
Wednesday, August 5, 2020
शिव रक्षा स्तोत्र- Shiva Raksha Stotram lyrics in Hindi

Friday, April 24, 2020
Kalabhairava Ashtakam Lyrics कालभैरव अष्टक
Kalabhairav Ashtakam Lyrics in Hindi with Meaning- कालभैरव अष्टकं
कालभैरव अष्टक शिव जी के काल भैरव रूप को समर्पित है। आदि शंकराचार्य के द्वारा लिखा गया यह स्तोत्र भगवान कालभैरव के विकराल और भयंकर रूप की स्तुति करता है। भगवान् काल भैरव का रूप उग्र और प्रचंड है लेकिन वे बहुत ही भोले और सरल स्वभाव के हैं। वे अपने भक्तों से प्रेम करते हैं तथा अपने भक्तों की रक्षा के लिए वे सदैव तत्पर रहते हैं।
। अथ श्री कालभैरवाष्टकं ।
देवराजसेव्यमान-पावनांघ्रिपङ्कजम्।
व्याल-यज्ञसूत्रमिन्दुशेखरं कृपाकरम्।।
नारदादियोगि-वृन्दवन्दितम् दिगम्बरं।
काशिकापुराधिनाथ-कालभैरवं भजे।।1।।
अर्थ- जिनके पद कमलों (चरणों) की सेवा स्वयं देवराज इंद्र करते हैं, जो सर्प को पवित्र हार के रूप में धारण करते हैं और जो परम दयालु हैं।
नारद आदि योगी जिनकी वंदना करते हैं और जो दिगम्बर हैं उन काशी नगर के नाथ कालभैरव को [मैं] भजता हूँ।
भानुकोटिभास्वरं भवाब्धितारकं परम्।
नीलकण्ठमीप्सितार्थदायकं त्रिलोचनम्।।
कालकालमंबुजाक्षमक्ष-शूलमक्षरं ।
काशिकापुराधिनाथ-कालभैरवं भजे।।2।।
अर्थ- जो करोड़ों सूर्य के समान दीप्ति (प्रकाश) वाले हैं, जो परमेश्वर भवसागर से तारने वाले हैं, जिनका कंठ (गला) नीला है, जो सांसारिक समृद्धि प्रदान करते हैं और जिनके तीन नेत्र हैं
जो काल के भी काल हैं, जो कमल के समान नेत्र हैं, जिनका त्रिशूल तीनों लोकों को धारण करता है और जो अविनाशी हैं उन काशी नगर के नाथ [स्वामी] कालभैरव को [मैं] भजता हूँ।
शूलटङ्कपाश-दण्डपाणिमादिकरणम् ।
श्यामकायमादिदेवमक्षरं निरामयम् ।।
भीमविक्रमं प्रभुम् विचित्रताण्डवप्रियं ।
काशिकापुराधिनाथ-कालभैरवं भजे ।।3।।
अर्थ- जो अपने हाथों में त्रिशूल, कुल्हाड़ी, पाश (फन्दा) और दंड धारण करते हैं, जो सृष्टि के सृजन के कारण हैं, जो श्याम वर्ण के (सांवले रंग के) हैं, जो आदिदेव सांसारिक रोगों से परे हैं
जो अनंत भुजबल से सशक्त हैं, जिन्हें विचित्र तांडव नृत्य प्रिय है उन काशी नगर के नाथ कालभैरव को [मैं] भजता हूँ।
भक्तिमुक्तिदायकं प्रशस्तचारुविग्रहं ।
भक्तवत्सलम् स्थितम् समस्तलोकविग्रहं।।
विनिक्-वणन्मनोज्ञहेम-किङ्किणीलसत्कटिं ।
काशिकापुराधिनाथ-कालभैरवं भजे ।।4।।
अर्थ- जो भक्ति और मुक्ति प्रदान करते हैं, जो शुभऔर आनंददायक रूप धारणकरते हैं, जो भक्त वत्सल अर्थात भक्तों से प्रेम करते हैं और जो सभी लोकों में स्थित हैं
जो अपनी कमर पर विभिन्न प्रकार की आनंददायक ध्वनि उत्पन्न करने वाली सोने की घंटियाँ धारण करते हैं उन काशी नगर के नाथ कालभैरव को [मैं] भजता हूँ।
धर्मसेतुपालकम् त्वधर्ममार्गनाशकम् ।
कर्मपाशमोचकं सुशर्मदायकं विभुम् ।।
स्वर्णवर्णशेष-पाशशोभिताङ्ग्मण्डलम् ।
काशिकापुराधिनाथ-कालभैरवं भजे ।।5।।
अर्थ- जो धर्म की रक्षा करते हैं और अधर्म के मार्ग का नाश करते हैं, जो कर्मों के जाल से मुक्त करते हैं और आत्मा को सुखद आनंद देते हैं
जो अपने शरीर पर लिपटे स्वर्ण रंग के साँपों से सुशोभित हैं उन काशी नगर के नाथ कालभैरव को [मैं] भजता हूँ।
रत्नपादुकाप्रभाभिरामपादयुग्मकम् ।
नित्यमद्-वितीयमिष्टदैवतं निरञ्जनम् ।।
मृत्युदर्पनाशनं करालदन्ष्ट्रमोक्षणम् ।
काशिकापुराधिनाथ-कालभैरवं भजे ।।6।।
अर्थ- जिनके पद्युग्म (दोनों पैर) रत्न जड़ित पादुकाओं से प्रकाशित हैं, जो अनंत, अद्वितीय और इष्ट देव (प्रधान देवता) और परम पवित्र हैं
जो अपने भयानक दांतों से मृत्यु के भय का नाश करते हैं और इस भय से मुक्ति प्रदान करते हैं उन काशी नगर के नाथ कालभैरव को [मैं] भजता हूँ।
अट्टहासभिन्नपद्मजाण्डकोश-संततिं ।
दृष्टिपातनष्टपापजालमुग्रशासनम् ।।
अष्टसिद्धिदायकं कपालमालिकाधरं ।
काशिकापुराधिनाथ-कालभैरवं भजे ।।7।।
अर्थ- जिनके भयंकर अट्टहास (हंसी) की ध्वनि से कमल से उत्पन्न ब्रह्मा की सभी कृतियों की गति रुक जाती है,
जिनकी भयावह दृष्टि पड़ने पर पापों के शासन का जाल नष्ट हो जाता है
जो अष्ट सिद्धियाँ प्रदान करते हैं, और जो मुंडों की माला धारण करते हैं उन काशी नगर के नाथ कालभैरव को [मैं] भजता हूँ।
भूतसंघनायकं विशालकीर्तिदायकम् ।
काशिवासलोकपुण्यपापशोधकं विभुम्।।
नीतिमार्गकोविदम् पुरातनम् जगत्पतिम् ।
काशिकापुराधिनाथ-कालभैरवं भजे ।।8।।
