणों से सुशोभित ), तिमिरोमन्थन (अंधकार का नाश करने वाले ), शम्भु, त्वष्टा, मार्तन्डक, अंशुमान, हिरण्यगर्भ, शिशिर ( स्वाभाव से सुख प्रदान करने वाले ), तपन ( गर्मी उत्पन्न करने वाले ), भास्कर, रवि, अग्निगर्भ, अदितीपुत्र, शङ्ख, शिशिरनाशन (शीत का  करने वाले ) और।।

व्योमनाथ स्तमोभेदी ऋग्यजुःसाम-पारगः ।
धनावृष्टि-रपां मित्रो विन्ध्यवीथी प्लवङ्गमः ।।13।।
आतपी मण्डली मृत्युः पिङ्गलः सर्वतापनः ।
कविर्विश्वो महातेजा रक्तः सर्वभवोद्भवः ।।14।।

व्योमनाथ, तमभेदी, ऋग यजु और सामवेद के पारगामी, धनवृष्टि, अपाम मित्र ( जल उत्पन्न करने वाले ), विन्ध्यवीथिप्लवंग (आकाश में तीव्र गति से चलने वाले ), आतपी, मंडली, मृत्यु, पिंगल ( जिनका भूरा रंग है ), सर्वतापन (सभी को तप देने वाले ), कवि, विश्व, महातेजस्वी, रक्त, सर्वभवोद्भव (सब की उत्पत्ति के कारण ) हैं।।

नक्षत्र ग्रह ताराणाम् अधिपो विश्वभावनः ।
तेजसामपि तेजस्वी द्वादशात्मन्-नमोऽ‌स्तु ते ।।15।।
नमः पूर्वाय गिरये पश्चिमायाद्रये नमः ।
ज्योतिर्गणानां पतये दिनाधिपतये नमः ।।16।।

नक्षत्र, ग्रह और तारों के अधिपति, विश्वभावन ( विश्व की रक्षा करने वाले ), तेजस्वियों में भी तेजस्वी और द्वादशात्मा को नमस्कार है।। पूर्वगिरि उदयाचल तथा पश्चिमगिरि अस्ताचल के रूप में आपको नमस्कार है। ज्योतिर्गणों ( तारों और ग्रहों ), के स्वामी तथा दिन के अधिपति को नमस्कार है।।

जयाय जयभद्राय हर्यश्वाय नमो नमः ।
नमो नमः सहस्रांशो आदित्याय नमो नमः ।।17।।
नम उग्राय वीराय सारङ्गाय नमो नमः ।
नमः पद्मप्रबोधाय मार्ताण्डाय नमो नमः ।।18।।

जो जय के रूप हैं, विजय के रूप है, हरे रंग के घोड़ों से युक्त रथ वाले भगवान् को नमस्कार है। सहस्रों किरणों से प्रभावान आदित्य भगवान को बारम्बार नमस्कार है।। उग्र, वीर तथा सारंग सूर्य देव को नमस्कार है। कमलों को विकसित करने वाले प्रचंड तेज वाले मार्तण्ड को  नमस्कार है।।

ब्रह्मेशानाच्युतेशाय सूर्यायादित्य-वर्चसे ।
भास्वते सर्वभक्षाय रौद्राय वपुषे नमः ।।19।।
तमोघ्नाय हिमघ्नाय शत्रुघ्नाया मितात्मने ।
कृतघ्नघ्नाय देवाय ज्योतिषां पतये नमः ।। 20।।

आप ब्रम्हा, शिव  विष्णु के भी स्वामी हैं, सूर आपकी संज्ञा है, यह सूर्यमण्डल आपका ही तेज है आप प्रकाश  से परिपूर्ण हैं। सबको स्वाहा करने वाली अग्नि स्वरुप हे रौद्र रूप आपको नमस्कार है।। अज्ञान, अंधकार के नाशक, शीत  के निवारक तथा शत्रुओं के नाशक आपका रूप अप्रमेय है। कृतघ्नों का नाश करने वाले देव और सभी ज्योतियों के अधिपति को नमस्कार है।।

तप्त चामीकराभाय वह्नये विश्वकर्मणे ।
नमस्तमो‌ऽभि निघ्नाय रुचये लोकसाक्षिणे ।। 21।।
नाशयत्येष वै भूतं तदेव सृजति प्रभुः ।
पायत्येष तपत्येष वर्षत्येष गभस्तिभिः ।। 22।।