अर्थ- जो भूतोंऔर प्रेतों के राजा हैं, जो विशाल कीर्ति प्रदान करते हैं, जो काशी में रहने वालों के पुण्यों और पाऊँ का शोधन करते हैं
जो सत्य और नीति का मार्ग दिखाते हैं, जो जगतपति और सर्वप्राचीन (आदिकाल से स्थित) हैं उन काशी नगर के नाथ कालभैरव को [मैं] भजता हूँ।
फलश्रुतिः
कालभैरवाष्टकं पठन्ति ये मनोहरम् ।
ज्ञानमुक्तिसाधनम् विचित्रपुण्यवर्धनम् ।।
शोकमोहदैन्यलोभकोप-तापनाशनम् ।
प्रयान्ति कालभैरवान्घ्रिसन्निधिं नरा ध्रुवम्।।
अर्थ- जो इस मनोहारी काल भैरव अष्टक का पाठ करते हैं वे ज्ञान और मुक्ति के लक्ष्य को प्राप्त करते हैं और पुण्यों में वृद्धि करते हैं।
निश्चय ही वे नर मृत्यु के पश्चात शोक, मोह, दीनता, क्रोध और ताप का नाश करने वाले भगवान् काल भैरव के चरणों को प्राप्त करते हैं।
।इति श्री कालभैरवाष्टकं सम्पूर्णम।
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Kaalbhairava Ashtakam Benefits-
भगवान काल भैरव का अत्यंत भयावह स्वरुप भूत-प्रेतों को दूर रखता है। इस अष्टक का पाठ करने पर भगवान अपने भक्तों के दुःख दारिद्र और अहंकार को नष्ट कर देते हैं और सभी प्रकार के भय से मुक्त करते हैं।
इस अष्टक से भगवान कालभैरव की स्तुति करने पर क्रोध, शोक और सभी विघ्न-बाधाओं से मुक्ति मिलती है, इसमें संदेह नहीं है।
Saturday, April 11, 2020
Vaidyanatha Ashtakam lyrics in Sanskrit with Meaning

।ॐ।
श्री राम सौमित्रिजतायुवेद षडाननादित्य कुजार्चिताय।
श्री नीलकण्ठाय दयामयाय श्री वैद्यनाथाय नमः शिवाय।1।
गङ्गा प्रवाहेन्दु जटाधराय त्रिलोचनाय स्मरकालहन्त्रे।
समस्त देवैरभिपूजिताय श्री वैद्यनाथाय नमः शिवाय।2।
भक्तः प्रियाय त्रिपुरान्तकाय पिनाकिने दुष्टहराय नित्यम्।
प्रत्यक्ष लीलाय मनुष्यलोके श्री वैद्यनाथाय नमः शिवाय ।3।
प्रभूतवातादि समस्तरोग प्रनाशकत्रे मुनिवन्दिताय।
प्रभाकरेन्द्वग्निविलोचनाय श्री वैद्यनाथाय नमः शिवाय ।4।
वाक्श्रोत्र नेत्राङ्घ्रि विहीनजन्तोः वाक्श्रोत्रनेत्राङ्घ्रि सुखप्रदाय ।
कुष्ठादिसर्वोन्नतरोगहन्त्रे श्री वैद्यनाथाय नमः शिवाय ।5।
वेदान्तवेद्याय जगन्मयाय योगीश्वरद्येय पदाम्बुजाय ।
त्रिमुर्तिरूपाय सहस्र नाम्ने श्री वैद्यनाथाय नमः शिवाय ।6।
स्वतीर्थमृद् भस्म्भृतान्ग भाजां पिशाच दुखार्थि भयापहाय।
आत्मस्वरूपाय शरीर भाजां श्री वैद्यनाथाय नमः शिवाय।7।
श्री नीलकण्ठाय वृषध्वजाय स्रवगन्ध भस्माद्यपि शोभिताय।
सुपुत्रदारादि सुभाग्यदाय श्री वैद्यनाथाय नमः शिवाय ।8।
फलस्तुतिः-
वालाम्बिकेश वैद्येश भवरोगहरेति च ।
जपेन्नामत्रयं नित्यं महारोगनिवारणम् ।।
। इति श्री वैद्यनाथाष्टकम सम्पूर्णं ।
वैद्यनाथ अष्टकम हिंदी Lyrics अर्थ -
१- जो श्री राम, लक्ष्मण के द्वारा पूजे जाते हैं, जो जटायु के द्वारा पूजे जाते हैं, जो वेदों के पूज्य हैं, जो भगवान् सुब्रमण्यम के द्वारा पूज्य हैं, जो सूर्य और मंगल ग्रहों के द्वारा पूज्य हैं, जिनका गला नीला है और जो दयाभाव से परिपूर्ण हैं, वैद्यों के नाथ उन भगवान् शिव को नमस्कार है।
२- जो गंगा का प्रवाह और चन्द्रमा को अपनी जटाओं में धारण करते हैं, जिनके तीन नेत्र हैं और जो काल (समय) और कामदेव (प्रेम के देवता) के हन्ता (नष्ट करने वाले) हैं, सभी देवों के पूज्य और सभी वैद्यों के स्वामी उन भगवान् शिव को नमस्कार है।
३- जो अपने भक्तों के प्रिय हैं, जिन्होंने त्रिपुरासुर दैत्य का वध किया था, जो 'पिनाक' नामक धनुष धारण करते हैं, जो मनुष्यों के बीच बुराइयों का नाश करते हैं, वैद्यों के स्वामी (वैद्यनाथ) उन भगवान् शिव को नमस्कार है।
४- जो सभी रोगों का नाश करते हैं, जो संक्रमण को दूर करते हैं, जो ऋषि-मुनियों द्वारा पूजे जाते हैं और जिनके लिए सूर्य, चन्द्र और अग्नि तीन नेत्रों के समान हैं, उन वैद्यनाथ भगवान् शिव को नमस्कार है।
५- जो भगवान्उन लोगों को बोलने, सुनने और देखने का सुख प्रदान करते हैं जिनके पास बोलने सुनने और देखने की शक्ति नहीं होती, कुष्ठ रोगों जैसी विनाशकारी बिमारियों को दूर करने वाले उन वैद्यनाथ भगवान् शिव को नमस्कार है।
६- जिन्हें वेदान्त (उपनिषद्) के द्वारा जाना जा सकता है, जो सारे जगत में व्याप्त हैं, योगियों के द्वारा जिनके पड़ कमल पूजे जाते हैं, जो भगवान् विष्णु. ब्रह्मा और शिव के त्रिमूर्ति रूप हैं और जिनके सहस्रों (हजारों) नाम हैं, उन वैद्यानाथ भगवान् शिव को नमस्कार है।
७- जो अपने श्मशान की राख के स्पर्श से पिशाचों के दिए गये कष्टों, दुखों और भय को दूर करते हैं, जो आत्म स्वरुप हैं और मानव शारीर धारण किये हैं, उन वैद्यानाथ भगवान् शिव को नमस्कार है।
८- जिन भगवान का गला नीला है, जिनके ध्वज पर बैल बना हुआ है, जो पुष्प, चन्दन और भस्म से सुशोभित हैं, जो सुलक्षणा पत्नी और सुपुत्र का वर देते हैं और जो सभी को सौभाग्य प्रदान करते हैं, उन वैद्यनाथ भगवान् शिव को नमस्कार है।
फलस्तुति- जो इस मन्त्र (वैद्यनाथ अष्टक) का नित्य प्रतिदिन तीन बार पाठ करके भगवान् वैद्यनाथ और उनकी पत्नी बलाम्बिका का वंदन करता है वह सभी रोगों से मुक्ति पाकर जन्म और मृत्यु के भय से मुक्त हो जाता है।
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Friday, July 19, 2019
Ardhanareeswara Stotram (अर्धनारीश्वर स्तोत्र) in Sanskrit Hindi
Ardhanari Nateshwara Stotram in Hindi-
।अथ अर्धनारीश्वर स्तोत्रम्।चाम्पेयगौरार्धशरीरकायै कर्पूरगौरार्धशरीरकाय।
धम्मिल्लकायै च जटाधराय नमः शिवयै च नमः शिवाय।।1।।
जिनका आधा शरीर चम्पा के फूलों जैसा है और शेष आधा शरीर कर्पूर के जैसे गोरे शंकर जी का है. जो [आधे शारीर पर] जटा धारण किये हुए हैं और जिनके [आधे शरीर पर] सुन्दर केशपाश सुशोभित हो रहे हैं, ऐसे पार्वती और भगवान शंकर को प्रनाम है.
कस्तूरिकाकुङ्कुमचर्चितायै चितारजःपुञ्जविचर्चिताय।
कॄतस्मरायै विकॄतस्मराय नमः शिवायै च नमः शिवाय ।।2।।
जिन पार्वती के शरीर पर कस्तूरी और कुमकुम का लेप लगा हुआ है और भगवान शंकर के शरीर पर चिता की भस्म लगी हुई है. पार्वती कामदेव को जिलाने वाली है और महादेव उसे नष्ट करने वाले हैं. ऐसे पार्वती और शंकर भगवान को मेरा नमस्कार है.
चलत्क्वणत्कङ्कणनूपुरायै पादाब्जराजत्फणिनूपुराय।
हेमाङ्गदायै भुजगाङ्गादाय नमः शिवायै च नमः शिवाय ।।3।।
जो [पार्वती] पैरों में चमकती हुई पायल को धारण किये हुए है, जो [भगवान् शिव] पैरों में सर्पराज की पायल पहने हैं, जो [पार्वती] सोने के बाजूबंद पहने हुए हैं और जो [शिव] भुजा में सर्प धारण किये हैं उन शिव को नमस्कार है और शिवा (शिवा अर्थात पार्वती) को नमस्कार है.
विशालनीलोत्पललोचनायै विकासिपङ्केरुहलोचनाय।
समेक्षणायै विषमेक्षणाय नमः शिवायै च नमः शिवाय ।।4।।
जिन [पार्वती] के बड़े नेत्र खिले हुए नीले कमल के समान हैं, जिन [शिव] के नेत्र खिले हुए कमल के समान बड़े हैं, जिन [पार्वती] के दो (सम या Even) नेत्र हैं और जिनके तीन (विषम या Odd) नेत्र हैं, उन शिवा को नमस्कार है और उन शिव को नमस्कार है.
मन्दारमालाकलितालकायै कपालमालाङ्कितकन्धराय।
दिव्यांबरायै च दिगंबराय नमः शिवायै च नमः शिवाय ।।5।।
जिन [पार्वती] के केश (बाल) मन्दार के फूलों से सुसज्जित हैं, जो [शिव] मुंडों की माला पहने हुए हैं, जिन [पार्वती] वस्त्र दिव्य हैं और जो [शिव] दिगंबर [आकाश को वस्त्र के रूप में धारण करने वाले अर्थात निर्वस्त्र] हैं उन शिवा और शिव को नमस्कार है.
अंभोधरश्यामळकुन्तळायै तडित्प्रभाताम्रजटाधराय ।
निरीश्वरायै निखिलेश्वराय नमः शिवायै च नमः शिवाय ।।6।।
जिन [पार्वती] के केश जल से भरे हुए काले बादलों के समान हैं, जिन [शिव] की जटा में बिजली की चमक जैसी लालिमा है, जिन [पार्वती] का कोई ईश्वर नहीं है (निरीश्वर अर्थात परम स्वतंत्र) और जो [शिव] समस्त संसार के ईश्वर हैं उन शिवा को नमस्कार है और उन शिव को नमस्कार है.
प्रपञ्चसृष्ट्युन्मुखलास्यकायै समस्तसंहारकताण्डवाय ।
जगज्जनन्यै जगदेकपित्रे नमः शिवायै च नमः शिवाय ।।7।।
जिन [पार्वती] का नृत्य सृष्टि का निर्माण करता है, जिन [शिव] का नृत्य सृष्टि-प्रपंच के संहार का प्रतीक है, जिन [पार्वती] जो [पार्वती] संसार की माता हैं और जो संसार के एकमेव (एकमात्र) पिता हैं उन शिवा को नमस्कार है और उन शिव को नमस्कार है.
प्रदीप्तरत्नोज्ज्वलकुण्डलायै स्फुरन्महापन्नगभूषणाय ।
शिवान्वितायै च शिवान्विताय नमः शिवायै च नमः शिवाय ।।8।।
जो [पार्वती] चमकते हुए रत्न जड़ित कुंडल पहने हैं, जो फुफकार करते हुए नाग को आभूषण के रूप में धारण किये हैं, जो [पार्वती] शिव से समन्वित हैं और जो [शिव] शिवा से समन्वित हैं उन शिवा और शिव को नमस्कार हैं.
फलश्रुति:
एतत्पठेदष्टकमिष्टदं यो भक्त्या स मान्यो भुवि दीर्घजीवी।
प्राप्नोति सौभाग्यमनन्तकालं भूयात्सदा तस्य समस्तसिद्धिः।।
यह आठ श्लोकों का अष्टक (स्तोत्र) अभीष्ट फल की प्राप्ति कराने वाला है. जो भी इसका भक्तिपूर्वक पाठ करता है वह संसार में सम्मानित होता है और लम्बी आयु तक जीता है. वह अनंत काल तक सौभाग्य और समस्त सिद्धियों को प्राप्त करता है.