आपकी प्रभा तप्त स्वर्ण के समान है आप ही हरि ( अज्ञान को हरने वाले ), विश्वकर्मा ( संसार की रचना करने वाले ), तम ( अँधेरा ) के नाशक, प्रकाशरूप और जगत के साक्षी आपको नमस्कार है।
हे रघुनन्दन, भगवान् सूर्य देव ही सभी भूतों का संहार, रचना और पालन करते हैं। यही देव अपनी रश्मि (किरणों ) से तप ( गर्मी ) और वर्षा  हैं।।

एष सुप्तेषु जागर्ति भूतेषु परिनिष्ठितः ।
एष एवाग्निहोत्रं च फलं चैवाग्नि होत्रिणाम् ।। 23।।
वेदाश्च क्रतवश्चैव क्रतूनां फलमेव च ।
यानि कृत्यानि लोकेषु सर्व एष रविः प्रभुः ।।24।। 

यही देव सभी भूतों में अन्तर्स्थित होकर उनके सो जाने पर भी जागते रहते हैं, यही अग्निहोत्री कहलाते हैं और अग्निहोत्री पुरुषों को मिलने वाले फल हैं।
ये ही वेद, यज्ञ और यज्ञ से मिलने वाले फल हैं, यह देव सम्पूर्ण लोकों की क्रियाओं का फल देने वाले हैं।।

फलश्रुति

एन मापत्सु कृच्छ्रेषु कान्तारेषु भयेषु च ।
कीर्तयन् पुरुषः कश्चिन्-नावशीदति राघव ।।25।।
पूजयस्वैन मेकाग्रो देवदेवं जगत्पतिम् ।
एतत् त्रिगुणितं जप्त्वा युद्धेषु विजयिष्यसि ।।26।।

राघव! विपत्ति में, कष्ट में, कठिन मार्ग में और किसी भय के समय जो भी सूर्य देव का कीर्तन करता है, उसे दुःख नहीं सहना ( भोगना ) पड़ता।
तुम एकाग्रचित होकर इन जगतपति देवादिदेव का पूजन करो, इसका ( आदित्य हृदय स्तोत्र ) तीन बार जप करने से तुम अवश्य ही युद्ध में विजय पाओगे।।

अस्मिन् क्षणे महाबाहो रावणं त्वं वधिष्यसि ।
एवमुक्त्वा तदागस्त्यो जगाम च यथागतम् ।।27।।
एतच्छ्रुत्वा महातेजाः नष्टशोको‌ऽभवत्-तदा ।
धारयामास सुप्रीतो राघवः प्रयतात्मवान् ।।28।।

हे महाबाहो ! इसी क्षण तुम रावण का वध कर सकोगे, इस प्रकार मुनि अगस्त्य जिस प्रकार आये थे उसी प्रकार लौट गए।
तब इस प्रकार [अगस्त्य मुनि का उपदेश ] सुनकर महातेजस्वी राम जी का शोक दूर हो गया, प्रसन्न और प्रयत्नशील होकर।।

आदित्यं प्रेक्ष्य जप्त्वा तु परं हर्षमवाप्तवान् ।
त्रिराचम्य शुचिर्भूत्वा धनुरादाय वीर्यवान् ।।29।।
रावणंप्रेक्ष्य हृष्टात्मा युद्धाय समुपागमत् ।
सर्वयत्नेन महता वधे तस्य धृतो‌ऽभवत् ।।30।।

परम हर्षित और शुद्धचित्त होकर उन्होंने भगवान सूर्य की ओर देखते हुए तीन बार आदित्य ह्रदय स्तोत्र  का तीन बार जप किया।
तत्पश्चात राम जी ने धनुष उठाकर युद्ध के लिए आये हुए रावण को देखा और उत्साह से भरकर सभी यत्नो से रावण के निश्चय किया।।

अथ रविरवदन्-निरीक्ष्य रामं मुदितमनाः परमं प्रहृष्यमाणः ।
निशिचरपति सङ्क्षयं विदित्वा सुरगण मध्यगतो वचस्त्वरेति।।३१।।

तब देवताओं के मध्य में खड़े हुए सूर्य देव ने प्रसन्न होकर श्री राम की ओर देखकर निशाचराज ( राक्षस के राजा ) के विनाश का समय निकट जानकर प्रसन्नता पूर्वक कहा "अब जल्दी करो"।।

।। इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मिकीये आदिकाव्ये युद्दकाण्डे पञ्चाधिक शततम सर्गः।। 


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