।इति श्री अर्धनारीश्वर स्तोत्रम् संपूर्णम् ।
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Tuesday, April 2, 2019
Shiv Panchakshara Stotram Lyrics शिव पंचाक्षर स्तोत्र

Mantra: Shiv Panchakshari Stotra (Hindi)
नित्याय शुद्धाय दिगम्बराय तस्मै नकाराय नम: शिवाय।।१।।
जो नागेंद्र ( नागराज ) को हार स्वरुप धारण करते हैं, जो त्रिलोचन ( तीन नेत्रों वाले ) हैं, जो भस्म से अलंकृत हैं, उन महेश्वर, नित्य, शुद्ध, दिगंबर ( जिसका अम्बर दिशाओं के सिवा कुछ न हो ), 'न' अक्षर के द्वारा विदित स्वरुप को नमस्कार है।
मन्दाकिनी सलिल चन्दनचर्चिताय, नन्दीश्वर प्रमथनाथ महेश्वराय।
मन्दार पुष्पबहुपुष्प सुपूजिताय, तस्मै मकाराय नम: शिवाय।।२।।
मन्दाकिनी ( गंगाजल ) और चन्दन से जिनकी अर्चना होती है, मंदार और अन्यान्य पुष्पों से जिनकी सुन्दर पूजा हुई है, उन नंदी के अधिपति और प्रमथगणों के स्वामी महेश्वर 'म' कार स्वरुप भगवान शिव को नमस्कार है।
शिवाय गौरी वदनाब्जवृन्द सूर्याय दक्षाध्वर नाशकाय।
श्रीनीलकण्ठाय वृषध्वजाय, तस्मै शिकाराय नम: शिवाय।।३।।
जो कल्याण स्वरुप हैं, जो पार्वती जी के मुख कमल को प्रसन्न करने के लिए जो सूर्य देव के सामान हैं , जो राजा दक्ष के यज्ञ का नाश करने वाले हैं, जो वृषध्वज हैं ( जिनकी ध्वजा पर बैल का चिन्ह है ) उन शोभावान श्री नीलकंठ 'शि' कार स्वरुप शिव को नमस्कार है।
वसिष्ठकुम्भोद्भव गौतमार्य मुनीन्द्रदेवार्चित शेखराय।
चन्द्रार्कवैश्वानर लोचनाय, तस्मै वकाराय नम: शिवाय।।४।।
वसिष्ठ, कुम्भोद्भव ( घड़े से उत्पन्न होने वाले अगस्त्य मुनि ), गौतम आदि मुनियों और इन्द्रादि देवताओं के द्वारा अर्चित ( पूजित ), चन्द्रमा, सूर्य, अग्नि जिनके तीन नेत्र हैं, उन 'व' कार स्वरुप शिव को नमस्कार है।
यक्षस्वरूपाय जटाधराय, पिनाकहस्ताय सनातनाय।
दिव्याय देवाय दिगम्बराय, तस्मै यकाराय नम: शिवाय।।५।।
जिन्होंने यक्ष रूप धारण किया है, जो जटाधारी हैं, जो हाथ में पिनाक ( धनुष ) धारण किये हैं, उन दिव्य देव, दिगंबर 'य' कार स्वरुप शिव को नमस्कार है।
पञ्चाक्षरमिदं पुण्यं य: पठेच्छिव सन्निधौ।
शिवलोकमवाप्नोति शिवेन सह मोदते।।
जो कोई शिव के इस पंचाक्षर मन्त्र का नित्य पाठ करता है, वह शिवलोक को प्राप्त कर शिव जी के साथ आनंदित होता है।
।इति श्री शिव पंचाक्षर स्तोत्रम सम्पूर्णम।
Shiv Panchakshar stotram English Lyrics-
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Sunday, December 30, 2018
Shiv Tandav Stotram lyrics in Hindi with meaning- शिव तांडव स्तोत्र
![]() |
| Lord Shiva |
Shri Shiv Tandav Stotram is one of the most popular hymn (mantra) of lord Shiva. When Ravana wanted to take the whole Kailash with him to his kingdom Lanka, Lord Shiva pressed whole mountain with his left thumb and Ravana (रावण) got trapped under the mountain Kailasha. So, to please lord Shiva, he orated the Tandav Stotra and Shiva pleased on him. Lyrics of Tandav Stotram is as written down in hindi and then english.
NOTE: There are two version of Shiva Tandava- one with 15 shlokas and another with 17 shlokas. Shloka 14 and 15 are not used by some people. Here, 17 Shlokas arewritten. If you want to read Tandava Stotra with 15 Shlokas then please skip Shloka no. 14 and no. 15.
Shiv Tandav Stotram Lyrics in Hindi and english (with meaning)-
जटा टवी गलज्जल प्रवाह पावितस्थले।
गलेवलम्ब्य लम्बितां भुजङ्गतुंगमालिकाम् ।
डमड्-डमड्-डमड्-डमन्निनाद वड्-डमर्वयं।
चकार चण्ड ताण्डवं तनोतु नः शिवः शिवम्।।१।।
उनके बालों से बहने वाले जल से जिनका कंठ पवित्र है, जिनके गले में सांप एक माला की तरह लटका हुआ है और जिनके डमरू से डमड-डमड का नाद हो रहा है, शिव प्रचंड तांडव कर रहे हैं, वे हमें सम्पन्नता प्रदान करें।
जटा कटाहसंभ्रम भ्रमन्निलिम्पनिर्झरी।
विलोलवीचि वल्लरी विराजमानमूर्धनि।
धगद्-धगद्-धगज्-ज्वलल्ललाट पट्ट्पावके।
किशोरचन्द्रशेखरे रतिः प्रतिःक्षणम् मम।।२।।
गंगा की धारा से युक्त जिनकी लम्बी जटाएं [चक्कर में, round and round] घूम रही है, उनके बालों की लटें [गंगा की] लहरों की भांति लहरा रही हैं, जिनका मस्तक दीप्तिमान है जिस पर धगद-धगद की आवाज करती हुई अग्नि [तीसरा नेत्र] विराजित है, जिस [मस्तक] के शिखर पर अर्धचंद्र सुशोभित है, ऐसे शिव का तांडव प्रति क्षण मेरे मन में आनंद उत्पन्न कर रहा है।
धराधरेन्द्र नंदिनी विलासबन्धु वन्धु-
रस्फुरद्-दिगन्त संतति प्रमोदमानमानसे।
कृपाकटाक्ष-धोरणी निरुद्ध-दुर्धरापदि।
क्वचिद्दिगम्बरे मनोविनोदमेतु वस्तुनि।।३।।
पर्वतराज (हिमालय) की पुत्री (पार्वती) जिनकी अर्धांगिनी हैं, जिस तांडव से सारा संसार कांपने लगता है उसकी सूक्ष्म तरंगें मेरे मन में सुख की लहरें उत्पन्न कर रही हैं, वे शिव जिनके कटाक्ष [तिरछी नजर] से बड़ी-बड़ी आपदाएं भी टल जाती हैं, जो दिगंबर हैं, मेरा मन उन ध्यान में आनंद प्राप्त करे।
जटा भुजंगपिंगल स्फुरत्फणामणिप्रभा-
कदंबकुंकुंम-द्रवप्रलिप्त दिग्वधूमुखे।
मदान्धसिन्धु रस्फुरत्वगुत्तरीयमेदुरे।
मनो विनोदमद्-भुतं विंभर्तुभूत-भर्तरि।।४।।
जिनकी जटा पर लाल-भूरे सर्प अपना मणियों से चमकता फन फैलाये हुए बैठे हैं जो सभी की देवियों के चेहरों पर विभिन्न रंग बिखेर रहा है, जिनका ऊपरी वस्त्र मंद पवन में मदमस्त हाथी के चर्म (skin) की भांति हिल रहा है, जो सभी जीवों के रक्षक हैं मेरा मन उनके इस तांडव से पुलकित हो रहा है।
सहस्र लोचन प्रभृत्य शेषलेखशेखर-
प्रसून धूलिधोरणी विधूसरांघ्रिपीठभूः।
भुजंगराज मालया निबद्धजाटजूटकः।
श्रियै चिराय जायतां चकोर बन्धुशेखरः।।५।।
जो नाचते हुए अपने पैरों की धूल से सहस्र लोचन (जिनके हजार नेत्र हैं अर्थात इंद्र) आदि देवताओं पर कृपा करते हैं, धरती पर नाचने से जिनके पैर भूरे रंग के हो गए है, जिनकी जटा सर्पराज की माला से बंधी है, चकोर पक्षी के मित्र चन्द्रमा जिनके मस्तक पर शोभित हैं, वे हमें सम्पन्नता प्रदान करें।
ललाट चत्वरज्व-लद्धनंजयस्फुलिङ्गभा-
निपीतपंचसायकं नमन्निलिम्पनायकम्।
सुधा मयूख लेखया विराजमान शेखरं।
महा कपालि संपदे शिरोजटालमस्तु नः।।६।।
जिनके ललाट पर अग्नि की चिंगारी जल रही है और अपनी दीप्ति फैला रही है, इस अग्नि ने कामदेव के पांच तीरों को नष्ट कर कामदेव को भस्म कर दिया था, जो अर्ध चंद्र से सुशोभित हैं उनकी जटाओं में स्थित सम्पदा हमें प्राप्त हो।
कराल भाल पट्टिका धगद् धगद् धगज्जवलद्ध-
नंजया धरीकृत प्रचण्डपंचसायके।
धराधरेन्द्र नंदिनी कुचाग्रचित्रपत्रक-
प्रकल्पनैकशिल्पिनि त्रिलोचने रतिर्मम।।७।।
उनके कराल (डरावने) मस्तक के तल पर धगद-धगद की ध्वनि करती हुई अग्नि जल रही है जिसने पांच तीर वाले (कामदेव) को नष्ट कर दिया था, तांडव की कदमताल से धरती (जो कि पर्वत पुत्री पार्वती का अंश है) के वक्ष पर सजावटी रेखाएं खिंच गयी हैं, मेरा मन त्रिनेत्रधारी शिव के इस तांडव से अत्यंत प्रसन्न है।
नवीनमेघ मंडली निरुद्ध-दुर्धरस्फुरत्कुहु-
निशीथनीतमः प्रबद्धबद्ध कन्धरः।
निलिम्पनिर्झरी धरस्तनोतु-कृत्ति-सिन्धुरः।
कलानिधानबन्धुरः श्रियं जगद्धुरंधरः।।८।।
महान तांडव के स्पंदन (धड़क) से शिव की गर्दन बादलों की परतों से ढकी अमावस्या की अर्धरात्रि की तरह काली है, हे गंगा को धारण करने वाले, हे गजचर्म पहनने वाले, हे अर्धचंद्रधारी, हे सारे संसार का भार उठाने वाले शिव! हमें सम्पन्नता प्रदान करें।
प्रफुल्ल नील पंकज-प्रपंचकालिमप्रभा ।
विडंबि कंठकंधरारुचि प्रबन्धकंधरम्।
रमच्च्छिदं पुरच्छिदं भवच्छिदं मखच्छिदं।
गजच्छिदान्ध कच्छिदं तमंतकच्छिदं भजे।।९।।
ब्रह्माण्ड की काली चमक (हलाहल विष) उनके गले में नीले कमल की तरह प्रतीत हो रहा है और करधनी की भाँती प्रतीत हो रहा है जिसे उन्होंने स्वयं रोक रखा है, जिन्होंने स्मर (कामदेव) और त्रिपुरासुर का अंत किया, जो सांसारिक बंधनों को नष्ट करते हैं, जिन्होंने दक्ष, अंधकासुर और गजासुर को विदीर्ण किया और यम को पराजित किया था मैं उन शिव की पूजा करता हूँ।
अखर्व(अगर्व) सर्वमंगला कलाकदंबमञ्जरी।
रसप्रवाह माधुरी विजृंभणा मधुव्रतम।
स्मरान्तकं पुरान्तकं भवान्तकं मखान्तकं।
गजान्तकान्धकान्तकं तमन्तकान्तकं भजे।।१०।।
वे सभी की सम्पन्नता के लिए कभी न कम होने वाले मंगल का भण्डार हैं, वे सभी कलाओं के स्रोत हैं, कदम्ब के फूलों से आने वाली शहद की सुगंध के कारण उनके चारों ओर मधुमक्खियां घूमती रहती हैं, जिन्होंने स्मर (कामदेव) और त्रिपुरासुर को नष्ट किया, जो सांसारिक बंधनों से मुक्त करते हैं, जिन्होंने दक्ष, अंधकासुर और गजासुर का अंत किया और यम को पराजित किया था मैं उन शिव की पूजा करता हूँ।
जयत्वदभ्रविभ्रम भ्रमद्भुजंगमस्फु-
रद्-धगद्-धगद्वि निर्गमत्कराल भाल हव्यवाट्-
धिमिद्धिमिद्धिमि ध्वनन्मृदंग-तुंगमंगल-
ध्वनिक्रमप्रवर्तित प्रचंड ताण्डवः शिवः।।११।।
उनकी भौहें आगे-पीछे गति कर रही हैं जो तीनों लोकों पर उनके स्वामित्व को दर्शाती हैं, उनकी गर्दन पर फुफकार मारते हुए सांप लोट रहे हैं, उनके मस्तक पर डरावनी तीसरी आँख यज्ञ की अग्नि की भाँति धड़क रही है, मृदंगों से लगातार धिमिध-धिमिध की ध्वनि हो रही है और इस ध्वनि पर शिव तांडव कर रहे हैं।
दृषद्विचित्रतल्पयोर्भुजंग मौक्तिकमस्र-
जोर्गरिष्ठरत्नलोष्ठयोः सुहृद्वि-पक्षपक्षयोः।
तृणारविन्दचक्षुषोः प्रजामहीमहेन्द्रयोः
प्रवर्तयन्मनः कदा सदाशिवं भजाम्यहम्।१२।।
मैं आरामदायक बिस्तर और कठोर भूमि का स्पर्श में समानता कब देखूंगा? मैं मोतियों के हार और साँपों के हार को समान रूप से कब देखूंगा? मैं मित्र और शत्रु में एकरूपता कब देखूंगा? मैं कब सुन्दरता और कुरूपता को सामान दृष्टि से कब देखूंगा? मैं कब सम्राट और सामान्य लोगों को एकरूपता से देखूंगा? मैं दृष्टि और आचरण की समानता से सदाशिव की पूजा कब करूँगा?
कदा निलिम्पनिर्झरी निकुंजकोटरे वसन्।
विमुक्तदुर्मतिः सदा शिरःस्थमंजलिं वहन्।
विमुक्तलोललोचनो ललामभाललग्नकः।
शिवेति मन्त्रमुच्चरन्कदा सुखी भवाम्यहम्।।१३।।
मैं कब मन के पापयुक्त स्वभाव से मुक्त होकर गंगा के किनारे घने जंगलों की गुफाओं में दोनों हाथों को सर पर रखकर शिव की तपस्या में लीन रहूँगा? मैं कब नेत्रों के भटकाव (काम भावना) से मुक्त होकर माथे पर तिलक लगाकर शिव की पूजा करूँगा? मैं कब शिव के मन्त्रों का उच्चारण करते हुए सुखी होऊंगा?
निलिम्प नाथनागरी कदम्ब मौलमल्लिका-
निगुम्फनिर्भक्षरन्म धूष्णिकामनोहरः।
तनोतु नो मनोमुदं विनोदिनीं-महनिशं।
परिश्रय परं पदं तदंगजत्विषां चयः।।१४।।
देवांगनाओं के सिर में गुंथे कदम्ब के पुष्पों की मालाओं के झड़ते सुगन्धित पराग से मनोहर, शोभा के धाम महादेव के अंगों की सुंदरता आनंदयुक्त हमारे मन की प्रसन्नता को सदा बढ़ाती रहे।
प्रचण्ड वाडवानल प्रभाशुभप्रचारिणी।
महाष्टसिद्धि कामिनी जनावहूत जल्पना।
विमुक्त वाम लोचनो विवाहकालिकध्वनिः।
शिवेति मन्त्रभूषगो जगज्जयाय जायताम्।।१५।।
बड़वानल (समुद्र की अग्नि) की भांति पापों को भस्म करने में स्त्री स्वरूपिणी अणिमादिक अष्ट महासिद्धियों और चंचल नेत्रों वाली देवकन्याओं से शिव विवाह समय में गान की गयी मंगल ध्वनि सब पर मन्त्रों में श्रेष्ठ शिव मन्त्र से परिपूर्ण होकर हम सांसारिक दुखों को नष्ट कर विजय पाएं।
इमं हि नित्यमेव मुक्तमुक्तमोत्तम स्तवं।
पठन्स्मरन् ब्रुवन्नरो विशुद्धमेति सन्ततम्।
हरे गुरौ सुभक्तिमाशु याति नान्यथा गतिम्।
विमोहनं हि देहनाम् तु शंकरस्य चिन्तनम।।१६।।
पवित्र मन से शिव का मनन (चिंतन) करके इस महान से भी महानतम स्तव ( स्तोत्र ) का जो भी नित्य अखंड पाठ करता है, गुरु शिव उस की ओर गति करते हैं, उस शिव की भक्ति प्राप्त होती है, इस भक्ति को पाने का कोई दूसरा मार्ग नहीं है, शिव के मनन से ऐसे व्यक्ति का मोह नष्ट हो जाता है।
पूजाऽवसानसमये दशवक्रत्रगीतं।
यः शम्भूपूजनमिदं पठति प्रदोषे।
तस्य स्थिरां रथगजेंद्रतुरंगयुक्तां।
लक्ष्मी सदैव सुमुखीं प्रददाति शम्भुः।।१७।।
शम्भू (शिव) की पूजा की समाप्ति के समय शाम को जो दशानन रावण के इस स्तोत्र (छंद) का पाठ करते हैं, जो इस पूजा में दृढ़ रहते हैं वे हाथी घोड़ों के रथ पर चलते हैं (सम्पन्नता दर्शाने के लिए. देवी लक्ष्मी की कृपा उन पर बनी रहती है, श्री शम्भू उन पर वरदान बनाये रखते हैं।
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Rudrashtakam Lyrics in Hindi with meaning
Shiv ji ki Arti
Difference between Hinduism and Islam
Thursday, March 22, 2018
Shiv Ji Ki Aarti
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| Lord Shiv |
Shiv Ji Ki Aarti-
Shiv Ji Ki Aarti- English-
Swami Jai Shiv Omkara।
Brahma, Vishnu, Sadashiv,
Ardhangi Dhara॥
Om Jai Shiv Omkara॥
Ekanan Chaturanan Panchanan Raje।
Hansanan, Garudasan
Vrishvahan Saje॥
Om Jai Shiv Omkara॥
Do Bhuj, Chaar Chaturbhuj Dashabhuj Ati Sohe।
Trigun Roop Nirakhate
Tribhuvan Jan Mohe॥
Om Jai Shiv Omkara॥
Akshamala Vanamala Mundamala Dhari।
Tripurari Kansari
Kar Mala Dhari॥
Om Jai Shiv Omkara॥
Shvetambar Pitambar Baaghambar Ange।
Sankadik Garunadik
Bhootadik Sange॥
Om Jai Shiv Omkara॥
Kar Ke Madhya Kamandalu Chakra Trishuldhari।Sukhakari Dukhahari
Jagpalan Kari॥
Om Jai Shiv Omkara॥
Brahma Vishnu Sadashiv Janat Aviveka।
Pranvakshar ke madhye |
Ye teeno ekaa॥
Om Jai Shiv Omkara॥
Kashi Me Viraje Vishwanath, Nandi Brahmchari।
Nit Uth Darshan Paavat,
Mahima Ati Bhaari॥
Om Jai Shiv Omkara॥
Trigunswami Ji Ki Aarti Jo Koi Nar Gave।
manvanchit fal pave||
Brahma, Vishnu, Sadashiv,
Ardhangi Dhara॥
Om Jai Shiv Omkara॥
Tuesday, October 24, 2017
Shiv Chalisa Lyrics in Hindi शिव चालीसा लिरिक्स
Shiv Chalisa in Hindi
।दोहा।जय गणेश गिरिजा सुवन, मंगल मूल सुजान ।
कहत अयोध्यादास तुम, देहु अभय वरदान ॥
।चौपाई।
जय गिरिजापति दीन दयाला । सदा करत सन्तन प्रतिपाला ॥
भाल चन्द्रमा सोहत नीके । कानन कुण्डल नागफनी के॥
अंग गौर शिर गंग बहाये । मुण्डमाल तन क्षार लगाए ॥
वस्त्र खाल बाघम्बर सोहे । छवि को देखि नाग मन मोहे ॥
मैना मातु की हवे दुलारी । बाम अंग सोहत छवि न्यारी ॥
कर त्रिशूल सोहत छवि भारी । करत सदा शत्रुन क्षयकारी ॥
नन्दि गणेश सोहै तहँ कैसे । सागर मध्य कमल हैं जैसे॥
कार्तिक श्याम और गणराऊ । या छवि को कहि जात न काऊ ॥
देवन जबहीं जाय पुकारा । तब ही दुख प्रभु आप निवारा ॥
किया उपद्रव तारक भारी । देवन सब मिलि तुमहिं जुहारी ॥
तुरत षडानन आप पठायउ । लवनिमेष महँ मारि गिरायउ ॥
आप जलंधर असुर संहारा। सुयश तुम्हार विदित संसारा ॥
त्रिपुरासुर सन युद्ध मचाई । सबहिं कृपा कर लीन बचाई ॥
किया तपहिं भागीरथ भारी । पुरब प्रतिज्ञा तासु पुरारी ॥
दानिन महँ तुम सम कोउ नाहीं । सेवक स्तुति करत सदाहीं ॥
वेद नाम महिमा तव गाई । अकथ अनादि भेद नहिं पाई ॥
प्रकटी उदधि मंथन में ज्वाला । जरत सुरासुर भए विहाला ॥
कीन्ही दया तहं करी सहाई । नीलकण्ठ तब नाम कहाई ॥
पूजन रामचन्द्र जब कीन्हा । जीत के लंक विभीषण दीन्हा ॥
सहस कमल में हो रहे धारी । कीन्ह परीक्षा तबहिं पुरारी ॥
एक कमल प्रभु राखेउ जोई । कमल नयन पूजन चहं सोई ॥
कठिन भक्ति देखी प्रभु शंकर । भए प्रसन्न दिए इच्छित वर ॥
जय जय जय अनन्त अविनाशी । करत कृपा सब के घटवासी ॥
दुष्ट सकल नित मोहि सतावै । भ्रमत रहौं मोहि चैन न आवै ॥
त्राहि त्राहि मैं नाथ पुकारो । येहि अवसर मोहि आन उबारो ॥
लै त्रिशूल शत्रुन को मारो । संकट ते मोहि आन उबारो ॥
मात-पिता भ्राता सब होई । संकट में पूछत नहिं कोई ॥
स्वामी एक है आस तुम्हारी । आय हरहु मम संकट भारी ॥
धन निर्धन को देत सदा हीं । जो कोई जांचे सो फल पाहीं ॥
अस्तुति केहि विधि करैं तुम्हारी । क्षमहु नाथ अब चूक हमारी ॥
शंकर हो संकट के नाशन । मंगल कारण विघ्न विनाशन ॥
योगी यति मुनि ध्यान लगावैं । शारद नारद शीश नवावैं ॥
नमो नमो जय नमः शिवाय । सुर ब्रह्मादिक पार न पाय ॥
जो यह पाठ करे मन लाई । ता पर होत है शम्भु सहाई ॥
ॠनियां जो कोई हो अधिकारी । पाठ करे सो पावन हारी ॥
पुत्र होन कर इच्छा जोई । निश्चय शिव प्रसाद तेहि होई
पण्डित त्रयोदशी को लावे । ध्यान पूर्वक होम करावे ॥
त्रयोदशी व्रत करै हमेशा । ताके तन नहीं रहै कलेशा ॥
धूप दीप नैवेद्य चढ़ावे । शंकर सम्मुख पाठ सुनावे ॥
जन्म जन्म के पाप नसावे । अन्त धाम शिवपुर में पावे ॥
कहैं अयोध्यादास आस तुम्हारी । जानि सकल दुःख हरहु हमारी ॥
।दोहा।
नित्त नेम उठि प्रातः ही, पाठ करो चालीसा ।
तुम मेरी मनोकामना, पूर्ण करो जगदीश ॥
मगसिर छठि हेमन्त ॠतु, संवत चौसठ जान ।
स्तुति चालीसा शिवहि, पूर्ण कीन कल्याण ॥
Shiva Chalisa in English-
Doha-Jai ganesh Girija Suvan, Mangal Mool Sujaan.
Kahat Ayodhyadaas tum, Dehu Abhay Vardaan.
Chopaai-
Jai Girija Pati Deeen dayalaa, Sada Karat santan Pratipala.
Bhaal chandrama sohat neeke, kaanan kundal naagphani ke.
Ang aur sir gang bahaaye, Mundmaal tan chhaar lagaaye.
Vastr khaal baaghambar sohe, chhavi ko dekh naag man mohe.
Maina maatu ki have dulaari, baam ang sohat chhavi nyaari.
kar trishul sohat chhavi bhaari, karat sada shatrun chhaykaari.
Nandi ganesh Sohai tahn Kaise, Sagar Madhya Kamal hai Jaise.
Kartik shyaam aur Ganraahu, Ya chhavi ko kahi jaat na kaahu.
Devan Jabaheen Jaay pukara, Tab hi dukh prabhu aap nivara.
Kiya upadrav taarak bhaari, Devan Sab mili tumahin juhaari.
Turat Shadaanan aap pathhayahu, Lavnimesh mahn maari Girayahu.
Aap Jalandhar asur Sanhaara, Suyash tumhaar vidit Sansaara.
Tripuraasur san Yuddh machaai, sabahin kripa kari leen bachaai.
Kiya Tapahin Bhaagirath bhaari, purab pratigya taasu puraari.
Daanin mein tum sahu kou naahin, Savak stuti karat Sadaaheen.
Ved naam mahima tav gaai, Akath Anaadibhed nahin paai.
Pragati udadh manthan mein jwala, Jarat surasur bhaye vihala.
Keenheen dayaa tahn kari sahaai, neelkanth tab naam kahaai.
Pujan ramchandra jab keenha, Jeet ke lank vibheeshan deenha.
Sahas kamal me ho rahe dhaari, keenh pariksha tabanhi puraari.
Ek kamal prabhu raakheu joi, kamal nayan pujan chahn soi.
Kathin bhakti dekhi prabhu shankar, bhaye prasann diye ichchhit var.
Jay jay jay anant avinaashi, karat kripa sab ke ghatvaasi.
Dusht Sakal nit mohi sataave, bhramat rahaun mohi chain na aave.
traahi traahi main naath pukaaraun, yehi avsar mohi aan ubaaro.
Lai trishul shatrun ko maaro, sankat te mohi aan ubaaro.
maat-pita bhraataa sab hoi, sankat me puchat nahin koi.
Swami ek hai aas tumhaari, aay harahu mam sankat bhaari.
Dhan Nirdhan ko det sadaahin, jo koi jaanche so phal paahin.
Astuti kehi vidhi karain tumhari, chamahu naath ab chook hamari.
Shankar ho sankat ke naashan, Mangal kaaran vighn vinashan.
Yogi yati muni dhyaan lagaaven, shaarad naarad shish navaaven.
namo namo jay namah shivaay, sur brahmaadik paar na paaye.
jo yah paath kare manlaayi, ta par hot hai shambhu sahaai.
riniyaan jo koi ho adhikaari, paath kare so paavan haari.
putr hon kar ichchha joi, nishchay shiv prasaad tehi hoi.
pandit trayodashi ko laave, dhyaan purvak hom karaave.
trayodashi vrat karai hamesha, taake tan nahin rahai kalesha.
dhup deep naivedya chadaave, shankar sammukh paath sunaave.
janm janm ke paap nasaave, ant dhaam shivpur me paave.
kahain ayodhya aas tumhaari, jaani sakal dukh harahu hamari.
Doha-
Nitt nem uthi praatahi, paath karo chaalees.
tum meri manokaamna purn karo jagdeesh.
Magsir chathhi hemant ritu, sanvat chausath jaan,
stuti chaalisa shivahi, purn keen kalyaan.
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Shri Shiva Rudrashtakam Lyrics in hindi-
विभुं व्यापकं ब्रम्ह्वेदस्वरूपम् ।
निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरीहं
चिदाकाशमाकाशवासं भजेऽहम् ।।
निराकारमोंकारमूलं तुरीयं
गिराघ्यानगोतीतमीशं गिरीशं गिरीशम् ।
करालं महाकाल कालं कृपालं
गुणागार संसारपारं नतोऽहम् ।।
तुषाराद्रि संकाश गौरं गभीरं
मनोभूत कोटिप्रभा श्री शरीरम् ।
स्फुरन्मौलि कल्लोलिनी चारु गङ्गा
लसद्भालबालेन्दु कण्ठे भुजङ्गा ।।
चलत्कुण्डलं भ्रू सुनेत्रं विशालं
प्रसन्नाननं नीलकण्ठं दयालम् ।
मृगाधीशचर्माम्बरं मुण्डमालं
प्रियं शङ्करं सर्वनाथं भजामि ।।
प्रचण्डं प्रकृष्टम प्रगल्भं परेशं
अखण्डं अजं भानुकोटिप्रकाशम् ।
त्रयःशूल निर्मूलनं शूलपाणिं
भजेऽहम भवानीपतिं भावगम्यम् ।।
कालातीत कल्याण कल्पान्तकारी
सदा सज्जनानन्ददाता पुरारी ।
चिदानन्द सन्दोह मोहापहारी
प्रसीद प्रसीद प्रभो मन्मथारी ।।
न यावद् उमानाथ पादारविन्दम
भजन्तीह लोके परे वा नराणाम् ।
न तावद् सुखं शान्तिसन्तापनाशं
प्रसीद प्रभो सर्व भूतादिवासम् ।।
न जानामि योगं जपं नैव पूजां
नतोऽहम सदा सर्वदा शम्भु तुभ्यम् ।
जराजन्म दुःखौघ तातप्यमानं
प्रभो पाहि आपन्नमामीश शम्भो।।
[ श्लोक ] ।। रुद्राष्टकमिदं प्रोक्तं विप्रेण हरतोषये,
ये पठन्ति नरा भक्त्या तेषां शम्भुः प्रसीदति ।।
।। इति श्री गोस्वामी तुलसीदासकृतं रुद्राष्टकम सम्पूर्णम् ।।
Shiva Rudrashtakam lyrics in english-
Namami- shamishan nirvan rupam,Vibhum vyapakam brahmvedaswarupam,
Nijam nirgunam nirvikalpam nireeham,
Chidaakaash maakaashvaasam bhajeaham. 1.
Nirakar monkaar mulam tureeyam,
Giragyan gotitmeesham girisham,
Karalam Mahakal kaalam kripalam,
Gunagaar sansaar paaram natoaham. 2.
tusharadri sankaash gouram gambhiram,
manobhut kotiprabha shri shariram,
sphuranmouli kallolini chaaru ganga,
lasadbhaal baalendu kanthe bhujanga. 3.
chalatkundalam bhru sunetram vishaalam,
psannananam neelkantham dayaalam,
mrigadheesh charmambaram mundmaalam,
priyam shankar sarvnaatham bhajaami. 4.
prachandam prakrishtam pragalbham paresham,
akshndam ajam bhaanukoti prakasham,
trayah shul nirmulanam shulipaanim,
bhajeaham bhavaanipatim bhaavgamyam. 5.
kalaateet kalyan kalpaantkaari,
sada sajjananand data purari,
chidanand sandoh mohapahari,
prasid prasid prabho manmathaari. 6.
na yaavad umanaath padarvindam,
bhajam teeh loke pare va naraanaam,
na taavad sukham shaanti santaapnaasham,
prasid prabho sarv bhutadivaasam. 7.
na jaanaami yogam japam naiv pujaam,
natoaham sada sarvada shambhu tubhyam,
jarajanm duhkhough taatapymaanam,
prabho paahi aapannamamish shamobho. 8.
[ shlok ] rudrashtak midam proktam vipren hartoshaye,
ye pathanti nara bhaktya teshaam shambhu prasidati ||
[ iti shri shiva rudrashtakam sampurnam]
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